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आओ क्लीन चिट लेकर आएं
दिलीप गुप्ते
Updated Wed, 25 Jun 2014 10:51 AM IST
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महाराष्ट्र के मंत्री महोदय को एक और घोटाले के मामले में क्लीन चिट मिल गई। उनके शानदार ड्राइंग रूम में वह चिट एक और सुनहरी फ्रेम में जड़ गई। इन मंत्री महोदय का क्लीन चिट से उतना ही गहरा नाता है, जितना कि घोटालों से है। इधर आरोप लगा और उधर क्लीन चिट तैयार। कह नहीं सकते कि वह घोटाले करने के लिए मंत्री बने हैं या क्लीन चिट पाने के लिए। यह भी हो सकता है कि वह गिनीज बुक में क्लीन चिट के लिए अपना नाम दर्ज करवाना चाहते हों। वैसे महाराष्ट्र कई मामलों में आगे है। अंधविश्वास के मामले में उसे आसानी से गिनीज बुक में स्थान मिल सकता है। इसके अलावा सूखे के मामले में भी यह राज्य सबसे आगे है।
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हालांकि सूखाग्रस्त महाराष्ट्र का इलाज यहीं के एक मंत्री के पास है। उनमें इतना दम है कि वह अपनी पेशाब से पूरा बांध भर सकते हैं। जी हां, वह ऐसी घोषणा कर चुके हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि ऐसे मंत्री के होते हुए राज्य सरकार बेकार में ही लंबा-चौड़ा जल संसाधन विभाग क्यों खोले हुए है। जहां सूखा पड़ा कि भेजा मंत्री जी को। सूखा गायब! विदर्भ, मराठवाड़ा हराभरा। यहां के मंत्री उत्तर प्रदेश के मंत्रियों की ही तरह कुछ भी बोलने को आजाद हैं। अब हाल के चुनावों में मामाजी वोटरों को साफ-साफ धमका गए कि यदि दीदी को वोट नहीं दिया, तो उन्हें प्यासा मार डालेंगे।
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सवाल यह उठता है कि आखिर मामाजी को क्लीन चिट इतनी जल्दी कैसे मिल जाती है? ऐसा कौन-सा आयोग है, जो सरकार की घोंघा नीति पछाड़ता हुआ तुरंत क्लीन चिट थमा देता है? ऐसा लगता है कि मंत्री जी के लिए क्लीन चिट का फॉर्म पहले से ही तैयार किया होगा। बस घोटाले का नाम और तारीख डालने का कष्ट उठाना पड़ता होगा। चुनाव, महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटालों की दमघोंटू भीड़ के बीच मंत्री जी की यह उपलब्धि दूसरे राज्यों तक कैसे नहीं पहुंची, यह आश्चर्य की बात है। वरना वह भी अपने लिए पहले से ही क्लीन चिट के बंडल के बंडल छपवा कर रख लेते।
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