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खुदा की जगह मुद्रा का ध्यान

Tue, 07 May 2013 09:53 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 07 May 2013 09:53 PM IST
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concentrate at money instead of god

शेख बाबा फरीद अत्यंत विरक्त संत थे। धन संचय को वह अनर्थ की जड़ मानते थे तथा अपने पास धन-संपत्ति कुछ नहीं रखते थे।

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एक दिन अरब देश का एक धनिक बाबा फरीद से आशीर्वाद लेने गया। बाबा ने उसे प्रेरणा दी, खुदा का नाम जपो तथा कमाई का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा गरीबों की भलाई में लगाते रहो। किसी का दिल दुखाने वाला कोई काम कदापि न करो। इससे तुम्हें आत्मिक शांति मिलेगी और खुदा भी तुम पर अपनी रहमत रखेगा।

शेख फरीद के चरणों में झुककर धनिक ने श्रद्धावश कुछ मुद्राएं रख दी। बाबा ने अपने शिष्य को आदेश दिया, इन सभी मुद्राओं को जरूरतमंदों के बीच बांट दो। शिष्य ने मुद्राएं गरीबों में बांट दीं। बांटते समय एक मुद्रा भूलवश जमीन पर गिर गई। बाद में शिष्य की निगाह उस पर पड़ी, तो उसने उसे उठाकर अपने पास रख लिया कि अगले दिन किसी को दे देगा।
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शेख फरीद शाम की नमाज अता करने बैठे, तो उन्हें मुद्रा का ध्यान आया। उन्होंने शिष्य को बुलाया और पूछा, सवेरे मिली तमाम मुद्राएं बांट दी होगी। उसने उन्हें बताया, एक मुद्रा जमीन पर गिर गई थी, वह अब भी मेरे पास है। यह सुनकर शेख फरीद ने कहा, उसे इसी वक्त किसी को दे आओ, तब सोना।
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शिष्य ने आज्ञा का तत्काल पालन किया। वह मुद्रा किसी को देने के बाद ही बाबा फरीद ने नमाज अता की और उन्हें खुदा की अनुभूति हुई।

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