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'शतरंज के खिलाड़ी' और कूटनीतिक शतरंज, प्रदीप कुमार याद दिला रहे हैं अवध के सबक

Wed, 07 Oct 2020 02:59 AM IST
pradeep kumar प्रदीप कुमार
Updated Wed, 07 Oct 2020 02:59 AM IST
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Chess players and diplomatic chess, Pradeep Kumar reminding Awadhs lessons
शतरंज - फोटो : demopic

राजनीतिक-सामाजिक थीम पर प्रेमचंद की चर्चित कहानी, 'शतरंज के खिलाड़ी' भारत के एक त्रासद दौर की याद दिलाती है। पलासी और बक्सर के युगपरिवर्तनकारी युद्धों में भारत के राजे-रजवाड़े हार चुके थे। अधिकांश भारत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभुत्व में आ चुका था। 1857 के स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि बन रही थी।


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अवध पर वाजिद अली शाह का शासन था। प्रेमचंद के शब्दों में,'लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर नहीं थी। शतरंज, ताश, गंजीफा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है। ये दलीलें जोरों के साथ पेश की जाती थीं (इस संप्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है)।' प्रेमचंद मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अली को पतित हो चुकी राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं।

विद्वान राजनयिक, पूर्व विदेश सचिव और अब विदेशमंत्री, एस जयशंकर अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक द इंडिया वे: स्ट्रैटजीस फॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड की शुरुआत 1977 में, प्रेमचंद की इसी कहानी पर बनी सत्यजीत राय की फिल्म से करते हैं। पहले अध्याय का नाम ही है- 'द लेसंस ऑफ अवध'। प्रेमचंद लिखते हैं, 'वाजिद अली शाह पकड़ लिए गए थे और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिए जा रही थी।

लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।' उधर शतरंज में हार-जीत के मसले पर मिर्जा और मीर एक-दूसरे पर तलवारों के वार से मर चुके थे। जयशंकर लिखते हैं, 'क्या विश्व भारत को परिभाषित करता रहेगा या भारत स्वयं अपने को। अवध आज भी पहली स्थिति का प्रतीक बना हुआ है। भारत आज आत्म-खोज की यात्रा पर है और अवध के सबक सबसे निश्चित कुतुबनुमा हैं।'

अवध के सबक अच्छी तरह सीखने के लिए थोड़ा और इतिहास में जाना होगा। मुगल सम्राट जहांगीर के समय से भारत में ब्रिटिश व्यापार की शरुआत हुई थी। अकबर के समय तक अंग्रेजों का चेहरा दिखने लगा था। ब्रिटिश नौसेना के ध्वज भारतीय समुद्रों में नजर आने लगे थे। गुजरात फतह कर अपने साम्राज्य की सीमा समुद्र तक ले जाने वाले अकबर ने इस पर खास ध्यान नहीं दिया। इस तरह हम पलासी से पहले ही बाजी हार चुके थे।

सबक यह: चीनी इजारेदार कंपनियां हों या अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां, सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी। दूसरी बड़ी सीख यह कि व्यापक आंतरिक एकता के बगैर कोई देश स्थायी प्रतिरोधक क्षमता नहीं हासिल कर सकता। औरंगजेब की कट्टरपंथी नीतियों के कारण सामाजिक समरसता भंग होने लगी। अपनी मृत्युशैया से औरंगजेब ने लिखा, 'मैं साम्राज्य का अभिभावक और संरक्षक नहीं बन पाया।' इतिहास की नियति थी कि वाजिद अली शाह अवध के अंतिम शासक होंगे।

विस्तारवादी चीन का मुकाबला कैसे किया जाए? आज का सबसे बड़ा सवाल यह है। इस प्रश्न का उत्तर जयशंकर महाभारत में पाते हैं। वह लिखते हैं, 'हमने प्रायः इस तरह के तर्क सुने हैं कि प्रतिद्वंद्वी बहुत बड़ा है और अंत में उसे भारी पड़ना ही है। या, आतंक का सहारा लेना हमारे पड़ोसी का स्वभाव है और उसके साथ हमें रहना है।

यह नियतिवाद है, जिस पर धैर्यपूर्वक विचार का लबादा ओढ़ा दिया जाता है। पांडवों और कौरवों के बीच सैन्य शक्ति का अनुपात 7 :11 का था। गैरपरंपरागत क्षमताओं और कारगर अस्त्रों की प्राप्ति के लिए देवताओं का आह्वान किया जाता है। ...कृष्ण पांडवों को संयम की सलाह देते हैं और अवश्यंभावी संग्राम में आवश्यक क्षमताएं हासिल करने के लिए वक्त का इंतजार करने को कहते हैं। वह जयद्रथ, कर्ण और दुर्योधन के वध के प्रणेता बनकर उसे उचित ठहराते हैं।' चीन और पाकिस्तान एक साथ युद्ध थोप दें, तो उससे निपटने का कारगर तरीका इस तरह महाभारत से निकलता है।

भारत के एक राजनीतिक वर्ग को ही नहीं, कुछ राजनयिकों और विचारकों को भी प्रायः यह कहते सुना जाता है कि 1962 को भूल जाओ और आगे बढ़ो। इस चिंतन के खतरे को सामने रखते हुए जयशंकर याद दिलाते हैं, 'भारत और चीन में राजदूत स्तर के संबंधों की पुनर्स्थापना के साथ-साथ चीन-पाकिस्तान परमाणु सहयोग शुरू हुआ। राजीव गांधी की चीन यात्रा के साथ ही चीन पाकिस्तान को मिसाइल टेक्नोलॉजी देने लगा।

उससे पहले विदेशमंत्री के नाते अटल बिहारी वाजपेयी चीन गए, तो उसी समय चीन ने वियतनाम पर हमला कर दिया। चीनी शायद यह एहसास नहीं कर पा रहे कि 1962 के युद्ध का भारत के जनमानस पर कितना स्थायी प्रभाव पड़ा है। रूस और चीन के संघर्षों के बाद चीन ने आगे बढ़ने की जो क्षमता दिखाई है, वह भारतीय चित्त में नहीं है। 1962 में सिर्फ भारत नहीं पराजित हुआ, खुद संबंधों की हार हुई। सीमा पर हर तनाव उन यादों को ताज़ा कर देता है।'   जयशंकर सवाल उठाते हैं: क्या 1950 में सीमा समझौता संभव था? या 1954 में तिब्बत पर समझौता वास्तव में स्वहित-आधारित विचार पर आशावाद की जीत था?

जयशंकर इन सवालों के जवाब सीधे-सीधे नहीं देते, हालांकि उनके पास सटीक उत्तर अवश्य होंगे। शायद छात्रावस्था में ही सामरिक गुरु, अपने पिता के.सुब्रमण्यम से उत्तर प्राप्त कर लिए होंगे। पुस्तक में वह समग्र राष्ट्रीय शक्ति का उल्लेख कई बार करते हैं। इस शक्ति के अनिवार्य अवयव क्या-क्या हो सकते हैं? हर राष्ट्र की समग्र शक्ति उसके समाज, भूगोल, अर्थव्यवस्था, जनसांख्यिकी के स्वरूप और सामरिक आकांक्षाओं से निर्मित होती है।

यह कोई पौराणिक समग्र दिव्यास्त्र नहीं है। मोटे तौर पर इसकी परिकल्पना तो पहले भी थी, लेकिन इसे औपचारिक नाम दिया चीन ने। करीब 90 प्रतिशत हान आबादी वाले चीन की समग्र राष्ट्रीय शक्ति का फार्मूला बहु-धार्मिक, बहु-भाषी, अत्यंत विविधतापूर्ण भारत पर लागू नहीं होता। सुदूर और आधुनिक इतिहास के संदर्भ में जयशंकर समग्र राष्ट्रीय शक्ति पर भारी-भरकम किताब लिख सकते हैं। लेकिन सत्ता के गलियारों की अपनी अनुलंघनीय सीमाएं होती हैं।

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