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इतिहास: संविधान के सरोकार और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की कामना
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विस्तार
अगले वर्ष 2024 में संविधान का 75वां अमृत वर्ष होगा। लेकिन संविधान जब तक कोर्ट-कचहरियों की बहसों तक महदूद रहेगा, तब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र उपेक्षित विषय ही बना रहेगा। जब यह जन-सामान्य के हितों का रक्षक है, तो इसे आम-जन के विमर्श का विषय भी बनना चाहिए। सामान्य लोगों को भी यह जानना चाहिए कि संविधान विशेष है, तो क्यों और किसके लिए है?
छात्रों को पढ़ाया जाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का है। विचारणीय प्रश्न यह है कि संविधान इतना बड़ा क्यों है। क्या निर्मात्री समिति के चेयरमैन डॉ. आंबेडकर के पास फुर्सत का समय बहुत था, या संविधान समिति के सदस्यों ने उन्हें अपेक्षा से अधिक समय और सहयोग दिया था? कदाचित नहीं, समिति के सहयोगी सदस्यों की उदासीनता, अस्वस्थता और अन्य व्यस्तताओं के कारण अंततः ड्राफ्टिंग का सारा कार्य उन्हें स्वयं करना पड़ा। जबकि संविधान निर्माण के आखिरी दिनों में वह एक फोडे़ का दर्द सह रहे थे, मंत्रालय जाने से पहले उनकी पत्नी डॉ. सविता कबीर उन्हें इंजेक्शन लगाया करती थीं। उनके मंत्रालय ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विशेष निर्देश पर उनके लिए एक अलग प्रकार की कुर्सी बनवाई थी, ताकि उनके शरीर के दुखते हिस्से पर दबाव न पडे़। जब उनके शरीर की ऐसी अप्रत्याशित स्थिति थी, तब उन्होंने दुनिया का विशालतम संविधान तैयार करने की योजना क्यों बनाई?
संविधान की प्रति उलट-पलटकर कोई गैर-अधिवक्ता भी बता देगा कि संविधान अनेक उप अध्यायों सहित अनेक परिशिष्टों और कई अधिसूचियों में बंधा हुआ है। संविधान पर अमल करना कानून का राज्य कायम करना होता है। संविधान विविधता में एकता को आधारभूत प्रावधान देता है। परंतु ऐसा कहने से न तो इसके विशालतम होने की वजह का पता चलता है और न विविधता के का ही आभास होता है। बल्कि विविधताओं में छिपी विषमताओं पर पर्दा ही पड़ा रह जाता है। जबकि संविधान सामाजिक और आर्थिक यथास्थितियों को शाश्वत रखने की किंचित भी मोहलत नहीं देता है। यह पर्दा वर्ण-धर्म जनित परंपरागत संस्करों और स्वभावगत व्यवहारों का है। डॉ. आंबेडकर को इस स्थिति का आभास था, सो उन्हें लगा कि जो लिखित नहीं होगा, वह स्वेच्छया अमल में नहीं आएगा। सामंती स्वभाव और संस्कार लोकतंत्र के आड़े आ जाएंगे। भारतीय समाज की संरचना के इसी ‘इतिहास-बोध' ने डॉ. आंबेडकर को दुनिया का सबसे बड़ा संविधान बनाने को विवश किया।
संविधान स्वतंत्रता को जन-जन तक पहुंचाने का पथ प्रशस्त करता है, परंतु उस पथ की सार्थकता तो पथिकों यानी ‘हम भारत के लोगों' पर निर्भर करती है। सच में संविधान हमें वंशानुगत सामंती-राजशाही के अंधेरों से निकाल ले जाने वाली लोक-पथ प्रदर्शक मशाल है, पर यह मशाल थामनी तो हमारे मजबूत हाथों को ही पडे़गी। संविधान स्वयं तो राष्ट्र को कल्पित स्वर्ग सदृश्य नागरिक जीवन की वास्तविकताओं को प्रकाशमान नहीं कर सकता।
गांधी जी का सख्त हस्तक्षेप न हुआ होता, तो संविधान भी उन्हीं से बनवाया जाता, जिनसे आजादी ली गई थी। गांधी जी डॉ. आंबेडकर की पात्रता बखूबी जानते थे, सो उन्होंने उनका नाम प्रस्तावित करते हुए कहा था कि यदि डॉ. आंबेडकर को संविधान निर्माण का कार्य नहीं सौंपा गया, तो इससे उनका तो कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन देश का ऐसा नुकसान होगा, जिसकी भरपाई नहीं हो पाएगी। देश को गर्व होना चाहिए कि उसके पास आंबेडकर के रूप में समर्थ और सक्षम पूर्ण स्वदेशी कानूनविद हैं।
कांग्रेस में डॉ. आंबेडकर का समर्थन कम और विरोध अधिक था, क्योंकि वह ‘स्वराज दो' के समांतर ‘अस्पृश्यता का अंत करो' आंदोलन चला रहे थे। उन्हें आशंका थी कि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण से उन्हें दूर ही रखा जाएगा। इसलिए उन्होंने ‘स्टेट ऐंड माइनॉरिटी' (राज्य और अल्पसंख्यक) नामक दस्तावेज तैयार कर दिया था, कि मैं सामाजिक और राजनीतिक, दोहरी दासता में रह रहे लोगों की मुक्ति के उपक्रम अवश्य करूंगा।
-लेखक साहित्यकार एवं दिल्ली विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।