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हमारे हाथों में झुनझुना

Mon, 03 Dec 2012 08:07 AM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Mon, 03 Dec 2012 08:07 AM IST
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आपने क्या कभी इस बात पर तवज्जो दी है कि कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ क्यों है। हाथ हमारे शरीर का सबसे महत्वपू्र्ण अंग है, और मानव जीवन के तमाम महत्वपूर्ण काम भी हाथों से ही संपन्न होते हैं। इसके बाद क्या यह समझाने की जरूरत है कि इस देश में कांग्रेस से ज्यादा महत्वपूर्ण पार्टी कोई और नहीं है। कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ भले ही बाद में बना हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि आजादी के बाद इस पार्टी ने ही कई महत्वपूर्ण काम अपने कर कमलों से संपन्न किए हैं। चूंकि अच्छा काम करने के साथ-साथ घोटालों को अंजाम देने में भी हाथ का समान सदुपयोग होता है, इसलिए कांग्रेस दोनों ही मोरचों पर एक समान कमाल दिखाने में माहिर है। हाथ को अपना चुनाव चिह्न बनाकर उसने तमाम पार्टियों को कहीं पीछे धकेल दिया है।

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लेकिन कांग्रेस के हाथ को केवल हाथ समझने की गलती न की जाए। उसे पूरी तरह समझ पाने में बड़े-बड़े दिग्गज फेल हो गए हैं। क्या आपने कभी गौर किया है कि छपे हुए चुनाव चिह्न हाथ का अंगूठा दिखने में बाएं हाथ का लगता है या दाएं हाथ का? यह भी कि हाथ कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन की किस-किस क्षेत्रीय पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है? प्रत्येक उंगली के पोर-पोर में और मध्य में स्थित हथेली की लकीरों में पैठ बनाकर बैठी अनेकानेक अल्पसंख्यक पार्टियां क्या नतीजा तय करेंगी? को-ऑपरेटिव तरीके की राजनीतिक व्यवस्था अगर जीत गई, तो 'कौन' जैसे सर्वनामी प्रश्न आगे भी उठेंगे। जैसे कि प्रधानमंत्री की कुरसी पर कौन? उपप्रधानपद भी परंपरा में आ गया है, तो उस पर कौन? विविध मंत्रालयों में कौन? अब तो वंशवाद और रिश्तेदारी-निभाव की भी निकल पड़ी है। चाहे संसदीय चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, टिकट वितरण में रिश्तेदारी का खास खयाल रखा ही जाना चाहिए, ताकि पार्टी और आने वाली सरकार का पांच वर्षीय भविष्य सुरक्षित रहे और कहीं से भी कोई विघ्न पैदा न हो।
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कुछ लोग भ्रष्टाचार खत्म करने का ख्वाब पाले हुए हैं। वे नहीं जानते कि घपलेबाजी तो होती ही रहेगी, आखिर चुनाव जीतने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। देश का क्या है! एक नक्शा ही तो है। जनता का क्या है! वह तो कैसे भी रह लेगी। चाहे जितने लोकपाल बिल पास करा लो, वोट देने वाली जनता के हाथ में हमेशा झुनझुना ही आएगा।
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