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बच्चे, कितने अच्छे
राजेंद्र शर्मा
Updated Sun, 18 Jan 2015 08:08 PM IST
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हमारे यहां औरतें आजकल बहुत कन्फ्यूज्ड हैं। धर्मगुरु रोज बता रहे हैं कि एक परिवार में कितने बच्चे होने चाहिए? आखिर, धर्म की रक्षा का सवाल है, परिवार वगैरह बाद में। औरतें यह क्यों चाहेंगी कि हिंदू धर्म के खतरे में पड़ने का इल्जाम उन पर लगे? पर पहले यह तो तय हो कि धर्म की रक्षा के लिए एक परिवार से फाइनली कितने बच्चे चाहिए।
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साक्षी महाराज ने यह कहा था कि परिवार में चार बच्चे होने चाहिए। उन्होंने बाकायदा इसका हिसाब भी लगाया था-एक साधु-संत के पास धर्म का ज्ञान सीखने जाएगा, एक सेना के पास देश की रक्षा के लिए जाएगा, एक संघ के पास राजनीति में काम करने के लिए जाएगा और एक माता-पिता के बुढ़ापे में काम आएगा। साक्षी महाराज का गणित भी सही था और डिमांड भी बिल्कुल जेनुइन। पर जब तक इस पर विचार-विमर्श होता, तब तक बेचारे को पार्टी वालों ने ही कारण बताओ नोटिस दे दिया। ऐसे में कोई यह कैसे मान ले कि चार की संख्या ही फाइनल है!
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वैसे चार की ही संख्या एक साध्वी ने भी बताई है। साधु-साध्वी गलत तो नहीं बताएंगे। पर उनका डिस्ट्रीब्यूशन जरा अलग है। बाकी तीन तो ज्यों के त्यों हैं, पर संघ को दिए जाने वाले बच्चे के लिए उन्होंने विहिप की तरफ से दावा ठोक दिया है। पहले संघ और विहिप को यह तय कर लेना चाहिए कि बच्चे पर हक किसका होगा। वैसे चार की संख्या पर भी थोड़ा-बहुत कन्फ्यूजन तो अब भी है। बंगाल में एक नेता ने कहा, पांच बच्चे होने चाहिए, तो तोगड़िया जी ने थोड़ा खींच-तानकर कम से कम तीन का आंकड़ा बैठा दिया।
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हमारे यहां बच्चों को बोझ कभी नहीं माना गया। आज की पीढ़ी भले यकीन न करे, पर बीस साल पहले तक भी एक घर में आठ-दस बेटे-बेटियों का भरा-पूरा परिवार होता ही था। फिर जब बच्चे पैदा करके बांटने ही हैं, तब आर्थिक बोझ का भी डर नहीं है। पर पहले यह तो स्पष्ट हो कि बच्चे, कितने अच्छे। यह न हो कि कल को बढ़ी आबादी को बोझ मान लिया जाए।