ना आना इस देश आमिर?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मैं पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करता, न दुआओं पर। आमिर, फिर भी न जाने क्यों ये मन कह रहा है कि मैं आप के लिए दुआ करूं कि इस मुल्क में अगली बार जन्म न लें। हमारा जन्म किस मुल्क, मजहब या जाति में होगा, ये हमारे हाथ में नहीं है, फिर भी अगली बार पैदा होने से पहले शाहनवाज हुसैन या गिरिराज सिंह जैसे नेताओं से मशविरा कर लें कि पैदा होने के लिए पाकिस्तान मुफीद है या जार्डन, सीरिया और ईरान। चंद निष्पक्ष पत्रकारों ने, जिन्हें 2002 याद है और 1984 भी, कई ऐसे मुल्कों के नाम गिनाए हैं, जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और स्वीडन, इन पर भी सोच सकते हैं।
दरअसल सहिष्णुता घटी है या नहीं, ये बहसतलब ही नहीं है। बहस का मुद्दा ये है कि मुल्क छोड़ने की बात हुई, वो भी आपकी पत्नी की ओर से। आप की पत्नी मुल्क छोड़ने की बात कहकर दुखी थीं या खुश, ये भी बहस का मुद्दा नहीं है। आपने मुल्क छोड़ने की बात की और दुनिया भर में ये सवाल फिर उठा कि भारत की बहुलता पर संकट है क्या? ये सवाल बिहार चुनाव के बाद खत्म मान लिया गया था। बकौल वीके सिंह, जिन्होंने उठाया था उन्हें मोटी रकम मिली थी। आप भी जानते होंगे कि उनमें से अधिकांश हिंदी के फटेहाल लेखक या भाषाई साहित्यकार थे, जिनकी किताबें भी मुश्किल से बिकती हैं। वीके सिंह के ब्रह्मज्ञान पर कई ने भरोसा भी कर लिया था। इसी मुल्क में अरबों की कमाई आपने की और ये मुद्दा फिर से उठा दिया। देश छोड़ने की बात कहने का हक लता दीदी को है, क्योंकि उनके घर सामने फ्लाईओवर बनाने की बात होती है। कमल हासन साहब के पास है, क्योंकि उनकी फिल्म रोक दी जाती है। और दूसरी सरकार के दौर में कई लोगों ने देश छोड़ दिया था, ये बात प्रधानमंत्री भी कहते हैं। लेकिन इस सरकार के दौर में ऐसी बात!! आमिर आप 'कैलकुलेटिव' नहीं है, 'इंम्पल्सिव' हैं। ये आप भी कहते हैं।
उनसे भी नहीं सीखते। उन्होंने पीके की सफलता भी अपने खाते में दर्ज करा ली, जबकि इन्हीं के भतीजे और भांजे उस समय अदालतों में मुकदमा कर रहे थे, अपनी आहत धार्मिक भावनाओं का मुजाहिरा कर रहे थे। आपने हाथ में जो ट्रांजिस्टर पकड़ा था, उससे उन्हें दिक्कत थी। मैंने तो स्कूल में ही खाकी निक्कर पहनी, क्योंकि तब वह यूनिफॉर्म थी। उसके बाद कभी नहीं पहनी और मेरे टिकट के पैसे भी उन्होंने अपने खाते में क्रेडिट कर लिए, बोले देश सहिष्णु नहीं होता तो पीके करोड़ों नहीं कमाती। अरे देखने तो मेरे जैसे गए थे, वे तो पुतला फूंक रहे थे।
भावनाओं की चोरी का मुकदमा दर्ज नहीं होता। इन्होंने भगत सिंह, महात्मा गांधी और भीम राव अंबेडकर की भावनाएं चुरा ली, मेरी क्या हैसियत? इस मुल्क में 'मन की बात' कहने की इजाजत केवल एक ही शख्स को है और वह उनका सबसे दुलारा बेटा है। 'मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं' कहकर उसने कई खिलौने तोड़ डाले।
आमिर, आपने मन की बात कहने की गलती कर दी। ये ज्या पॉल सात्र का देश नहीं है, न सत्ता में चार्ल्स दि गॉल जैसा शासक बैठा है, जो आपको या आपके जैसे सैकड़ों कलाकारों को 'देश की आत्मा' बताने का जीवट दिखा सके। दरअसल ये खेल है, जिसे कभी बाबरी मस्जिद पर खेला जाता है और कभी दादरी में। फिलहाल, आप इस खेल का शिकार हो चुके हैं।
एक गीत की चंद पंक्तियां हैं-
साथी न संगी कोई, सखी न सहेली,
किन संग खेलेगी, तू लाडो अकेली
यही भेजूं संदेश, मेरी लाडो
कि तू ना आना इस देश मेरी लाडो
ये गीत आपके लिए भी है- फिर ना आना इस देश आमिर।