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Child Marriage: साक्षरता से ही खत्म होगी बाल विवाह की बुराई, 18 साल की उम्र तक अनिवार्य शिक्षा करने की जरूरत

Sun, 12 Feb 2023 08:54 AM IST
Ravikant रविकांत
Updated Sun, 12 Feb 2023 08:54 AM IST
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सार
सरकार ने शिक्षा के अधिकार के तहत 14 साल की उम्र तक बच्चों के लिए शिक्षा को मुफ्त कर रखा है, पर इसके बाद गरीब परिवारों की बेटियां आगे की पढ़ाई नहीं कर पाती हैं, क्योंकि उनका बाल विवाह कर दिया जाता है।
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child marriage evil will end with literacy need for free and compulsory education till age of 18
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : Pixabay

विस्तार

बाल विवाह की सामाजिक बुराई लंबे समय से हमारे समाज का हिस्सा रही है। आजादी से पहले और उसके बाद भी इसके खात्मे के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यह बुराई आज भी हमारे समाज में बदस्तूर जारी है। इसके समूल उन्मूलन के लिए जरूरी है कि बच्चों को, और खासकर लड़कियों को शिक्षित किया जाए और उनका कौशल विकास किया जाए। शिक्षा से ही बाल विवाह जैसी बुराई का खात्मा किया जा सकता है और कम उम्र की लड़कियों को बाल विवाह की शारीरिक एवं मानसिक पीड़ा से बचाया जा सकता है।



हाल ही में असम सरकार ने बाल विवाह के खिलाफ जो सख्त कदम उठाया है, उसके बाद एक बार फिर से यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। सरकार ने कानूनी तौर पर बाल विवाह रोकने की मुहिम छेड़ी है, जो कि सराहनीय है। बाल विवाह देश के हर राज्य व केंद्रशासित प्रदेश में अपने पैर पसारे हुए है। बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए शिक्षा सबसे कारगर हथियार है। इस सामाजिक बुराई के खात्मे के लिए पूरे देश में 18 साल की उम्र तक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य किया जाना ‘ब्रह्मास्त्र’ साबित होगा।


इस बुराई के पीछे सामाजिक असमानता, परंपराएं और महिलाओं की घर में निर्णायक भूमिका न होना भी शामिल हैं। बड़े महानगरों को छोड़ दें, तो अधिकांश जगह महिलाओं की भूमिका घर संभालने तक ही सीमित रहती है। इसकी तस्दीक नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-5) के ताजा आंकड़े भी करते हैं। इसके अनुसार, देश में 20 से 24 साल की उम्र की 23.3 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं, जिनका बाल विवाह हुआ है। असम में यह प्रतिशत 31.8 है। ये आंकड़े बाल विवाह जैसी विकराल समस्या की गंभीरता को दिखाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज भी हमारे समाज में लड़कियों की शिक्षा व स्वास्थ्य पर लड़कों की तुलना में कम ध्यान दिया जाता है।

शिक्षा हासिल करना बच्चों का मौलिक अधिकार है और सभी राज्य सरकारों व केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को 18 साल की उम्र तक मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा दी जाए। साथ ही, ऐसा प्रशासनिक तंत्र भी स्थापित करना चाहिए, जिसमें बच्चों का कौशल विकास हो और वे रोजगार हासिल कर सकें। इससे देश के कार्यबल में भी इजाफा होगा, जो देश की आर्थिक प्रगति को गति देगा।

शिक्षा ही वह जरिया है, जिससे बच्चे सशक्त होते हैं और अपने को अधिकतम हासिल करने के योग्य बनाते हैं। एनएफएचएस-5 के अनुसार, देश में लड़कियों की बाल विवाह दर सबसे ज्यादा है और वे बहुत ही कम या फिर शिक्षा हासिल नहीं कर पाती हैं। अधिकांश मामलों में वे कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं और बच्चों को संभालती हैं। यदि उन्हें 18 साल की उम्र तक मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा मिलेगी, तो वे बाल विवाह के दंश से बच जाएंगी। बाल विवाह बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव डालती है। बाल विवाह उन्मूलन से सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) हासिल करने में भी मदद मिलेगी। बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई के उन्मूलन के लिए हमें कई स्तरों पर एकसाथ कदम उठाने होंगे।

एनएफएचएस-5 सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, अशिक्षित लोगों में बाल विवाह की दर 30.8 प्रतिशत है, प्राथमिक शिक्षा पूरी करने वालों में यह प्रतिशत 21.9 है, वहीं, माध्यमिक शिक्षा लेने वालों में 10.2 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं, जबकि उच्च शिक्षित लोगों में यह आंकड़ा केवल 2.4 प्रतिशत ही है।

पिछले साल 16 अक्तूबर को नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ आंदोलन की शुरुआत की थी। देश के लगभग 500 जिलों में 75,000 से ज्यादा महिलाओं ने बाल विवाह के विरोध में मशाल जुलूस निकाला था। महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी ने यह दर्शाया कि बाल विवाह से महिलाएं कितनी पीड़ित हैं और बच्चों, खासकर लड़कियों को इसके दुष्परिणाम सहने पड़ रहे हैं। इस आंदोलन से देश भर में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दो करोड़ से भी ज्यादा लोग जुड़े थे।

भारत सरकार ने शिक्षा के अधिकार के तहत 14 साल की उम्र तक बच्चों के लिए शिक्षा को मुफ्त कर रखा है, लेकिन इसके बाद गरीब परिवार के बच्चे, और खासकर बेटियां, आगे की पढ़ाई नहीं कर पाती हैं। स्कूल जाने पर जहां बेटियों को मिड-डे-मील योजना के तहत भोजन मिलता है, वहीं 14 की उम्र के बाद उन्हें गरीब परिवार के लिए बोझ माना जाने लगता है। नतीजतन उसके बाद बच्ची का बाल विवाह कर दिया जाता है, इसलिए जरूरी है कि 18 साल की उम्र तक बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

कानून निर्माताओं और बच्चों से संबंधित मामलों के सभी साझेदारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों, और खासकर लड़कियों को शिक्षा हासिल करने में कोई बाधा न आए। उन्हें गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मिले, स्कूल जाने में दिक्कत न हो और स्कूलों में शौचालय की उचित व्यवस्था हो। लड़कियों से जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं का भी उचित प्रबंध हो। इस काम में समाजसेवी संगठनों को भी सरकारों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, ताकि बाल विवाह जैसी बुराई को जड़ से खत्म किया जा सके। एक खुशहाल, शिक्षित, स्वस्थ और सुरक्षित बचपन ही खुशहाल देश बना सकता है।

लेखक- रविकांत
कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन (एक्सेस टू जस्टिस) के कंट्री हेड।

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