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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   CM KCR fighting for third terms, challenges from BRS, Congress and BJP in telangana assembly election 2023

पड़ताल: तेलंगाना का चुनावी द्वंद्व, बीआरएस, कांग्रेस और भाजपा की चुनौतियां

Wed, 11 Oct 2023 06:50 AM IST
Sudhir Saxena सुधीर सक्सेना
Updated Wed, 11 Oct 2023 06:50 AM IST
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सार
केसीआर जहां तीसरी बार जनादेश चाहते हैं, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है, जबकि भाजपा दक्षिण में पैठ बनाना चाहती है।
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CM KCR fighting for third terms, challenges from BRS, Congress and BJP in telangana assembly election 2023
तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर - फोटो : Social Media

विस्तार

वर्ष 2014 में एक अलग राज्य के रूप में वजूद में आया तेलंगाना अपेक्षाकृत नया राज्य है, जो अभी तीसरे चुनावी दौर से गुजर रहा है। तेलंगाना में सत्ता अब तक एक ही पार्टी और एक ही राजनेता के हाथ में रही है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री हैं केसीआर यानी केसी राव या कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव। पहले उनकी पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति था, जिसे हाल ही में भारत राष्ट्र समिति नाम दे दिया गया है। अपनी पार्टी का अध्यक्ष रहने के साथ-साथ वह दो जून, 2014 से सूबे के मुख्यमंत्री भी हैं। राजनीतिक सूझ-बूझ और चपलता के चलते उन्हें दक्षिण भारत के क्षत्रपों में गिना जाता है।



केसीआर महत्वाकांक्षी और कद्दावर क्षेत्रीय क्षत्रप हैं। उन्होंने पार्टियां बदलीं और नई पार्टी बनाई। विधायक और सांसद रहे। पहले एनटीआर और फिर चंद्रबाबू नायडु की सरकारों में मंत्री रहे और फिर डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री। जाहिर है कि केसीआर राजनीति के राजमार्ग पर ‘टर्न’ और ‘यू-टर्न’ की महत्ता से बखूबी परिचित हैं। वर्ष 1985 से 99 के दौरान वह लगातार चार बार विधायक चुने गए। वर्ष 2000-01 में वह डिप्टी स्पीकर रहे। फिर अप्रैल, 2001 में इस्तीफा देकर उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन किया। वर्ष 2004 उनके जीवन में ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। कांग्रेस से गठजोड़ के चलते उन्होंने चुनाव में दोहरी जीत हासिल की। वह सिद्दीपेट से विधानसभा और करीमनगर से लोकसभा के लिए चुने गए। केंद्र में मंत्री के तौर पर उन्होंने काफी प्रतिष्ठा अर्जित की।


उन्हें खुद पर इतना भरोसा था कि कांग्रेस की चुनौती पर पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी यह निर्भीकता तेलंगाना के लोगों को खूब रास आई। वह दो लाख से अधिक वोटों से जीते। अब उनका संकल्प था पृथक तेलंगाना, जिसकी मांग को लेकर वह नवंबर, 2009 में आमरण अनशन पर बैठ गए। जनभावनाएं उनके साथ थीं, लिहाजा अनशन के 11वें दिन उनकी मांग मान ली गई। भारत के मानचित्र पर एक नया राज्य उभरा-तेलंगाना और वह बने राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री।

वह दिन और आज का दिन। मुख्यमंत्री केसीआर के सामने कांग्रेस और भाजपा, दोनों असहाय हैं। केसीआर के अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाना कठिन है। केसीआर जहां तीसरी बार जनादेश हासिल करने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है, जबकि कर्नाटक का किला गंवाने के बाद भाजपा तेलंगाना के गलियारे से दक्षिण में अपनी पैठ बनाना चाहती है। भाजपा का सबसे बड़ा आसरा हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने तेलंगाना में सड़क, रेल, पेट्रोलियम और शिक्षा से जुड़ी करीब 13,500 करोड़ रुपये की विविध योजनाओं की नींव रखी।

मोदी की यात्रा का प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ए. रेवंत रेड्डी ने यह कहकर मखौल उड़ाया कि प्रधानमंत्री बीआरएस (भारत राष्ट्र समिति) के प्रमोशन टूर पर आए थे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के भाषण ने भाजपा और बीआरएस के बीच एक जुबानी जंग छेड़ दी है। मोदी ने कहा कि केसीआर ने एनडीए में शामिल होने की मंशा जाहिर की थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। मोदी ने परिवारवाद और खजाने की लूट पर भी तंज किया। परिवारवाद से मोदी का आशय केसीआर के बेटे, बेटी और भतीजे के राजनीतिक वर्चस्व से था। मोदी के रहस्योद्घाटन को झूठ करार देने में केसीआर और उनके पुत्र केटीआर ने देर नहीं लगाई।

तेलंगाना में चुनावी द्वंद्व में एक नया मोड़ तब आया, जब चार अक्तूबर को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय इमली बोर्ड के गठन की अधिसूचना जारी कर दी। केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी ने इसे लंबित मांग की पूर्ति बताते हुए कहा कि बोर्ड इमली और इमली उत्पादों की वृद्धि पर ध्यान देगा। तेलंगाना देश में इमली उत्पादन में महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर है। छत्तीसगढ़ की तरह तेलंगाना में चुनावी बिसात पर चावल की तर्ज पर इमली के ‘चिये’ (बीज) बिखेर दिए गए हैं। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा की झोली में इमली के बूटे आते हैं या नहीं?

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