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दो रुपए की बरकत

Sat, 27 Apr 2013 09:43 PM IST
Updated Sat, 27 Apr 2013 09:43 PM IST
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chit fund and coal scam

लूटने वाला आदमी लुटता है, तो उसे पता चलता है कि लूटने के मजे और लुटने के दर्द की बारीक रेखा कहां होती है। तीन-चार तरह के लूटने वाले होते हैं।

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एक वे जो समान भाव से सभी को सिर्फ लूटते हैं। दूसरे वे जो लूटकर खर्च भी करते हैं। एक वे जो अमीर-गरीब के बीच फर्क करके लूटते हैं। एक और वे होते हैं, जो अमीरों से लूटकर गरीबों में बांटने का काम हाथ में लेते हैं। इन सबसे अलग वे होते हैं, जो लूटते हुए कह रहे होते हैं कि वे भारतमाता की सेवा कर रहे हैं।
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भारतमाता की सेवा एक अद्भुत शब्द है। जिन्होंने गरीबों को दो-दो रुपए इकट्ठे करते हुए देखा है, वे इसके मर्म को समझ सकते हैं। इनमें से कुछ लोग इतने मर्मज्ञ हो जाते हैं कि चिट फंड कंपनी खोलकर उनके रुपयों से पेड़ उगाने निकल पड़ते हैं।
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खेल, सिनेमा, मीडिया और नेताओं के साथ जमीन के साझा धंधे से यह मनोरंजक कार्यक्रम राष्ट्रीय हरियाली योजना में तब्दील हो जाता है। गरीबों के ये दो-दो रुपए इनके बड़े काम के होते हैं। इन दो-दो रुपयों की बरकत से वे स्वयं दो सौ करोड़ के घोटाले करने वाले नेताओं के बैंक में तब्दील हो जाते हैं।

नेता इनसे प्रेम करते है, इनसे सेवाएं लेते हैं। अभिनेता इनके यहां मुजरे करते हैं और ब्रांड बनाते हैं। खिलाड़ी इनके यहां नाचते-गाते हैं और सितारे हो जाते हैं। कवि सूट डालकर क्रांति का बिगुल बजाते हैं। इसमें इनका कुछ नहीं है, जैसा कि एक चिट फंडिये ने कहा, यह तो सिर्फ पवित्र मन के गरीब के दो रुपयों की बरकत है।

'पसीने से कमाए पैसों में बरकत तो होती है।' एक नेता ने कहा। वह कोयले की खदान में की जाने वाली मेहनत पर बात कर रहा था। मैंने सोचा, वह कोयला मजदूरों की जिंदगी पर व्यथित है। कुछ देर बाद पता चला, वह एक खदान आवंटित न होने से दुखी है। वह पसीना बहा-बहाकर परेशान हो गया था, मगर खदान जो है उसके हाथ न आती थी। वह उसे प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प है इसलिए अभी-भी कह रहा है, 'पसीने से कमाए पैसों में बरकत होती है।' वह और पसीना बहाएगा, खदान अपने हिस्से में लाएगा। फिर पैसों की बरकत का स्वाद चखेगा।

कुछ लोग जब आधे मन से लूटते हैं या लुटते हैं, तो दोनों तरफ का मजा किरकिरा हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे सीएजी की रिपोर्ट से डरकर मामला सीबीआई को दे दिया जाए। सीबीआई यह कह दे कि, भाईसाहब आपने जैसा कहा था, वैसा न सिर्फ हमने कर दिया बल्कि जो कुछ किया वह सबको बता भी दिया।

आधे मन से लुटने वाले सबको बता देने में यकीन नहीं रखते, क्योंकि लुटने के पहले उन्होंने लालच का घूंट पिया होता है। आधे मन से लूटने वाले भी सबको बताने में यकीन नहीं रखते, क्योंकि उन्होंने संतत्व का सूट सिलाया होता है। दोनों लज्जा के जाने से डरते हैं। पूरे मन से लूटने या लुटने वाले इस डर से ऊपर उठ जाते हैं। वे लज्जा को पार्टी प्रवक्ता की पिछली जेब में डालकर कैमरे पर चीखते हैं और लज्जा का आनंद मनाते हैं।

चूंकि पूरे मन से लुटने वाले अपने मन और लूट के बीच के रिश्ते को जानते हैं इसलिए वे लुटने का मुआवजा लूटने का नक्शा बनाते हैं। इन सबसे अलग भरोसे में लूट लिए गए गरीब सिर्फ आंसुओं के क्लोज अप में बदल कर रह जाते हैं और टीवी के काम आते हैं।

अभी कुछ समय पहले एक सज्जन धरे गए। उन्होंने माता शारदा की अध्यात्मिक विरासत को अपना प्रेरणास्रोत माना था। यह भी शायद माना था कि मां शारदा को कभी पता नहीं चलेगा कि उस प्रेरणा से कितनों का जीवन धन्य हुआ जा रहा है। अब फोटो छप रहे हैं। गरीब रो रहे हैं, नेता बयान दे रहे हैं। रोने वाले कह रहे हैं, 'इसने गरीबों की कमाई खा ली, लोग बर्बाद हो गए'। रुलाने वाला कह रहा है, 'मैं तो इन्हें आबाद करने चला था। इसी के चलते मैंने नेताओं को करोड़ों दिए थे। उनसे पूछो, गरीबों की कमाई कहां है।'

मामला यहीं नहीं रुका। गरीबों के पैसे वापस देने के लिए बर्बाद कंपनी की राख से एक नया आइडिया निकल कर सामने आया है। सरकार ने कहा है, सिगरेट पर 'सिन टैक्स' (पाप का टैक्स) लगेगा। ज्यादा सिगरेट पियोगे, ज्यादा पैसा भरना पड़ेगा। तुम्हारे ज्यादा पाप, गरीबों की अति सेवा से पुण्य में बदल जाएंगे।


आइडिया ठीक है। या तो आप सिगरेट के छल्ले उड़ाने की विलासिता से बाज आएं, क्योंकि यह पाप है और पाप का टैक्स देना ही होगा। या फिर आप इतने छल्ले उड़ाएं कि कोष जबर्दस्त इकट्ठा हो और गरीबों की दुआ से आपके पाप कट जाएं।
यह कुछ-कुछ तीर्थ यात्रा जैसा है।

पाप और पुण्य के चिट फंड का यही तो आनंद है। गंगा मैली भी होती रहती है और पाप भी काटती जाती है। जहां तक पुण्य का सवाल है, उसे लूटना तो सबसे बड़ा धर्म कहा गया है।
तो लूटिए। छल्ले उड़ाइए!
भारतमाता इंडिया गेट पर जुलूस की प्रतीक्षा कर रही है।

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