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अमरबेलों से जकड़ा वटवृक्ष : कांग्रेस को खुद पर लगी कीचड़ सुखाने का वक्त चाहिए

Tue, 18 Jun 2019 02:06 AM IST
Raman Singh कनक तिवारी
कनक तिवारी Published by: Raman Singh Updated Tue, 18 Jun 2019 02:06 AM IST
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Congress Decline
Congress - फोटो : अमर उजाला

लगता है, कांग्रेस को खुद पर लगी कीचड़ सुखाने का वक्त चाहिए। सैकड़ों बुद्धिजीवी सेनापति पैदा करने वाली इस उर्वर गर्भा पार्टी के पास करिश्माई नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। कांग्रेस के विरोधी उस पर सीधे-सीधे भले ही गलत आरोप लगाते हों, पर कांग्रेस के नेता भी बुनियादी मुद्दों से जी चुराकर बगलें झांकने की शक्ल में इतिहास के तर्कों का उत्तर न देने की गैर जिम्मेदाराना कोशिश करते हैं।


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लगता है, कांग्रेस को खुद पर लगी कीचड़ सुखाने का वक्त चाहिए। सैकड़ों बुद्धिजीवी सेनापति पैदा करने वाली इस उर्वर गर्भा पार्टी के पास करिश्माई नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। कांग्रेस के विरोधी उस पर सीधे-सीधे भले ही गलत आरोप लगाते हों, पर कांग्रेस के नेता भी बुनियादी मुद्दों से जी चुराकर बगलें झांकने की शक्ल में इतिहास के तर्कों का उत्तर न देने की गैर जिम्मेदाराना कोशिश करते हैं।

कांग्रेस इतिहास की एक बड़ी पार्टी जरूर है, पर अखंडित भूगोल की नहीं रही। यक्ष प्रश्न यह है कि कांग्रेस इतिहास के शाश्वत मूल्यों के अभिलेखागार के रूप में तो जीवित रहेगी, लेकिन समकालीन मूल्यों और भविष्य की चुनौतियों तक भारतीय जनमानस के विश्वास की जमानतदार क्या बनी रहेगी। कांग्रेस की लगातार हार के जो भी मुख्य कारण हों, उनमें धर्म और राजनीति की जुगलबंदी, गुटबाजी, अदूरदर्शी टिकट वितरण, भितरघात, बगावत जैसे कारण गिनाए जा सकते हैं।

पिछले बरसों में कांग्रेस ने केंद्र तथा प्रदेश सरकारों में जिस तरह का नेतृत्व दिया, उससे जनमानस संतुष्ट नहीं रहा है। अब यह तर्क दिया जाता है कि बुद्धि के बदले कांग्रेस को कर्म के लोकप्रिय नेताओं की आवश्यकता है। बुद्धि और कर्म का आपस में क्या छत्तीस का आंकड़ा है? केंद्र और प्रदेश से लेकर जिला स्तर पर कांग्रेस के विचार विभागों में विचारों का स्पंदन महसूस नहीं होता।

आज भी पर्यवेक्षक यही बताने में मशगूल हैं कि कांग्रेस का अंदरूनी संकट फोड़े की तरह फूट रहा हो, तो उस पर सोनिया गांधी के हाथ ही मरहम लगा सकते हैं। कांग्रेस का यह कैसा तत्व है, जो नेहरू परिवार को कांग्रेस का कुतुबनुमा बनाए हुए है? 10,  जनपथ की सुई जिस ओर सुस्थिर होगी, उत्तर वहीं होगा। चौकड़ियां अमरबेल की तरह लिपटी कांग्रेस नेतृत्व का रस चूस रही हैं। कांग्रेस उन सूबेदारों को क्या नहीं जानती, जिनके चेहरों की चाशनी तो बढ़ी है, लेकिन शरीर का नमक घटा है?

नेतागीरी जनता के बीच जाने के बदले अखबार के विज्ञापनों में सिमट गई। वह किसान के खेतों और कारखानों से निकलकर मंत्रियों के बंगलों के दीवानखानों में सहमी खड़ी रही। ‘भ्रष्टाचार‘ शब्द ही कांग्रेस के शब्दकोश में कुछ लोगों द्वारा अप्रासंगिक बनाया जाने लगा। ऐसा नहीं कि कांग्रेस में संस्कारशील पीढ़ी का खात्मा हो गया, लेकिन जनता से जुड़े और बौद्धिक धरातल की आभा से मंडित कांग्रेस के ऐसे महत्वपूर्ण सिपाही नक्कारखाने में केवल तूती की आवाज बनकर रह गए।

इतनी भयानक हार तो आपातकाल में उपजी कांग्रेस-विरोधी आंधी में भी नहीं हुई थी। कांग्रेस ने चुनावी संघर्षों में शर्मनाक पराजय केवल इस कारण नहीं झेली कि उसे मतदाताओं ने तिरस्कृत किया, बल्कि इसलिए ज्यादा झेली कि देश के मतदाताओं से कार्यकर्ताओं के जरिये उसका संपर्क संवादहीनता की हद तक मूक हो गया था। बीसवीं सदी के लोकतंत्रीय इतिहास में विश्व की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस अपने अस्तित्व के संघर्ष से जूझती रही।

यही वक्त है, जब कांग्रेस को उसे उपलब्ध या ढूंढकर लाए गए विशिष्ट बुद्धिजीवियों और चरित्रनायकों को चुनाव के मैदान में उतारना चाहिए, भले उससे राजनीति के गैर-राजनीतिकरण की प्रक्रिया शुरू करनी पड़े। कांग्रेस केवल इस इतिहास बोध के सहारे गाफिल होकर नहीं रह सकती कि जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की तरफदारी की, स्वाधीनता आंदोलन की पीठ पर छुरा घोंपा, अंग्रेज हुक्मरानों को चिट्ठियां लिखीं कि भारत को आजादी की आवश्यकता नहीं है, उनके राजनीतिक वंशज हिंदुस्तान की जनता के भाग्य का सूत्रधार बनने का ख्वाब पाल रहे हैं।
 

कांग्रेस के लिए यह कितना आत्मघाती है कि जिस उत्तर प्रदेश ने कांग्रेस के तेवर में संघर्ष के सबसे ज्यादा बीजाणु गूंथे, वहां उसकी हालत चौथे नंबर की भी नहीं है। जिस सेना को पार्टी का परचम लेकर चुनाव मैदान में मार्च करना है, उसमें कायदे के सैनिक तक नहीं हैं। गांवों के किसानों के बेटों के जत्थे कांग्रेस की स ेवा करने में उस तरह मुस्तैद नहीं दिखाई पड़ते, जो आजादी के महासमर में कांग्रेस की यादें रही हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राष्ट्रीय राजनीतिक चिंतन मुख्यतः कांग्रेस की थाती रहा है। पूंजीपतियों, नौकरशाहों और व्यापारियों- को कांग्रेस में पिछली सीट ही मिलती रही। धीरे धीरे तिकड़मबाजों ने कांग्रेस से बुद्धिजीवियों को बीनने का काम शुरू किया।

नेतृत्व को लेकर सोनिया गांधी निस्संदेह वह ’फेविकोल’ हैं, जिससे पूरी पार्टी के टूटते हाथ- पांव जुड़ जाते हैं। लेकिन कांग्रेस की आत्मा कहां है? स्वदेशी का विरोध, विचारों की सफाई, नेता-परिवारों की अभिवृद्धि, समाजवाद का खात्मा, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का समर्थन और पश्चिमी अपसंस्कृति के सामने समर्पण करने के बाद कांग्रेस और अन्य पार्टियों में क्या फर्क रह गया है?

देहाती गंध की गमक लिए लाखों कांग्रेसी कार्यकर्ता अब दरी बिछाने वालों की जमात में शामिल हैं। पराजय-विशेषज्ञ कांग्रेस की विजय की रणनीति बनाते हैं। जिन्होंने जीवन में कोई चुनाव नहीं लड़ा, जो अपने राज्य से एक वार्ड का चुनाव जीत नहीं पाते, जो लगातार हार रहे हैं, जो हारने के पुरस्कार स्वरूप राज्यसभा में आसानी से पहुंच जाते हैं, लेकिन दूसरों को नहीं जाने देते, जो अंतिम बार हार चुके हैं, ऐसे तत्व मिलकर कांग्रेस की जीत की गारंटी देते हैं।

कहां है कांग्रेस में विचार-विमर्श और असहमति की स्वीकार्यता? कांग्रेस कार्य समिति तथा प्रदेशों के शीर्ष नेताओं में अधिकांश ऐसे हैं, जिन्होंने कभी न कभी कांग्रेस छोड़ी है। इनमें से कई नेताओं ने तो इंदिरा गांधी तक को धोखा दिया है। इसके कुछ नेता निजी बयान भी देते हैं। कांग्रेस कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से संसदीय पद्धति की सरकार के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया है।

फिर भी इसके कुछ मुख्यमंत्री और नेता खुलेआम राष्ट्रपति प्रणाली की सरकार के पक्ष में अपने मत व्यक्त करने में संकोच नहीं करते। कांग्रेस प्रवक्ताओं का तो यह आलम है कि वे दूसरी पार्टियों से ज्यादा अपनी पार्टी के विपरीत खेमे के नेताओं को निपटाने चलते हैं। कांग्रेस को सोचने की फुर्सत ही नहीं मिल रही है।
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