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यथार्थ से दूर भागती कांग्रेस

Thu, 16 Oct 2014 08:11 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Thu, 16 Oct 2014 08:11 PM IST
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Congress running away from reality

लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी जैसे शक्तिशाली राजनीतिक विरोधी से परास्त कांग्रेस, लगता है, अब छोटे-छोटे मुद्दों को भी नाहक तूल दे रही है। मोदी के संयुक्त राष्ट्र के भाषण की प्रशंसा कर और उनके स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड अंबेसडर बनने की हामी भर शशि थरूर ने आखिर ऐसा कौन-सा गुनाह कर दिया था? शशि थरूर के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश कर केरल कांग्रेस ने मूर्खता का ही परिचय दिया। और कांग्रेस हाइकमान ने थरूर को प्रवक्ता पद से हटाकर वस्तुतः अपना ही नुकसान किया। जिस पार्टी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष लिखित भाषण के बिना पांच मिनट भी नहीं बोल सकते, उन्हें शशि थरूर जैसे एक समझदार, सुस्पष्ट और प्रभावी प्रवक्ता की बेहद जरूरत है। वस्तुतः जब तक कांग्रेस खुद को चापलूसी की संस्कृति से मुक्त नहीं करती, अपना नजरिया नहीं बदलती, दोबारा सत्ता हासिल करने की अपनी व्यग्रता पर अंकुश नहीं लगाती, नए विचारों को नहीं अपनाती और जनता के मुद्दे नहीं उठाती, तब तक नरेंद्र मोदी का मुकाबला वह नहीं कर सकती।

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लेकिन अपनी बदतर हार के बावजूद कांग्रेस अब भी नकारात्मक मानसिकता में है। न तो उसके पास जमीनी यथार्थ को स्वीकार करने का साहस है, न वह अपनी पराजय का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कर पाई है, और न ही पार्टी में जरूरी बदलाव का कदम उठा सकी है। कांग्रेस के पास साहसी नेतृत्व का ही नहीं, बल्कि स्पष्ट नजरिये और सुचिंतित रणनीति का भी अभाव है। ए के एंटनी ईमानदार राजनेता हो सकते हैं, पर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी पट्टी के मतदाताओं की मानसिकता के बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी है, जहां से लोकसभा चुनाव में भाजपा से भारी संख्या में सांसद चुनकर आए। कांग्रेस की हार पर एंटनी की समीक्षा रिपोर्ट एक मजाक से ज्यादा नहीं थी। वह और कुछ कर सकते हों, पर सच कहने का साहस उनमें नहीं है।
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आश्चर्य तो यह है कि हार के बाद भी कांग्रेसी यथार्थ को स्वीकार नहीं रहे। नरेंद्र मोदी को कमतर आंककर वे फिर बड़ी राजनीतिक भूल कर रहे हैं। उनकी पूरी योजना बस मोदी की गलती पकड़ने, उन पर अपनी नीतियां और विचार चुराने का आरोप लगाने और तब तक इंतजार करने की है, जब तक जनता भाजपा के कामकाज से नाराज होकर दोबारा कांग्रेस की ओर लौट न आए! भोले कांग्रेसी दिन में सपना देख रहे हैं। उनके पास कोई नया, विश्वसनीय, अमल करने लायक, व्यावहारिक विचार नहीं है, न ही वे यह बताने की स्थिति में हैं कि लोगों को कांग्रेस की तरफ वापस क्यों लौटना चाहिए।
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क्या कांग्रेस जनता का भरोसा जीतने के लिए नया कुछ कर रही है या लोगों को यह बता पाने में सक्षम है कि भाजपा का विश्वसनीय विकल्प एकमात्र वही है? जब तक वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर खुद को पाक-साफ नहीं दिखाती, तब तक उस पर भला कौन भरोसा करेगा? चाहे साबित हुआ या नहीं, पर रॉबर्ट वाड्रा पर लगे भ्रष्टाचरण के आरोप खत्म नहीं हो जाने वाले। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को यह समझ लेना होगा कि सिर्फ मोदी को निशाना बनाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहते हुए उन पर 'जहर की खेती करने' का आरोप लगाया था। क्या इससे उन्हें वोट मिले? हार्वर्ड और ह्वेर्टन में शिक्षित राहुल गांधी के साथियों को यह समझ में नहीं आ रहा कि संघ के एक पूर्व प्रचारक और चायवाला का मुकाबला वह किस तरह करें, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा में कठोर राजनयिकों का, न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डेन में जोशीले अनिवासी भारतीयों का, सेंट्रल पार्क में रॉक स्टारों का, ओवल ऑफिस में अमेरिकी राष्ट्रपति का, और लाल किले से लाखों भारतीयों का मन मोहने की क्षमता रखता है!

मोदी निर्विवाद रूप से आजाद भारत के सबसे महत्वाकांक्षी राजनेता हैं। अगर राजनीतिक पार्टियां उठ खड़ी नहीं होंगी, तो मोदी उन सबको उसी तरह अप्रासंगिक बना देंगे, जैसे उन्होंने अपनी पार्टी को बना दिया है। विदेशी मामलों में आक्रमक रुख अपनाकर और देश के बुनियादी ढांचे के निर्माण और रोजगार के लिए विदेशी निवेश पर जोर देकर वह दूसरी राजनीतिक पार्टियों के हाथों से एजेंडा छीन रहे हैं। स्वच्छ भारत अभियान के लिए झाड़ू पकड़कर, हर घर में शौचालय की बात कर, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की मुहिम शुरू करके उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

खाद्य सुरक्षा के मामले में डब्ल्यूटीओ से मुकाबला कर उन्होंने आम आदमी, खासकर किसानों, के हितैषी की छवि बनाई है। देश-दुनिया में युवाओं का महत्व बताकर और उनके रोजगार और हुनर की बात छेड़कर वह युवा मतदाताओं को अपने पाले में रखना चाहते हैं। कॉरपोरेट क्षेत्र के तो वह हमेशा ही प्रिय रहे हैं। लालफीताशाही की जगह वह उनके लिए लाल कालीन बिछाने की बात कर रहे हैं। हिंदू वोट बैंक को मजबूती से अपने पक्ष में रखकर वह अब मुस्लिमों का भी समर्थन हासिल करने की कोशिश में हैं, खासकर तब, जब वह कहते हैं कि भारत का मुसलमान देश के लिए जीएगा और देश के लिए मरेगा, वह अल कायदा के इशारे पर नहीं चलने वाला। मुस्लिम सोच में मोदी के प्रति बदलाव आया, तो मुलायम सिंह यादव जैसों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसी तरह रेडियो पर 'मन की बात' कहकर वह खुद को जनता के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर रहे हैं।


लेकिन कांग्रेस है कि जल्दी सत्ता में लौटने के बारे में सोच रही है। इसके बजाय क्या यह बेहतर नहीं होगा कि पांच साल तक केंद्र की सत्ता में लौटने की बात भूलकर वह जनता की प्राथमिकताओं पर ध्यान देकर अपना जनाधार मजबूत करने की कोशिश करे?

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