फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Chhath festival and popular belief worship of Sun

छठ पर्व और लोक आस्था का सोपान, जानें इसका महत्व

Thu, 19 Nov 2020 01:28 AM IST
पंकज चतुर्वेदी पंकज चतुर्वेदी
पंकज चतुर्वेदी Published by: पंकज चतुर्वेदी Updated Thu, 19 Nov 2020 01:28 AM IST
विज्ञापन
Chhath festival and popular belief worship of Sun
छठ पूजा 2020 - फोटो : ANI

दीपावली के ठीक बाद बिहार व पूर्वी राज्यों में मनाया जाने वाला छठ पर्व अब प्रवासी बिहारियों के साथ-साथ सारे देश में फैल गया है। गोवा से लेकर मुंबई और भोपाल से लेकर बंगलूरू तक, जहां भी पूर्वांचल के लोग बसे हैं, वे कठिन तप के पर्व छठ को हरसंभव उपलब्ध जल-निधि के तट पर मनाना नहीं भूलते हैं। हालांकि इस बार छठ कोविड-19 से उपजी असाधारण परिस्थितियों में मनाया जा रहा है। अनेक राज्य सरकारों ने एहतियात बरतने के साथ ही सार्वजनिक स्थलों में छठ मनाने को लेकर कई तरह के निर्देश दिए हैं। वास्तविकता यह भी है कि छठ प्रकृति पूजा और पर्यावरण का पर्व है, लेकिन इसकी हकीकत से तब दो-चार होना पड़ता है, जब उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व का समापन होता है और श्रद्धालु घर लौट जाते हैं। पटना की गंगा हो या दिल्ली की यमुना या भोपाल का शाहपुरा तालाब या दूरस्थ अंचल की कोई भी जल-निधि, सभी जगह एक जैसा दृश्य होता है- पूरे तट पर गंदगी, पॉलीथीन आदि बिखरा रहता है। 


loader

हमारे पुरखों ने जब छठ जैसे पर्व की कल्पना की थी, तब निश्चित ही उन्होंने हमारी जल निधियों को उपभोग की वस्तु के बनिस्बत साल भर श्रद्धा व आस्था से सहेजने के जतन के रूप में स्थापित किया होगा। देश के सबसे आधुनिक नगर का दावा करने वाले दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा की तरफ सरपट दौड़ती चौड़ी सड़क के किनारे बसे कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन नदी के तट पर हैं। हिंडन यमुना की सहायक नदी है, लेकिन अपने उद्गम के तत्काल बाद ही सहारनपुर जिले से इसका जल जो जहरीला होना शुरू होता है, तो अपने यमुना में मिलन स्थल, ग्रेटर नोएडा तक हर कदम पर दूषित होता जाता है।

ऐसी ही मटमैली हिंडन के किनारे बसे इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश बाशिंदे सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले हैं। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपावली के बाद छठ पूजा के समय आती है। छठ के छत्तीस घंटे के दौरान बड़ी रौनक होती है यहां और उसके बाद शेष 361 दिन वही गंदगी, बीड़ी-शराब पीने वालों का जमावड़ा। छठ पर्व लोक आस्था का प्रमुख सोपान है- प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, दिवाकर का ताप दिया, सभी को धन्यवाद और ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ का भाव। असल में यह दो ऋतुओं के संक्रमण-काल में शरीर को पित्त-कफ और वात की व्याधियों से निरापद रखने के लिए गढ़ा गया अवसर था। 

सनातन धर्म में छठ एक ऐसा पर्व है, जिसमें किसी मूर्ति-प्रतिमा या मंदिर की नहीं, बल्कि प्रकृति यानी सूर्य, धरती और जल की पूजा होती है। पृथ्वीवासियों के स्वास्थ्य की कामना और भास्कर के प्रताप से धरतीवासियों की समृद्धि के लिए भक्तगण सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। बदलते मौसम में जल्दी सुबह उठना और सूर्य की पहली किरण को जलाशय से टकरा कर अपने शरीर पर लेना, वास्तव में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। व्रत करने वाली महिलाओं के भोजन में कैल्शियम की प्रचुर मात्रा होती है, जो कि महिलाओं की हड्डियों की सुदृढता के लिए अनिवार्य भी है। वहीं सूर्य की किरणों से महिलाओं को साल भर के लिए जरूरी विटामिन डी मिल जाता है।

वास्तव में यह बरसात के बाद नदी-तालाब व अन्य जल निधियों के तटों पर बहकर आए कूड़े को साफ करने, अपने प्रयोग में आने वाले पानी को इतना स्वच्छ करने कि घर की महिलाएं भी उसमें घंटों खड़ी हो सकें, और विटामिन के स्रोत सूर्य के समक्ष खड़े होने का वैज्ञानिक पर्व है। लेकिन इसकी जगह ले ली आधुनिक और कहीं-कहीं अपसंस्कृति वाले गीतों ने, आतिशबाजी, घाटों की दिखावटी सफाई, नेतागीरी, गंदगी, प्लास्टिक-पॉलीथीन जैसी प्रकृति-हंता वस्तुओं और बाजारवाद ने। अस्थायी जल-कुंड या सोसायटी के स्विमिंग पूल में छठ पूजा की औपचारिकता पूरा करना असल में इस पर्व का मर्म नहीं है। हर साल छठ पर यदि देश भर की जल निधियों को हर महीने मिल-जुलकर स्वच्छ बनाने का, देश भर में हजार तालाब खोदने और उन्हें संरक्षित करने का संकल्प हो, दस हजार पुराने तालाबों में गंदगी जाने से रोकने का उपक्रम हो, नदियों के घाट पर साबुन, प्लास्टिक और अन्य गंदगी न ले जाने की शपथ हो, तो छठ के असली प्रताप और प्रभाव को देखा जा सकेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed