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सारी ताकत अपने हाथ में रखने की होड़

Tue, 02 Sep 2014 07:09 PM IST
मारूफ रजा
मारूफ रजा Updated Tue, 02 Sep 2014 07:09 PM IST
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competition of centralise all powers

भारत और पश्चिमी देश पाकिस्तान को समझने में सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि वे उसका आकलन लोकतांत्रिक राष्ट्र के अपने पैमानों पर करते हैं। दरअसल पाकिस्तान के इतिहास और फिलहाल वहां के जो अंदरूनी हालात हैं, उन्हें देखते हुए यह सोच एक बार फिर गलत साबित हुई है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुन ली गई सरकार का पूरा कार्यकाल बगैर किसी व्यवधान के चलता रहेगा और सरकारी संस्थान प्रधानमंत्री के हुक्म पर चलते रहेंगे।

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पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है, जहां लोकतंत्र पर हमेशा ही खतरा मंडराता रहा है। इसमें सबसे बड़ी गलती वहां के राजनीतिज्ञों की है। अस्तित्व में आने के बाद से ही वहां के नेताओं में देश के हित से ज्यादा निजी फायदों पर ध्यान देने की प्रवृत्ति रही है। तीसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए नवाज शरीफ से काफी उम्मीदें लगाई जा रही थीं, मगर उन्होंने फिर से पुरानी गलतियां दोहराईं। पाकिस्तान की सेना अर्थव्यवस्था नहीं समझती। मगर वह यह जरूर चाहती है कि भारत व पाकिस्तान के रिश्ते, कश्मीर, अफगानिस्तान, परमाणु हथियार, अमेरिका और चीन से जुड़े मुद्दों पर उसकी पकड़ बनी रहे। बाकी अर्थव्यवस्था, कानून व व्यवस्था, संस्थागत विकास इत्यादि पर सरकार के ध्यान देने से उसे कोई ऐतराज नहीं होता। मगर शरीफ ने पिछली बार की तरह इस बार भी सारी ताकत अपने हाथ में रखने की कोशिश की। प्रधानमंत्री शरीफ का यों पंख फैलाना, रावलपिंडी के जनरलों को कहां रास आने वाला था!
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पाकिस्तान में सेना या तो ताकत के बल पर प्रधानमंत्री पर नियंत्रण करती है, या परोक्ष  ढंग से प्रधानमंत्री को इस कदर उलझा देती है कि सब मानने लगें कि सरकार नाकारा है। इस बार वहां कुछ ऐसा ही हुआ है। वरना क्या इमरान खान और कादरी की इतनी हैसियत है कि सेना की मदद के बगैर पुलिस से इस तरह टक्कर ले पाते? फिर इमरान खान चुनावों में धांधली के जो आरोप लगा रहे हैं, वे भी सही नहीं हैं। पाकिस्तान के चुनाव संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में हुए थे। छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें, तो सभी ने वहां निष्पक्ष ढंग से चुनाव संपन्न होने की बात की। फिर ऐसा क्या हो गया कि चुनाव के इतने समय बाद इमरान सक्रिय हुए।
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पाकिस्तान में प्राकृतिक संसाधन, काबिलियत और मानवीय संसाधन की कमी नहीं है, कमी है तो सुयोग्य नेतृत्व की। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक नेतृत्व से लोगों का मोहभंग होता आया है। असल में, पाकिस्तान धीरे-धीरे उत्तर कोरिया बनने की ओर बढ़ रहा है। हालांकि वहां के अंदरूनी हालात का भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। मगर भारत और पूरी दुनिया को यह जरूर समझना होगा कि पाकिस्तान को गवर्नेंस के दूसरे मॉडल की जरूरत है। रक्षा और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े वैदेशिक और कूटनीतिक मसले सेना के जनरलों को सौंपे जा सकते हैं। सेना के ही किसी पुराने जनरल को राष्ट्रपति बनाया जा सकता है।


फिर अगर प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक ढंग से भी चुना जाए, तो सेना को कोई ऐतराज नहीं होगा। मगर पाकिस्तान के निर्वाचित प्रधानमंत्रियों में पूरी ताकत अपने हाथ में लेने की जो लालसा रहती है, वही असल दिक्कत है।

(लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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