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मौसम: अल नीनो के प्रभाव में बढ़ सकती है गर्मी
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अमर उजाला
विस्तार
देश में नौ साल तक लगातार अच्छा मानसून रहने के बाद अब एक बार फिर से 'अल नीनो' की परिस्थितियां निर्मित होती नजर आ रही हैं। इसके कारण इस साल देश में गर्मियों का मौसम शुष्क व बेहद गर्म रह सकता है। इसी वजह से इस वर्ष ज्यादा लू चलने की भविष्यवाणी भी की गई है। लेकिन इससे भी बुरी खबर यह हो सकती है कि अल नीनो के प्रभाव की वजह से मानसून खराब हो सकता है। अमेरिका की मौसम एजेंसी ‘नेशनल ओशनिक ऐंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (एनओएए) के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार, इस वर्ष मई से जुलाई के बीच अल नीनो की परिस्थितियां छा सकती हैं और इसका असर आगामी मानसून पर भी पड़ सकता है।
दरअसल इस बार की फरवरी में वसंत का एहसास हुए बगैर मौसम में गर्मी दिनों-दिन बढ़ती गई और देश के उत्तर-पश्चिम, मध्य व पश्चिम भारत से लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ‘हीट वेव’ जैसे हालात बनते जा रहे हैं। मैदानी क्षेत्रों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक होने पर, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस और तटीय क्षेत्रों में तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर हीट वेव का अलर्ट होता है।
इससे ऐसा लग रहा है कि हमारे यहां साल 1998 की परिस्थितियां बन सकती हैं। साल 1998 में भारत में 90.6 फीसदी बारिश हुई थी यानी सामान्य से 9.4 फीसदी कम। सामान्य से 10 फीसदी कम होने पर मौसम विज्ञान की परिभाषा में उसे ‘माइल्ड ड्राउट’ यानी कि ‘हल्का सूखा’ वर्ष घोषित किया जाता है। अमेरिकन जियो साइंस इंस्टीट्यूट के अनुसार, अल नीनो (और इसी तरह ला नीनो भी) का संबंध प्रशांत महासागर की समुद्री सतह के तापमान में समय-समय पर होने वाले बदलावों से है। अल नीनो एक चक्रीय पर्यावरणीय स्थिति है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्य क्षेत्र में शुरू होती है।
सामान्य शब्दों में कहें, तो अल नीनो वह प्राकृतिक घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर का गर्म पानी उत्तर और दक्षिण अमेरिका की ओर फैलता है और फिर इससे पूरी दुनिया में तापमान बढ़ता है। अल नीनो का सर्वाधिक प्रत्यक्ष असर बारिश के पैटर्न पर पड़ता है। भारत की मानसूनी बारिश भी इसके असर से बची नहीं रह पाती है और इस वजह से बारिश कम होती है। इसमें सामान्य बारिश की संभावना केवल 10 फीसदी तक होती है। ऐसा ही असर इंडोनेशिया, मलयेशिया, फिलीपींस और आसपास के क्षेत्रों में भी हो सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों में भी लगभग पूरी खेती बारिश पर ही निर्भर होती है। बारिश कम होने से और फसल का उत्पादन कम होने की वजह से एक बड़े वर्ग के सामने खाद्य समस्या उत्पन्न हो सकती है। अफ्रीका महाद्वीप के गरीब देशों में तो हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं।
गौरतलब है कि पिछले साल से दुनिया महंगाई की समस्या से परेशान है। वर्ष 2023 में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम ने महंगाई के 8.8 प्रतिशत से घटकर 6.5 प्रतिशत का अनुमान लगाया है, लेकिन अगर अल नीनो का असर बनता है, तो इस अनुमान पर पानी फिर सकता है और दुनिया के अधिकांश क्षेत्र फिर से महंगाई के दुश्चक्र में फंस सकते हैं।
हालांकि अल नीनो से यह सिद्ध नहीं होता है कि सूखा पड़ेगा ही, क्योंकि 40 प्रतिशत अल नीनो में सूखे की स्थिति नहीं आई। भारत में वर्ष 1951 के बाद से 10 बार ऐसे मौके आए हैं, जब अल नीनो की वजह से सूखे की स्थिति उत्पन्न हुई। जबकि कई अल नीनो ऐसे भी रहे जब सूखा नहीं पड़ा। कई बार ऐसे सूखे की स्थिति भी निर्मित हुई, जिसकी वजह अल नीनो नहीं थी। सामान्य से 10 प्रतिशत कम बारिश होने पर हल्का सूखा, 15 से 20 प्रतिशत कम होने पर मध्यम सूखा और 20 प्रतिशत से कम बारिश होने पर सूखे की गंभीर स्थिति होती है। भारत में सबसे बुरा अल नीनो साल 1972 का रहा है, जब सामान्य से 24 फीसदी कम बारिश हुई थी। इसके बाद 2009 में जब 22 फीसदी कम बारिश हुई।