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महिलाओं की बेहतरी की सोचिए

Thu, 26 Feb 2015 08:16 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 26 Feb 2015 08:16 PM IST
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Consider the betterment of women

नौ महीने पहले नरेंद्र मोदी सरकार ने शपथ ली, और बजट सत्र के पहले राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक में दिए गए अपने भाषण में नई सरकार का एजेंडा और जनता से किए जाने वाले वायदों के क्रियान्वयन के बारे में सरकारी आश्वासनों की फेहरिस्त पेश की थी। एक आश्वासन ऐसा था, जिसने महिलाओं को बहुत ही उत्साहित किया।

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वह आश्वासन यह था कि विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का विधेयक प्रस्तुत किया जाएगा। लगातार पंद्रह वर्षों से इस विधेयक को पारित कराने का संघर्ष जारी है। वामपंथी दलों के अलावा कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने अपने घोषणापत्रों में इस विधेयक को पारित करने का आश्वासन दोहराया। पर जब उसे संसद में पेश करने का समय आता था, तो दोनों बड़े दल मुकर जाते थे। उनका बहाना एक जैसा ही होता था-उनके पास बहुमत नहीं है, और जिन दलों के समर्थन पर वे निर्भर हैं, वे विधेयक के पक्ष में नहीं हैं। पर मई, 2014 की स्थिति बिल्कुल भिन्न थी। इस विधेयक को राज्यसभा में पारित कर दिया गया था। अब उस पर लोकसभा की मोहर लगनी थी, जहां भाजपा के पूर्ण बहुमत के चलते विधेयक के पारित होने में किसी तरह की रुकावट नहीं थी। पर सत्र के दौरान उसने महिला आरक्षण विधेयक के बारे में बोलना तो दूर, सोचना तक बंद कर दिया। नतीजतन लोकसभा के सामने यह विधेयक तो आया ही नहीं, राज्यसभा में भी वह लैप्स हो गया।
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अब 2015 का बजट सत्र शुरू हो चुका है। महिला आरक्षण विधेयक की बात भाजपा की सरकार और प्रधानमंत्री भूल ही चुके हैं। इसका दुष्प्रभाव महिलाओं पर पड़ने वाला है। वैश्विक पैमाने पर लिंगानुपात को ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स से मापा जाता है। 2014 में इस इंडेक्स के अनुसार, 142 देशों में भारत का स्थान 114वां था। लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में कमी नहीं आई है। लैंगिक असमानता दूर करने के लिए बजट में महिलाओं के लिए आवंटित धनराशि बढ़ाने की जरूरत है। पर हो रहा इसका उल्टा है। महिला कल्याण पर होने वाला खर्च 2011-12 के 930 करोड़ से 2014-15 में घटकर 920 करोड़ रह गया था। पिछले साल महिला-बाल कल्याण मंत्रालय के बजट का 87 प्रतिशत हिस्सा तो केवल आंगनबाड़ी योजना के मद में डाला गया था। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा दूर करने के लिए अगंभीरता का नमूना यह है कि 2013-14 के बजट में घरेलू हिंसा कानून के क्रियान्वयन के लिए होने वाले खर्च के मद में कुछ आवंटित ही नहीं किया गया, क्योंकि उससे पहले के बजट में इस मद में जो राशि आवंटित की गई थी, उसे खर्च नहीं किया गया था।
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बलात्कार की शिकार महिलाओं के पुनर्वास के लिए भी आवंटित राशि लगातार घट रही है। अभी प्रधानमंत्री ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत की है। देखना है कि इसे सफलतापूर्वक क्रियान्वियत करने के लिए कितनी राशि आवंटित की जाती है। पिछले दिनों यह बात सामने आई कि शौचालय की अनुपलब्धता महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा की बड़ी वजह है। बजट में क्या सरकार इस पर ध्यान देगी?

-लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं

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