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चीन की नीयत साफ नहीं
अश्विनी महाजन
Updated Thu, 11 Jul 2013 09:00 PM IST
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जो लोग भारत-चीन के संबंध मजबूत करने के समर्थक हैं, उनका तर्क है कि इन दोनों पड़ोसियों के बीच आर्थिक सहयोग की काफी संभावनाएं हैं। उनका कहना है कि भारत और चीन दुनिया की सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं। हालांकि सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में दूसरा स्थान इंडोनेशिया ने ले लिया है। भारत और चीन दोनों मिलकर क्रमशः समता के आधार पर दुनिया की जीडीपी का लगभग 19 फीसदी हिस्सा रखते हैं।
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आर्थिक संबंधों से इतर यह देखने की जरूरत है कि सीमा को लेकर चीन का रवैया कभी सकारात्मक नहीं रहा है। चार जुलाई को रक्षा मंत्री ए के एंटनी की चीन यात्रा से पूर्व बीजिंग के बयान ने भारत के जख्मों को फिर से हरा कर दिया। चीन ने फिर दोहरा दिया कि सीमा पर शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी भारत की ही है। दो माह पूर्व ही चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर लद्दाख सीमा के 15 किलोमीटर तक घुसकर भारत की संप्रभुता को चुनौती दी थी।
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वर्ष 1962 के बाद चीनी सेना ने लगभग 500 बार भारतीय भूमि का अतिक्रमण किया है। उसने ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर असम क्षेत्र में बाढ़ और कभी सूखे की परिस्थितियों को बढ़ावा दिया है। साथ ही नशीले पदार्थों की तस्करी करके हमारी युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रहा है। यही नहीं, वह साइबर आतंकवाद को बढ़ावा देकर आईटी क्षेत्र के विकास को न सिर्फ बाधित कर रहा है, बल्कि खुफिया जानकारियों को भी हथिया रहा है। भारत के लगभग सभी सीमावर्ती देशों के भूमि पर सैन्य अड्डे बनाकर भारत को सामरिक दृष्टि से घेरने की कोशिश की जा रही है। यह सब भारत को डराने के लिए किया जा रहा है।
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17 दिसंबर, 2010 को तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत की सरकारी यात्रा की समाप्ति पर साझा वक्तव्य में कहा गया था कि 2015 तक दोनों देशों के व्यापार को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर तक ले जाया जाएगा। यह भी कहा गया कि दुनिया में भारत और चीन के विकास की पर्याप्त संभावनाएं हैं। तब भारत-चीन बिजनेस फोरम का भी गठन किया गया। उसी समझौते में भारत से चीन को निर्यात बढ़ाने हेतु भी उपायों को अपनाने का भी निर्णय हुआ था, ताकि भारत के व्यापार घाटे को पाटा जा सके।
हाल ही में चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान साझा वक्तव्य में लगभग यही बातें दोहराई गईं। आज जब चीन जानबूझकर भारत को डराने की रणनीति में संलग्न है, तब दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग और संबंधों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है। चीनी अनुशासनहीनता के जवाब में ढुलमुल नीति के चलते, भारत को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से कमजोर बनाने की चीन की रणनीति सफल सिद्ध हो रही है।
भारत चीन के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के समर्थक प्रस्ताव कर रहे हैं कि चीन भारत में ढांचागत निवेश बढ़ाए, ताकि भारत और चीन के बीच के व्यापार घाटे को पाटा जा सके। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत और चीन के बीच व्यापार असंतुलन हो ही क्यों? पहले व्यापार घाटा होना और बाद में चीन को उसे पूरा करने के लिए ढांचागत निवेश करने के लिए आग्रह करना, वास्तव में एक असंगत तर्क है। यह ठीक है कि भारत और चीन दुनिया की दो उभरती हुई ताकतें हैं। ये दोनों देश प्रौद्योगिकी और ढांचागत क्षेत्र सहित सभी दिशाओं में प्रगति कर रहे हैं।
भारत और चीन का तेजी से उभार दुनिया को, खासतौर पर अमेरिका और यूरोप के देशों को स्तब्ध कर रहा है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चीन परिस्थिति का लाभ उठाने के बजाय भारत के साथ बेवजह सीमा विवाद खड़ा कर रहा है। वर्तमान परिस्थिति में भारत के पास सीमित विकल्प बचते हैं।
भारत को अपनी सीमाओं की रक्षा करनी होगी। अरुणाचल और कश्मीर में वायु पट्टियों का निर्माण सही दिशा में कदम है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अपनी सीमाओं को सुरक्षित करना होगा। इसमें कुछ समय लग सकता है। लेकिन भारत की सुरक्षा इसका इंतजार नहीं कर सकती। इस संदर्भ में चीन को समझाने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी किए जा सकते हैं, लेकिन इसकी सफलता की संभावनाएं कम हैं। देशहित को ताक पर रखकर आर्थिक सहयोग की दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा सकता।