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बचपन पर कसता कानूनी शिकंजा

Thu, 21 May 2015 08:41 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 21 May 2015 08:41 PM IST
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childhood in denger

लगता है कि मोदी सरकार को बच्चों से विशेष दुश्मनी है। सालाना बजट में बच्चों और नौजवानों से संबंधित तमाम मदों में भारी कटौती की गई है। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय का बजट एक तिहाई कम कर दिया गया है; शिक्षा बजट में कटौती का असर छात्रवृत्तियों पर पड़ने लगा है। यही नहीं, बीते दिनों सरकार की ओर से दो कानूनों में परिवर्तन का प्रयास तो चौंकाने वाला है।

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बाल श्रम कानून में सरकार द्वारा किए जा रहे संशोधन का नतीजा यह होगा कि बच्चों से उसका बचपन ही छिन जाएगा। भारत पूरी दुनिया मे सबसे अधिक बाल श्रमिकों का देश है। लेकिन सरकार कानून में जो बदलाव लाना चाहती है, उससे बच्चों के 'परिवार के साथ काम करने' को कानूनी मान्यता मिल जाएगी।
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अगर इसे सरकार के अन्य कदमों के संदर्भ में देखें, तो बच्चों का भविष्य और भयावह दिखता है। छत्तीसगढ़ से रिपोर्ट है कि केंद्र का पैसा राज्य में नहीं पहुंचने के कारण मनरेगा का काम ठप पड़ गया है। नतीजतन बड़े पैमाने पर गरीब अपने बच्चे दलालों के हवाले कर रहे हैं, जो उन्हें कुछ पैसे देकर दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में काम कराने के लिए ले जा रहे हैं। सच तो यह है कि ये बच्चे बंधुआ मजदूर ही बनने वाले हैं।
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नाबालिग अपराधियों से संबंधित कानून में संशोधन भी मोदी सरकार के बाल विरोधी नजरिये को दर्शाता है। संशोधित कानून में यह प्रावधान है कि अगर 16 से 18 वर्ष का कोई नाबालिग किसी जघन्य अपराध का दोषी होता है, उसको वही सजा दी जाएगी,जो बालिग अपराधियों को दी जाती है और उसे सजा भी बालिग अपराधियों के संगत में काटनी होगी।

जब भी किसी गंभीर अपराध में नाबालिग के संलिप्त होने की खबर छपती है, तो समाज के कई हिस्सों से आवाज उठती है कि अपराधी को कोई रियायत नहीं दी जाए। ऐसा होना स्वाभाविक है। निर्भया कांड के खिलाफ जबर्दस्त जनाक्रोश को देखते हुए तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने न्यायाधीश जेएन वर्मा की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया, जिसने लोगों की भावनाओं और उनकी मांगों का जायजा लेकर और राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणालियों का गहन अध्ययन करके अपनी सिफारिशें दीं।

उन्होंने बलात्कार जैसे अपराध के मामले में मौत की सजा से इन्कार कर दिया और नाबालिग अपराधियों के मामले में न तो उम्र सीमा घटाने की मांग स्वीकार की और न ही उन्हें बालिगों के बराबर सजा सुनाने की।

आधुनिक समाज में बदले की भावना वाली न्याय प्रक्रिया अमानवीय और बर्बर मानी जाती है। कठोर से कठोर सजा देने से लोग अपराध करने से डरेंगे, इस विचार को दुनिया भर के अपराध के आंकड़े नकारते हैं। इसलिए नाबालिगों से संबंधित कानून में संशोधन को न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस संशोधन से महिलाओं की सुरक्षा तो नहीं बढ़ेगी, पर नाबालिगों के साथ अन्याय जरूर बढ़ सकता है। बेहतर होता है कि सरकार अपने मंत्रिमंडल से बलात्कार के आरोपी मंत्री को हटाने का काम करती।


सरकार द्वारा संशोधित यह दोनों कानून लोकसभा में पारित हो चुका है, लेकिन राज्यसभा में अटका हुआ है। अगले सत्र तक तमाम न्यायप्रिय लोगों, संगठनों, विशेषज्ञों को यह संशोधन वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा अन्यायपूर्ण कानून बनाने से नहीं, न्यायपूर्ण कानूनों को सख्ती से लागू करने से ही हो सकती है। और बच्चों का बचपन बाल श्रम को पूरी तरह गैर-कानूनी बनाकर और उनकी शिक्षा की अनिवार्यता पर जोर देकर ही बचाया जा सकता है।

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