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कमान किसानों के हाथ, अफवाहों को दरकिनार करने का वक्त, पढ़े वरुण गांधी का आलेख
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किसान (फाइल फोटो)
- फोटो : पीटीआई
दिसंबर 2010 में, देश के समाचार पत्र 'प्याज की सबसे बड़ी डकैती' की खबरों से भरे हुए थे। खबरों में बताया गया था कि सट्टा कारोबारियों ने प्याज की मंडियों को कब्जे में ले लिया है, और दिल्ली में थोक व्यापारियों ने प्याज 34 रुपये किलो खरीदा, जबकि 135 प्रतिशत महंगे दाम पर 80 रुपये में बेचा। आमतौर पर, भारत का 45 फीसदी प्याज महाराष्ट्र और कर्नाटक से आता है।
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हालांकि, नवंबर में भारत के प्याज कारोबार के केंद्र नासिक में और इसके आसपास के इलाकों में बहुत ज्यादा बारिश हुई थी, जिससे बड़े बाजारों में प्याज के आने में देरी हुई। केंद्र सरकार ने तुरंत घरेलू संकट में दखल देते हुए प्याज के निर्यात पर पाबंदी लगाई, आयात शुल्क घटाया और यहां तक कि पाकिस्तान से भी आयात किया, जहां खुदरा बाजार में प्याज पाकिस्तानी मुद्रा में 40 रुपये किलो बिक रहा था। परिवहन और भंडारण लागत का खर्च निकालने के बाद भी, बिचौलियों के लिए मुनाफा साफ तौर पर बहुत ज्यादा था। हालांकि किसानों को बहुत कम मुनाफा हुआ। जब थोक कीमतें घटने लगीं, तब भी प्याज की खुदरा कीमतें कुछ हफ्तों तक ऊंची ही रहीं।
इसके लिए तत्कालीन सरकार की नीतियां भी आंशिक रूप से जिम्मेदार थीं। सितंबर और अक्तूबर, 2010 में बेमौसम बारिश से प्याज की फसल बर्बाद हुई (35-40 फीसदी फसल का नुकसान हुआ), फिर भी व्यापारियों को अक्तूबर 2010 में 1.03 लाख टन प्याज का निर्यात करने की छूट दी गई। लेकिन इससे भी ज्यादा, प्याज का मार्केंटिंग ढांचा एक प्रमुख कारक बना हुआ है। अधिकांश प्याज किसानों के पास छोटे खेत हैं, उन्हें अनिश्चित मौसम का सामना करना होता है और अपनी उपज का अंतिम मूल्य तय करने में उनकी भूमिका बहुत सीमित होती है।
भारत के अलग क्षेत्रों में अलग किस्म का प्याज पसंद किया जाता है- पूर्वी हिस्से में छोटे आकार का पसंद किया जाता है, जबकि उत्तर और पश्चिम भारत के उपभोक्ता बड़े आकार का प्याज पसंद करते हैं। अधिकांश व्यापारी अपने गोदामों में उपज को जमा करने के लिए बाजारों में अलग-अलग किसानों से छोटे लॉट खरीदते हैं। इस प्याज को बड़े-छोटे आकार के हिसाब से छांट कर सबसे अच्छी कीमत देने वाली मंडियों में भेज दिया जाता है।
किसान के पास प्याज के दाम के मामले में सिर्फ अपना स्थानीय बाजार है, जबकि ऐसे व्यापारी उपज बेचने से पहले सबसे अच्छा मुनाफा देने वाले बाजार की तलाश करते हैं, जिसमें निर्यात की संभावना के साथ क्षेत्रीय और राष्ट्रीय बाजार शामिल हैं। व्यापारी के हाथ में कुंजी है- वह विशाल भंडारण गोदाम, जो प्याज को सड़ने से बचा सकता है, और कमीशन एजेंट व तमाम कृषि उपज विपणन समिति(एपीएमसी) बाजारों की मार्केटिंग समितियों की सदस्यता के साथ प्रभावशाली स्थिति में है। वहीं मार्केटिंग गतिविधियों के लिए सरकारी लाइसेंस की अनिवार्यता बिचौलियों के बीच प्रतिस्पर्धा को सीमित करती है।
हालांकि, यह विनियमित मार्केटिंग प्रणाली अपने अच्छे इरादों के बावजूद उल्लेखनीय खामियां ले आई है। मार्केटिंग के दौरान भारत के करीब 15 से 50 फीसदी फल बर्बाद हो जाते हैं। इस तरह की विनियमित मंडियों के अंदर की सड़कें आमतौर पर टूटी-फूटी होती हैं, जबकि नीलामी भीड़ के बीच खुली जगहों पर की जाती है। चूंकि एपीएमसी कानून आमतौर पर मंडी के बाहर किसानों से खरीद से मनाही करता है, इसलिए लंबी लाइनों में लगकर अपनी उपज मंडी के अंदर लाने का जिम्मा किसानों पर होता है।
अधिकांश किसानों को अपनी उपज इकट्ठा बेचने से रोका जाता है, जबकि निर्यातकों और खुदरा कारोबारियों को ऐसे किसानों तक सीधी पहुंच से रोका जाता है। बोली लगाने की प्रक्रिया के दौरान आढ़तियों और मंडी के अधिकारियों की मिलीभगत आमतौर पर यह पक्का करती है कि सही मूल्य सामने न आए, जिससे किसान उचित मूल्य की जगह कम मूल्य के जाल में फंसता है। सच्चाई यह है कि अक्सर अंतिम-ग्राहक द्वारा दिए जाने वाले मूल्य का केवल 10 से 40 फीसदी किसान तक पहुंचता है।
इसे सुधारने के लिए प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व में, केंद्र सरकार ने पांच जून, 2020 को तीन अध्यादेश जारी किए- जो अब कानून बनने जा रहे हैं। इन विधेयकों के बारे में लोगों के बीच में कई अफवाहें हैं। उदाहरण के लिए, कहा जा रहा है कि तीनों विधेयक अपनी प्रकृति में किसान विरोधी हैं। यह याद रखना चाहिए कि भारत की कृषि मंडियों में सीमित प्रतिस्पर्धा है और किसानों को अनुचित कमीशन देना पड़ता है। ऐसे किसान सही मूल्य पर खुदरा विक्रेताओं को सीधे बेचने में असमर्थ हैं- संसद से पारित ये विधेयक किसानों को अपनी कृषि उपज की बिक्री के लिए बेहतर विकल्प प्रदान करने में मदद करेंगे।
इसके अलावा, कहा जा रहा है कि इन विधेयकों से बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए किसानों का शोषण करना आसान हो जाएगा। इसके उलट, हमारे पास अंततः कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध खेती) और किसानों व कॉरपोरेट इकाइयों के बीच कृषि उपज पर व्यापार समझौता करने के लिए सुव्यवस्थित ढांचा होगा। इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किसी भी किसान को अपनी मर्जी के खिलाफ समझौता करने की जरूरत नहीं है। और मदद के लिए एपीएमसी व्यवस्था मौजूद होगी। यह भी कहा जा रहा है कि विधेयक मौजूदा कृषि मंडियों को बर्बाद कर देगा।
सच्चाई यह है कि विधेयक घोषित मंडियों से बाहर भी कृषि उपज की बिक्री और मार्केटिंग को खोलने का मौका देता है। यह अंतर-राज्य व्यापार बाधाओं को दूर करेगा और कृषि उपज की इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग को आसान बनाएगा, और कृषि उपज का एकल एकीकृत बाजार बनाने में मदद करेगा, जो इलेक्ट्रॉनिक ढंग से काम करेगा। यह भी कहा गया कि विधेयक में गरीब लोगों की खाद्य सुरक्षा चिंताओं का ध्यान नहीं रखा गया है। सरकार अब भी कृषि उपज के लिए कीमतें तय करने का अधिकार रखती है। इसके अलावा भारतीय खाद्य निगम चावल और गेहूं जैसी आवश्यक वस्तुओं का भंडारण करना जारी रखेगा और राशन उपलब्ध कराएगा।
भारत का कृषि क्षेत्र महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजर रहा है। किसानों की उपज के निपटान के वैकल्पिक उपायों की मांग बढ़ती जा रही है- विकल्प उपलब्ध कराने से उन्हें ज्यादा मौके मिलेंगे। साथ ही खाद्यान्न बर्बादी घटेगी और परिवहन आसान होगा। हमें सरकार के इस कदम का स्वागत करना चाहिए और बदलाव की इस घड़ी में प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में, सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए।