फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Path is still not so easy

इतनी भी आसान नहीं राह

Fri, 10 Oct 2014 12:22 AM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Fri, 10 Oct 2014 12:22 AM IST
विज्ञापन
Path is still not so easy

उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए उपचुनाव की अनुगूंज दूर महाराष्ट्र तक में सुनाई पड़ी है, जहां मुख्यमंत्री पद के लिए उद्धव ठाकरे के हठ के कारण आखिरकार भाजपा-शिवसेना गठबंधन को अलग होना पड़ा है। ऐसे में, अखिलेश यादव की चाल में अगर अचानक आत्मविश्वास लौट आया है, तो यह बिल्कुल स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अब बेझिझक कहते हैं, लोगों ने हमें एक और मौका दिया है।

विज्ञापन


उपचुनाव ने सपा को एक और अवसर दिया हो या नहीं, पर इसने राज्य के परेशान मुख्यमंत्री को थोड़ी राहत तो दी ही है। उम्मीद कर सकते हैं कि यह जीत उसे जल्दी ही 'बाहरी' और 'अंदरूनी' दबावों से मुक्त कर देगी। यहां 'बाहरी दबाव' का मतलब भाजपा और बसपा जैसी प्रतिपक्षी पार्टियों के हमले से है, जिन्हें झेलना अपेक्षाकृत आसान है। तुलनात्मक रूप से पिता, चाचा, ताऊ और आजम खान जैसे लोगों के 'अंदरूनी दबावों' का सामना करना कहीं मुश्किल है। इसी वजह से उत्तर प्रदेश सरकार को 'साढ़े पांच मंत्रियों' द्वारा शासित सरकार कहा जाता है।
विज्ञापन


वर्ष 2012 के चुनाव में राहुल गांधी को पीछे छोड़ अखिलेश जब राज्य के मतदाताओं की पसंद बने और उनचालीस की उम्र में जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो उनके प्रति अपेक्षाएं ठीक वैसी ही थीं, जैसी दो साल बाद राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के प्रति देखी गईं। पर जल्दी ही वे अपेक्षाएं खत्म भी हो गईं। 'लोग अब तेज बदलाव चाहते हैं', अखिलेश थोड़े हताश स्वर में कहते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


अपने मुख्यमंत्री काल का लगभग आधा समय पार कर चुके अखिलेश हालांकि अब थोड़े आत्मविश्वासी दिखते हैं। ढाई साल के अपने कार्यकाल की विफलताओं के बारे में वह बताते हैं कि कुछ योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती बरती गई। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनकी नजर में यह है कि उनकी सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार नहीं कर पाई, 'मार्केटिंग के इस जमाने में' मीडिया और तकनीक का अपने हित में बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पाई। वह मानते हैं कि समाजवादियों को राजनीति का नया तौर-तरीका सीखना होगा। 'मसलन, टीवी पर पहले की तरह आकर अपनी बात कह देने भर से काम नहीं चलने वाला। बल्कि हमें अपनी सरकार से जुड़े तथ्य-आंकड़े और इतिहास-भूगोल सब कुछ अपने विपक्ष के सामने रखना होगा', इस लेखिका को उन्होंने कहा।

अखिलेश यादव ने अब भाजपा के खिलाफ ट्वीटर युद्ध छेड़ दिया है। उत्तर प्रदेश के ऊर्जा संकट पर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल का तर्क यह रहा है कि राज्य की जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त बिजली है। इसके जवाब में अखिलेश सरकार रोज ट्वीट कर रही है कि नॉर्दर्न ग्रिड से जारी की गई बिजली में कितनी कमी रही, किस कीमत पर बिजली खरीदी गई, और कितना भुगतान किया गया।

दिलचस्प है कि अखिलेश खुद केंद्र सरकार के प्रति हमलावर नहीं हैं। बल्कि उत्तर प्रदेश में केंद्र की पहल का वह स्वागत ही कर रहे हैं। वह जानते हैं कि योजनाओं का क्रियान्वयन करने पर राज्य को फायदा होगा, और इसका श्रेय खुद उन्हें मिलेगा। इसलिए वह विकास के मुद्दे पर काम करना चाहते हैं। जापान दौरे से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब उन्हें बुलाया और प्रस्तावित क्योटो प्रोटोकॉल पर बात की, तो उन्होंने सहयोग का वायदा किया। राज्य में जापानी निवेश को सुगम बनाने के लिए एक जापानीज सेल का भी उन्होंने गठन किया है।

उद्योगों की सहूलियत के लिए एकल खिड़की और परियोजनाओं की समयबद्ध मंजूरी की भी घोषणा की है। अखिलेश कहते हैं कि राज्य में तीन हजार नई बैंक शाखाओं के खुलने और ढाई करोड़ नए बैंक खाते खोले जाने का मीडिया ने संज्ञान नहीं लिया। अखिलेश कहते हैं, 'हमारी रबड़ी अच्छी है, पर इसकी पैकेजिंग बढ़िया नहीं।'

उपचुनाव में सपा के बेहतर प्रदर्शन का कारण यह था कि इसने लोकसभा चुनाव के दौरान की गई गलतियां सुधारीं। जबकि भाजपा लोकसभा की जीत के उन्माद में तो चूर रही ही, उपचुनाव में उसके कुछ सांसदों ने अपने ही प्रत्याशियों के खिलाफ काम किया। जबकि सपा के प्रत्याशियों ने इस बार हर कदम मजबूती के साथ रखा। पार्टी ने आजम खान को पर्दे के पीछे रखा, ताकि वोटों का ध्रुवीकरण न हो सके, लोकसभा चुनाव में जिसका पूरा फायदा भाजपा को मिला था।

मायावती के चुनाव में शामिल न होने के फैसले और कांग्रेस की बदतर होती हालत से मुकाबला द्विपक्षीय हो गया था, जिसका लाभ भी सपा को मिला। मुलायम सिंह ने यह भी सुनिश्चित किया कि पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता हर निर्वाचन क्षेत्र में प्रचार की बागडोर संभालें।

हालांकि उपचुनाव में बेहतर प्रदर्शन का अर्थ यह नहीं है कि आगामी विधानसभा चुनाव की राह सपा के लिए आसान होगी। हां, अखिलेश अब खुद को पहले से ज्यादा ताकतवर जरूर महसूस कर सकते हैं, जिन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेता अब तक एक ऐसे अनुभवहीन बच्चे की तरह मानते थे, जो कभी उनकी गोद में खेला था। मगर अखिलेश की सबसे बड़ी परेशानी उनकी पार्टी का डीएनए है, जिसकी प्रकृति को देखते हुए, उसमें बदलाव करना आसान नहीं है।

पिता मुलायम ने अतीत में अपने मुख्यमंत्री पुत्र को सार्वजनिक तौर पर फटकार लगाई है, हालांकि इससे यह सवाल जरूर उठता है कि मुलायम जैसे व्यवहार कुशल नेता को ऐसा कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी। आज 'नेता जी' के सामने न केवल पार्टी को, बल्कि परिवार को भी बचाए रखने की चुनौती है।


खासकर तब यह और जरूरी है, जब लोकसभा में सपा के पांचों सांसद मुलायम के परिवार के ही हैं, और अलग-अलग राग अलाप रहे हैं। हाल ही में मुलायम ने अपने विश्वस्तों को बताया कि अखिलेश के नेतृत्व में अब पार्टी की एकता को कोई खतरा नहीं होगा। वहीं अखिलेश ने भी अगले तीस महीनों में होने वाले संघर्ष के लिए अपनी बांहें चढ़ा ली है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed