बदलने लगा है कामकाजी माहौल
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कारोबार सुगमता के मोर्चे पर भारत के बड़ी छलांग लगाने का सकारात्मक असर अब कामकाजी माहौल में दिखाई देने लगा है। वर्ष 2014 में कारोबार सुगमता के मोर्चे पर भारत 142वें स्थान पर था, जबकि अब हम 77वें स्थान पर हैं। विश्व बैंक कारोबार सुगमता के मामले में सालाना 190 देशों की रैंकिंग करता है, ताकि दुनिया भर के निवेशकों को सही स्थिति का पता चल सके। हमारी यह ताजा उपलब्धि इस दिशा में नरेंद्र मोदी सरकार की कोशिशों का नतीजा है। यह रैंकिंग बताती है कि भारत निवेश के लिए उपयुक्त जगह है। अब सरकार चाहती है कि देश की अर्थव्यवस्था 50 खरब डॉलर तक पहुंच सके। कारोबार सुगमता की नई रैंकिंग आने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने देश को शीर्ष 50 देशों में शामिल करने की प्रतिबद्धता जताई है, जो बहुत मुश्किल भी नहीं है।
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कारोबार सुगमता के मोर्चे पर बेहतर हुई यह रैंकिंग भारत में बदलते कामकाजी माहौल और संस्कृति को भी प्रतिबिंबित करती है। हमारे कॉरपोरेट गवर्नेंस और व्यापार के तौर-तरीकों में बेहतरी हुई है। नोटबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को काफी हद तक नियमित किया है, वह रास्ता तैयार किया है कि वह पुख्ता तरीके से पटरी पर आकर गति पकड़ सके, करों के दायरे में 80.53 फीसदी लोगों को लाया जा सके और जीडीपी में सुधार किया जा सके। वर्ष 2014 में करदाताओं की संख्या 3.8 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 6.86 करोड़ हो चुकी है। जीएसटी संग्रह इस साल अप्रैल से अक्तूबर के बीच 6.8 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। हालांकि इसके क्रियान्वयन में अभी खामियां हैं। बैंकों को मजबूत करने और भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म करने का काम करने की तैयारी है, ताकि इतना कर आ सके, जो हमारी जीडीपी का 20 फीसदी हो। जब करदाताओं का आधार बढ़कर 14 करोड़ हो जाएगा, तो इससे न केवल राजस्व बढे़गा, बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चर बेहतर होगा और जनता का निवेश भी बढ़ेगा, जिससे और रोजगार पैदा हो सकेगा।
कारोबार सुगमता की रैंकिंग में इस बड़ी उछाल के तीन संकेतक हैं-भारत ऊर्जा पैदा करने वाले शीर्ष 25 देशों में शामिल हो चुका है। सौ फीसदी गांवों का विद्युतीकरण हो चुका है। व्यापार के लिए व्यवसायियों और उद्यमियों को बैंकों से ऋण मिलना आसान हो गया है। कंस्ट्रक्शन परमिट के लिए अब ज्यादा समय नहीं लगता। अल्पसंख्यक निवेशकों की रक्षा की जा रही है। लालफीताशाही को हालांकि अभी तक खत्म नहीं किया जा सका है, लेकिन नई तकनीक से इसकी बाधाओं को 15 फीसदी तक कम जरूर किया गया है।
हालांकि यह तथ्य तो अपनी जगह है ही कि अगर लोकपाल लागू होता, तो देश में निचले स्तर पर नौकरशाही में भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता था, जो सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद नासूर बना हुआ है। इसके साथ ही भारत अब भी व्यापार शुरू करने, संपत्ति की रजिस्ट्री और भूमि हदबंदी रिकॉर्ड्स, करों के सरलीकरण और कॉन्ट्रेक्ट लागू करने की दिशा में बहुत पीछे है। हालांकि देश में नए बिजनेस को रजिस्टर करने का काम 127 दिनों से घटाकर 30 दिन किया जा चुका है। संपत्ति, स्वामित्व और टाइटल्स में सुधार के लिए इन्हें ऑनलाइन करने की जरूरत है, हालांकि यह एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि भूमि के मामले राज्य सरकारों के दायरे में आते हैं।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के सिलसिले को बरकरार रखते हुए ईज ऑफ लिविंग को बेहतर करना आवश्यक है। जरूरत समेकित वित्तीय संकेतकों को भी ऊपर रखने की है। वाणिज्य एवं उद्योग के क्षेत्र में विकास को तेज करने के साथ ही प्रति व्यक्ति आय को भी बेहतर करने की आवश्यकता है, ताकि उसका फायदा पिरामिड के निचले स्तर तक हो। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में बड़ी छलांग लगाने के कारण अब असंगठित क्षेत्र के 85 फीसदी लोगों की जिंदगी भी बेहतर होगी, जो हमेशा आर्थिक विकास के लाभ से वंचित रह जाते हैं।
ग्लोबल फाइंडेक्स (जीएफएक्स) के अनुसार, जो वित्तीय समावेशन (एफआई) को मापता है, भारत की स्थिति 2011 में 35 थी, तो 2014 में 53 और 2017 में 80 हो गई। इसका मतलब यह हुआ कि वित्तीय समावेशन में तेजी से सुधार हो रहा है। वित्तीय समावेशन इंडेक्स अब विकास के संकेतकों के समग्र मानकों के तौर पर इस्तेमाल होता है।
वित्तीय समावेशन के मोर्चे पर नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में पिछली सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा काम किया है-चाहे बात गांवों के विद्युतीकरण की हो या फिर सस्ते मकानों की, फिर शौचालय निर्माण, मुफ्त एलपीजी योजना, जन-धन योजना और मुद्रा की हो- इन सबसे 40 करोड़ लोगों को फायदा हुआ। नतीजतन गांवों के गरीबों की जिंदगी बेहतर हुई।
हालांकि विदेशी निवेशक किसी भी देश में निवेश करने के लिए कारोबार सुगमता की रैंकिंग के अलावा कई और पहलुओं, जैसे-सरकार की कर नीति, पर्यावरण प्रदूषण, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं, भ्रष्टाचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को भी देखते हैं। इन तमाम मामलों में बेहतर स्थिति से ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ता है।
कारोबार सुगमता के अलावा भी अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों पर मोदी सरकार ने बड़ी छलांग लगाई है। वर्ष 2014 के बाद से 40 अरब डॉलर का निवेश स्टार्ट अप्स में हो चुका है। लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। सरकार नीतियां बनाती है, संसद कानून बनाती है, लेकिन नौकरशाही अगर उन पर ठीक से अमल न करे, तो चीजें नहीं बदलतीं। इसलिए सरकार के लिए जरूरी है कि वह खासकर निचले स्तर की नौकरशाही को नियंत्रित करे, ताकि सकारात्मक नीतियों पर अमल हो और उसका असर दिखे। सरकार को इस दिशा में कदम उठाने चाहिए।
लेखिका स्तंभकार नीति आयोग में वित्तीय समावेश और वित्तीय साक्षरता कमेटी की चेयरपर्सन हैं।