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जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाईं आर्थिक मुश्किलें : जान लेती गर्मी और बदलते मौसम का स्वास्थ्य पर गहरा असर
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो :
Pixabay
विस्तार
इस साल मार्च और अप्रैल में भारत में आई हीटवेव (भीषण गर्मी की लहर) के प्रकोप को हम शायद भूल जाएं, लेकिन इसने दिखाया कि जलवायु परिवर्तन किस तरह से गर्मी के प्रकोप को बढ़ा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मेडिकल जर्नल द लैंसेट की हाल ही में आई नई रिपोर्ट भीषण गर्मी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव पर नई रोशनी डालती है। आम तौर पर भारत में अत्यंत गर्मी तभी सुर्खियां बनती है, जब उससे मौत हो जाए।
स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर द लैंसेट की सातवीं वैश्विक रिपोर्ट बताती है कि 2000-2004 और 2017-2021 के बीच भारत में भीषण गर्मी से होने वाली मौतों में भी वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट कहती है कि पूरे विश्व में तेजी से बढ़ते तापमान के कारण संवेदनशील आबादी (65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों और एक साल से कम उम्र के बच्चे) को 1986-2005 की तुलना में 2021 में कई गुना अधिक हीटवेव का सामना करना पड़ा।
उसके मुताबिक 2000-2004 और 2017-2021 के दौरान अत्यंत गर्मी से होने वाली मौतों में 68 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें कोविड-19 महामारी का भी योगदान था। दुनिया के 103 देशों पर नजर रखने वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और उसके पड़ोसी देश पाकिस्तान में मार्च से अप्रैल के बीच गर्मी की लहरें जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ीं।
अध्ययन में कहा गया है कि अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से स्वास्थ्य सीधे तौर पर प्रभावित होता है, हृदय में रक्तसंचार और श्वसन रोग जैसी अंतर्निहित स्थितियां बिगड़ती हैं, और गर्मी का दौरा पड़ता है। इसके कारण गर्भावस्था के प्रतिकूल परिणाम, खराब नींद पैटर्न, खराब मानसिक स्वास्थ्य और चोट से संबंधित मौत में वृद्धि होती है। कुल मिलाकर इससे संवेदनशील आबादी में वृद्धि होती है और उनका जोखिम बढ़ता जाता है।
अत्यंत गर्मी सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ा मसला नहीं है, बल्कि यह एक आर्थिक मुद्दा भी है। लैंसेट ने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित किया कि 2021 में भीषण गर्मी के कारण भारतीयों के संभावित 167.2 अरब श्रम घंटों का नुकसान हुआ। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद के 5.4 फीसदी के बराबर का आर्थिक नुकसान हुआ। लैंसेट के इस आकलन से हैरत नहीं होनी चाहिए। स्वास्थ्य पर अत्यधिक गर्मी के प्रभाव के बारे में सब जानते हैं।
असल में जिस चीज के बारे में कम जानकारी है या जिसके बारे में कम बातें होती हैं, वह है अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक गर्मी का असर, जिसमें कृषि भी शामिल है और इस तरह यह खाद्य सुरक्षा और पोषण से जुड़ा मसला भी है। इस साल गेहूं उगाने वाले प्रमुख क्षेत्र हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल समय से पहले आई गर्मी के कारण प्रभावित हुई, जबकि उसी समय यूक्रेन पर रूस के हमले ने वैश्विक खाद्य शृंखला को बाधित कर दिया था।
ध्यान रहे, दुनिया में खपत होने वाले गेहूं का एक चौथाई से अधिक हिस्सा रूस और यूक्रेन से आता है। इस साल के शुरू में समय से पहले आई गर्मी की लहर के दौरान राजस्थान की एक सड़क यात्रा के दौरान, मैंने जलवायु परिवर्तन के अन्य संकेतकों को देखा, जो अत्यधिक गर्मी को बढ़ावा दे रहे थे। दिल्ली और जयपुर को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे-8 पर स्थित एक ढाबे के मालिक ने मुझे बताया था कि उन्हें हर दिन बर्फ पर अतिरिक्त एक सौ साठ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, क्योंकि उनके ग्राहक 'ठंडा पानी' मांगते हैं।
यह पहला साल है, जब उन्हें समय से पहले बर्फ पर अतिरिक्त पैसा खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ा। राजस्थान के अलवर जिले के अजमेरीपुर गांव के एक बुजुर्ग किसान ने इस साल मार्च में अप्रत्याशित भीषण गर्मी के कारण हुए नुकसान को लेकर विलाप किया। उनकी सरसों की फसल, जो आम तौर पर अट्ठारह क्विंटल होती है, बमुश्किल तेरह क्विंटल ही हुई। खाद्य कीमतों पर इसके स्पष्ट प्रभाव के कारण कृषि पर तीव्र गर्मी की लहरों के प्रभाव ने बर्तन को हिला दिया था। इस साल के पूर्वार्ध में गर्मी की लहर के कई तरह के परोक्ष प्रभाव पड़े हैं, जिन पर अमूमन ध्यान नहीं जाता।
मसलन, बिजली की कटौती, जिसके कारण सिंचाई के लिए बिजली पर निर्भर किसान ही प्रभावित नहीं हुए, बल्कि खराब पर्यावरण और बदतर तथा तंग क्षेत्रों में रहने वाले शहरी गरीब भी प्रभावित हुए। शहरी गरीब, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाले अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, आम तौर पर अधिक समय बाहर बिताते हैं, गर्मी के संपर्क में अधिक होते हैं और उन्हें बहुत कम सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होती है।
यह स्वास्थ्य के अलावा श्रम उत्पादकता को प्रभावित करता है, जैसा कि द लैंसेट की रिपोर्ट दिखा रही है। तेज शहरीकरण की ओर बढ़ते भारत जैसे देश में यह भी गौर करने वाली बात है कि सघन निर्माण के कारण शहर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। अधिक गर्मी का मतलब है, बिजली की अधिक मांग। ऐसे में क्या किया जाए? स्पष्ट है कि सिर्फ तापमान की निगरानी ही पर्याप्त नहीं है।
उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों या उच्च जोखिम वाले समूहों की पहचान करने के लिए हमें गर्मी और आर्द्रता को ध्यान में रखने की जरूरत है। जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में 'हीट वल्नरेबिलिटी इंडेक्स' (गर्मी संवेदनशीलता सूचकांक) की जरूरत है, जिसमें भौगोलिक, जनसांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक कारकों को शामिल किया जाए। जहां हममें से कई लोग वातानुकूलित घरों और कार्यालयों में रहकर भीषण गर्मी से खुद को बचा सकते हैं, वहीं लू से प्रभावित करोड़ों लोगों के पास ऐसी विलासिता नहीं होती।
इसलिए, गर्मी से निपटने की योजनाओं में अत्यधिक कमजोर आबादी के लिए विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए। भारत में अहमदाबाद पहला शहर है, जिसने मई, 2010 में गर्मी से 1,300 से अधिक लोगों की मौतों के बाद एक 'हीट ऐक्शन प्लान' विकसित किया था। अहमदबाद म़ॉडल में पूर्व चेतावनी प्रणाली, कलर कोडेड अलर्ट, सामुदायिक संपर्क कार्यक्रम, स्कूलों और फैक्टरियों के समय में कटौती जैसे उपाय शामिल हैं। भारत के दूसरे शहरों ने अत्यंत गर्मी की स्थिति में इसका अनुसरण किया है। द लैंसेट की रिपोर्ट सचमुच एक चेतावनी है। हमें गर्म हो रहे हमारे ग्रह के प्रभावों को कम करके नहीं आंकना चाहिए।