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जलवायु परिवर्तन: कार्बन उत्सर्जन को लेकर विकसित देशों का दोहरापन, कॉप-28 में समाधान निकलने की आस
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विस्तार
जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने के लिए क्लाइमेट फाइनेंस या जलवायु वित्त बेहद जरूरी है, क्योंकि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है। बिना निवेश के एनर्जी ट्रांजिशन यानी ऊर्जा संक्रमण (पारंपरिक कोयले से बनी बिजली को चरणबद्ध तरीके से कम करते हुए उसकी जगह उत्सर्जन रहित स्वच्छ अक्षय ऊर्जा को स्थापित करना) और अनुकूलन के लिए जलवायु वित्त महत्वपूर्ण है।
ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाने और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के लिए पिछले दिनों दिल्ली में जी-20 देशों के नेताओं ने वर्ष 2030 तक वैश्विक अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को तीन गुना करने का संकल्प लिया है। वहीं 18 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा और न्यूयॉर्क जलवायु सप्ताह के अवसर पर वैश्विक नवीकरण गठबंधन (जीआरए) ने 200 से ज्यादा संगठनों की तरफ से एक खुला पत्र प्रकाशित करते हुए कॉप-28 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के फ्रेमवर्क कन्वेंशन यानी यूएनएफसीसीसी के सदस्यों का सम्मेलन) में वर्ष 2030 तक अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने का आह्वान किया है। इसमें अक्षय ऊर्जा कम से कम 11 हजार गीगावाट तक करने का लक्ष्य निर्धारित करने की बात कही गई है।
जलवायु परिवर्तन का समर्थन करने के लिए अधिक उपलब्ध और किफायती वित्त की जरूरत ही इस विवाद का प्रमुख बिंदु है। ऐसे वक्त में, जब जलवायु संकट दिन-ब-दिन और भी विकट होता जा रहा है, इस संकट से निपटने के मकसद से सततता के निर्माण, अनुकूलन सुनिश्चित करने और प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन को कम करने के लिए उठाए जा रहे कदमों की रफ्तार बेइंतहा धीमी है।
ऐसे में, यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण होगा कि ऊर्जा और वित्त रूपी दो प्रमुख पहलुओं के इर्द-गिर्द खड़े दीर्घकालिक मुद्दों को लेकर, 30 नवंबर से 12 दिसंबर, 2023 तक दुबई में आयोजित होने वाली 28वीं संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर वार्ता (कॉप-28) किसी समाधान तक पहुंचती है या नहीं, साथ ही दुनिया में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए जितने धन की जरूरत है, उतना उपलब्ध हो पाएगा या नहीं।
गौरतलब है कि वर्ष 2009 में जलवायु वित्त को लेकर एक संकल्प तय किया गया था, जिसके मुताबिक, वर्ष 2020 तक विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर प्रतिवर्ष की सहायता मुहैया कराई जानी थी, लेकिन यह प्रतिबद्धता कभी पूरी नहीं हो पाई और इसकी अवधि भी वर्ष 2025 में खत्म हो जाएगी। ऑक्सफैम के अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2020 में विकासशील देशों को जलवायु वित्त के नाम पर दी गई धनराशि का वास्तविक प्रवाह 21 अरब डॉलर से 83.3 अरब डॉलर के बीच था। पेरिस समझौते के अनुरूप जलवायु संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर की रकम बहुत कम है।
वित्तीय आवश्यकताओं को लेकर यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के ताजा विश्लेषण के मुताबिक, विकासशील देशों को वर्ष 2030 तक अपने राष्ट्रीय निर्धारित योगदान के आधे से भी कम हिस्से को पूरा करने के लिए कम से कम 60 खरब डॉलर की जरूरत होगी। यूएनएफसीसीसी में ग्लोबल नॉर्थ क्षेत्र के सिर्फ पांच सदस्य देशों- ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, जापान और ब्रिटेन ने ही ग्लोबल साउथ के देशों को जलवायु वित्त उपलब्ध कराने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताई है। दूसरे देश तो इस बारे में बात तक नहीं करना चाहते। जलवायु संबंधी विशेष अमेरिकी दूत जॉन केरी ने सख्त संदेश दिया है कि उनका देश हानि और क्षति निधि के नाम पर एक भी पैसा नहीं देगा।
जलवायु वित्त-संबंधी परियोजनाओं के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र विकासशील देशों को हरित जलवायु कोष (जीसीएफ), वैश्विक पर्यावरण सुविधा (जीईएफ) और एडेप्टेशन फंड यानी अनुकूलन निधि (एएफ) से जलवायु वित्त (सीधे और मान्यता प्राप्त संस्थाओं के माध्यम से) तक पहुंचने में सहायता करने पर केंद्रित है।