स्वच्छ भारत और सीवर में मौत
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पत्रकारिता में एक पुरानी कहावत है, जो नए पत्रकारों को अक्सर सुनाई जाती है। वह कहावत है : एक चित्र एक हजार शब्दों से अधिक असर करता है। इस कहावत की सच्चाई पिछले सप्ताह दर्दनाक ढंग से समझ में आई, जब नन्हें गौरव की अपने मृत पिता अनिल का माथा चूमते हुए तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। अनिल की मौत इसलिए हुई, क्योंकि गरीबी के मारे उसने दिल्ली नगर निगम का एक सीवर साफ करने का काम डेढ़ हजार रुपये कमाने के लिए किया था। अनिल का काम मैला ढोना था, जिसके लिए उसे जो थोड़ी बहुत दिहाड़ी मिलती थी, वह उसके परिवार के पालन-पोषण के लिए इतनी कम थी कि हाल ही में उसके एक बेटे की मौत दवा के पैसे पूरे न होने के कारण हो गई थी। अनिल की विधवा इतनी गरीब है कि पति के अंतिम संस्कार के लिए भी उसे पैसे उधार लेने पड़े।
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रोते हुए गौरव का चित्र वायरल होने के बाद दयालु लोगों ने इतने रुपये दान में दिए हैं कि अनिल जीवित होता, तो उसका जीवन बदल जाता। जिस एनजीओ ने अनिल की विधवा और उसके तीन बच्चों के लिए चंदा जमा करने का काम संभाला है, उसके मुताबिक, 2,422 लोगों ने अभी तक 51 लाख रुपये दान में दिए हैं। अनिल की मौत ने ध्यान दिलाया है कि वर्षों पहले मैला ढोने पर प्रतिबंध लगने के बाद भी देश में अनुमानतः सात लाख से अधिक परिवार हैं, जो यह अमानवीय काम करने के लिए मजबूर हैं। अनुमान यह भी लगाया जाता है कि पिछले सौ दिनों में अनिल जैसे लगभग चालीस लोगों की मौत सीवर की सफाई करते समय हुई है।
ये लोग नहीं मरते, यदि उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की गई होती। सीवर साफ करने के आधुनिक वस्त्र भी उपलब्ध हैं और आधुनिक औजार भी, लेकिन हमारे महानगरों के शासक इन पर पैसा खर्च करने को इसलिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि मैला साफ करना जिन अभागों का काम है, उनको मनुष्य ही नहीं समझा जाता। मैंने ऐसे शिक्षित, सभ्य लोग देखे हैं, जिन्हें सफाई कर्मियों के लिए अपने घर में अलग बर्तन रखने में थोड़ा भी संकोच नहीं होता। ये वही लोग हैं, जिनको तकलीफ होती है, जब प्रधानमंत्री लाल किले से स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालयों के निर्माण के बारे में घोषणा करते हैं।
स्वच्छ भारत अभियान मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। इस अभियान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है और वास्तव में ग्रामीण भारत में इसका प्रभाव जगह-जगह दिखने लगा है। गांधी जयंती पर दिल्ली में एक बहुत बड़ा सम्मेलन होने वाला है, जिसमें स्वच्छ भारत पर चर्चा करने दुनिया के जाने-माने विशेषज्ञ आ रहे हैं। यह अच्छी बात है कि ग्रामीण भारत में खुले में शौच रोकने पर इतना ध्यान दिया गया है, क्योंकि यह पुरानी आदत ऐसी बीमारियां फैलने का मुख्य कारण है, जिनसे बच्चे बेमौत मरते हैं।
स्वच्छ भारत का संदेश गांव-गांव तक ले जाने के लिए स्वच्छाग्रही नियुक्त किए गए हैं, लेकिन समझ में नहीं आता कि इनमें उन लोगों को शामिल क्यों नहीं किया गया है, जो इस देश में सबसे गंदा काम करने के लिए मजबूर हैं। समझ में यह भी नहीं आता कि अनिल की मौत के लिए नगर निगम के अधिकारियों को दंडित क्यों नहीं किया गया है अभी तक। अधिकारियों को अगर एक बार दंडित किया जाता है, तो फिर इस तरह किसी मनुष्य को सीवर में नहीं भेजा जाएगा, जिस तरह अनिल को भेजा गया था। अगर उसके नन्हें बेटे का चित्र वायरल न हुआ होता, तो शायद इस अति महत्वपूर्ण विषय पर हम चर्चा भी नहीं कर रहे होते।