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आईना: जलवायु संकट से त्रस्त लोग उठाने लगे आवाज, बढ़ रही है मुकदमेबाजी
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जलवायु परिवर्तन (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
वर्ष 2017 के बाद से दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन संबंधी अदालती मामलों की कुल संख्या दोगुने से अधिक हो गई है और लगातार बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और कोलंबिया विश्वविद्यालय में सबिन सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज लॉ द्वारा प्रकाशित निष्कर्ष बताते हैं कि जलवायु संबंधी मामलों में मुकदमेबाजी न्याय हासिल करने का एक जरूरी हिस्सा बन रही है।
ज्ञात हो कि वर्ष 2020 में दुनिया में पहली बार वायु प्रदूषण मौत का सबब बना था और ब्रिटेन की एक अदालत ने यह फैसला देकर इतिहास रचा। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लंदन की एक अति व्यस्त सड़क के पास स्थित मकान में अपनी मां के साथ रहने वाली नौ साल की इला किस्सी डेब्रा की मौत के कारणों में वायु प्रदूषण भी शामिल है। इस मामले ने स्वास्थ्य, स्वच्छ वायु और जीवन जीने के उस अधिकार के बीच संबंधों की ओर ध्यान खींचा, जिसकी ब्रिटेन तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून, दोनों में ही गारंटी दी गई है। इला की मौत से तीन साल पहले की अवधि में उसके घर के आसपास वायु प्रदूषण का स्तर डब्ल्यूएचओ के पैमानों तथा यूरोपीय संघ द्वारा निर्धारित सीमाओं को पार कर गया था।
यह रिपोर्ट, ग्लोबल क्लाइमेट लिटिगेशन रिपोर्ट : 2023 स्टेटस रिव्यू, सबिन सेंटर, यूएस और ग्लोबल क्लाइमेट चेंज लिटिगेशन डाटाबेस द्वारा वर्ष 2022 तक एकत्र किए गए जलवायु परिवर्तन कानून, नीति या विज्ञान पर केंद्रित मामलों की समीक्षा पर आधारित है। इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक सार्वभौमिक मानवाधिकार के रूप में प्रकाशित किया है। जाहिर है कि अदालतें जलवायु परिवर्तन के साथ मजबूत मानवाधिकार संबंध ढूंढ रही हैं। इससे समाज में कमजोर समूहों के लिए अधिक सुरक्षा के साथ-साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय में बढ़ोतरी हो रही है।
गौरतलब है कि कुछ समय पहले कोरिया में एक बीस हफ्ते के भ्रूण की ओर से सरकार की नीतियों के खिलाफ मुकदमा किया गया। वादी का कहना था कि कोरिया सरकार की ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर लगाम लगाने की नीतियां नाकाफी हैं और जीने का सांविधानिक अधिकार छीनती हैं। वुडपेकर नाम के इस अजन्मे बच्चे के साथ 62 और बच्चे भी इस मुकदमे में शामिल हैं, जिनकी ओर से अदालत में मामला दर्ज कराया गया है। 'बेबी क्लाइमेट लिटिगेशन' नाम से चर्चित इस मुकदमे में इन बच्चों के वकील ने इस आधार पर एक सांविधानिक दावा दायर किया है कि देश के 2030 तक के जलवायु लक्ष्य वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए नाकाफी हैं और बच्चों के जीने के सांविधानिक हक का हनन करते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग से होने वाली औसत तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए जो जरूरी कार्रवाई है, उससे जलवायु नीतियां बहुत पीछे हैं। वहीं चरम मौसमी घटनाएं और प्रचंड गर्मी पहले से ही दुनिया को झुलसा रही हैं। जलवायु संकट से निपटने के लिए लोग तेजी से अदालतों का रुख कर रहे हैं और सरकारों व निजी क्षेत्र को जवाबदेह बना रहे हैं। पिछले दो वर्षों के प्रमुख जलवायु संबंधी मामलों पर यदि ध्यान दें, तो जैसे-जैसे जलवायु संबंधी मुकदमेबाजी की आवृत्ति और मात्रा बढ़ती है, कानूनी मिसाल का दायरा भी बढ़ता है। इस मुद्दे पर पहली रिपोर्ट के बाद से जलवायु परिवर्तन के मामलों की कुल संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। यह 2017 में 884 से बढ़कर 2022 में 2,180 हो गई है।
हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के बारे में बढ़ती जागरूकता ने भी निगमों के खिलाफ कार्रवाई को प्रेरित किया है। इनमें जलवायु क्षति के लिए जीवाश्म ईंधन कंपनियों और अन्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों को जिम्मेदार ठहराने की मांग करने वाले मामले शामिल हैं। यह अनिवार्य रूप से अधिक लोगों को अदालतों का सहारा लेने के लिए प्रेरित करेगा।
यह रिपोर्ट दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर कमजोर समूहों की आवाज कैसे सुनी जा रही है। 25 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और युवाओं की ओर से 34 मामले दर्ज किए गए हैं, हालांकि इनमें से ज्यादातर मामले अमेरिका के हैं, लेकिन जलवायु संबंधी मुकदमेबाजी पूरी दुनिया में जड़ें जमा रही है। अब करीब 17 फीसदी ऐसे मामले विकासशील देशों में भी रिपोर्ट किए जा रहे हैं। इनमें छोटे द्वीपीय विकासशील देश भी शामिल हैं।