कूटनीति: जिनपिंग के शांति मिशन का मतलब, चीन की महत्वाकांक्षा भारत और अमेरिका के लिए चिंता का सबब
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
चीन के बारे में सेनाध्यक्ष जनरल मनोज पांडे की टिप्पणियों से पता चलता है कि चीन दुनिया का 'सुरक्षा प्रदाता' बनने के लिए महाशक्ति के रूप में अमेरिका की जगह लेने की महत्वाकांक्षा पाले हुए है, जो यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 14 सूत्री शांति योजना से स्पष्ट है। पांडे ने हाल में कहा कि 'चीन वैश्विक सुरक्षा प्रदाता के रूप में अमेरिका की जगह लेना चाहता है, जो कट्टर प्रतिद्वंद्वियों सऊदी अरब और ईरान के बीच हाल की शांति वार्ता में बीजिंग की भागीदारी से स्पष्ट है और वह रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए एक शांति योजना पेश कर रहा है।' ईरान-सऊदी अरब समझौते में चीन की मध्यस्थता भारत के लिए चिंताजनक है, क्योंकि भारत के दोनों देशों के साथ वर्षों से घनिष्ठ संबंध हैं। ईरान भारत का भरोसेमंद मित्र है और सऊदी अरब ने भारत के साथ आर्थिक संबंध विकसित किए हैं। इसलिए चीन के प्रवेश से समीकरण बिगड़ सकते हैं।
शी की शांति योजना के गुप्त मायने भी हैं, क्योंकि चीन रूस पर प्रभुत्व रखना चाहेगा, जो अमेरिका और यूरोपीय देशों के कड़े विरोध के बावजूद भारत के साथ खड़ा है, क्योंकि इसका उद्देश्य खाड़ी क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना है, जो भारत के लिए चिंताजनक है। विशेषज्ञों की राय है कि चीन कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से कमजोर रूस का स्वागत करेगा, जो चीन पर रूस की निर्भरता को बढ़ाएगा, जिससे भारत और रूस के बीच अरबों डॉलर के रक्षा सौदों के बारे में संदेह पैदा होगा। यह भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है, हालांकि रूस ने चीन के साथ दोस्ती के बावजूद भारत के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने का वादा किया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सेना प्रमुख की इस बात में दम है कि दुनिया को संसाधन आपूर्ति शृंखलाओं को हथियार बनाकर, आर्थिक पैंतरेबाजी, पर्यावरण एवं सुरक्षा मानकों को धता बताते हुए और भारी कर्ज में फंसे देशों में बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण के जरिये प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के चीनी प्रयासों के नतीजों का विश्लेषण करना चाहिए। सेना प्रमुख ने देशवासियों को आश्वासन दिया है कि भारत की तैयारी उच्च स्तर की है और हमारे सैनिकों ने ठोस चट्टान की तरह चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से मजबूत, अडिग तरीके से मुकाबला जारी रखा है।
चीन स्पष्ट रूप से रूस के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, जो चीन को रूस के निर्यात में भारी उछाल से स्पष्ट है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चीन को रूस का निर्यात 50 फीसदी यानी 72.9 अरब डॉलर (कुल लेन-देन में ऊर्जा घटक का योगदान 75 फीसदी) बढ़ा। दूसरी तरफ, चीन का आयात 8.5 फीसदी यानी 44.2 अरब डॉलर बढ़ा। अमेरिकी नीति निर्माताओं का मानना है कि चीन रूस को निर्भर बनाने के लिए उसके आर्थिक आधार को निचोड़ रहा है, जिससे बाकी दुनिया के साथ उसकी सौदेबाजी की शक्ति कमजोर हो गई है, जिससे भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के जारी रहने का खतरा पैदा हो गया है।
रूस को धीरे-धीरे घेरने और अपने जाल में फंसाने की चीन की नीति ताइवान पर हमला करने की उसकी दीर्घकालीन योजना से मेल खाती है, जो चीन में सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरने के बाद शी जिनपिंग के मौन संकल्प का हिस्सा है। यह आजीवन राष्ट्रपति बने रहने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, जो भारत के लिए अपशकुन है। इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति की संभावना कम हो जाएगी, और वह भारतीय इलाकों पर कब्जा करना जारी रखेगा।
हालांकि दोनों देशों के बीच 16 दौर की वार्ता हो चुकी है, पर अब तक कुछ नतीजा नहीं निकला है। शी जिनपिंग ने कामना की है कि अगले वर्ष मार्च में होने वाले चुनाव में पुतिन फिर से चुने जाएं, यह रूस के मौजूदा नेतृत्व के प्रति चीन के अटूट विश्वास का संदेश है। ऐसा खुलेआम समर्थन भारत की कूटनीति से परे है, क्योंकि यह भरोसेमंद मित्र देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप के समान है। चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी बढ़ी हुई भूमिका की ओर तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए उसने पाकिस्तान को पूरी तरह अपने शिकंजे में ले लिया है और श्रीलंका भी भारी कर्ज में फंस गया है। अमेरिका को एशिया में चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए भारत पर अपनी निर्भरता बढ़ानी होगी, ताकि दोनों देश चीन को आसानी से मात दे सकें।
ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौते पर हस्ताक्षर सुनिश्चित कराने के मध्यस्थ के रूप में चीन के सफल प्रयास से अमेरिका चिंतित प्रतीत होता है। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका से दुश्मनी रखने वाले ईरान को अपने जाल में फंसाने में चीन सफल रहा है और खाड़ी क्षेत्र में इसका दूरगामी असर हो सकता है। चीन तेल की नियमित आपूर्ति के बदले में 25 से अधिक वर्षों में ईरान में 400 अरब डॉलर का निवेश करने पर सहमत हो गया है।
चीन ने बाइडन प्रशासन से सऊदी अरब के बढ़ते मतभेदों का लाभ उठाया और ईरान के साथ अपनी निकटता का इस्तेमाल कर समझौता कराया। ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौते से पश्चिम एशिया में चीन का प्रभाव तो बढ़ेगा ही, ईरान को अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयास को रोका जा सकता है। विशेषज्ञ ताइवान पर कब्जा करने के अधूरे कार्य को पूरा करने की शी की महत्वाकांक्षा की पूर्ति से इंकार नहीं करते हैं, जो अमेरिका के साथ सीधे टकराव को बढ़ा सकता है। रूस की सीमाओं का विस्तार करने का पुतिन का विफल प्रयास शी को हतोत्साहित कर सकता है, लेकिन आने वाले वर्षों में आजीवन राष्ट्रपति बनने के बाद वह ताइवान पर कब्जा कर सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने धमकी दी है कि चीन को ऐसा दुस्साहस करते समय सावधान रहना चाहिए, क्योंकि वह अपने सहयोगी के बचाव में आएगा, जिससे अकल्पनीय आपदा हो सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत और अमेरिका को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को रोकने के लिए अपनी कूटनीति पर फिर से काम करना चाहिए, जो खाड़ी क्षेत्र और एशिया में अमेरिका द्वारा खाली किए गए स्थान पर कब्जा जमाने के लिए अपनी नई भूमिका में तेजी से उभर रहे हैं।