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मई, 2014 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ऐतिहासिक जीत हासिल की, तब ऐसा लगा था कि जन-मुद्दों पर मोदी की सीधी पकड़ है। जिस देश में गत दो दशकों में कोई भी पार्टी अपने दम पर केंद्र की सरकार न बना सकी हो, वहां ऐसा कुछ कर सकना एक राजनीतिक अचंभा ही माना जा रहा था। शायद इसी कारण, शुरुआती एक साल तक स्वतंत्र मीडिया के पास भी एनडीए सरकार के विरोध का कोई ठोस मुद्दा नहीं था। स्थिति यह थी कि नित नया खुलासा करने में माहिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी लगभग मुरझा-सा गया था। हालांकि दबे और बुदबुदाते स्वर में मोदी की आलोचना ओबामा की भारत यात्रा के दौरान उनकी पोशाक, और फिर दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के कारण हुई। लेकिन वे आलोचनाएं भी स्थायी नहीं रह पाईं।
अलबत्ता जब इंग्लैंड के अखबार संडे टाइम्स ने ललित मोदी के यात्रा दस्तावेजों का भारत के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा अनुमोदन किए जाने का खुलासा किया, और उसके बाद राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ललित मोदी के साथ दोस्ती से जुड़े कई तथ्य सामने आए, तो मोदी और भाजपा, दोनों अचानक मीडिया और जनता के निशाने पर आ गए।
बेशक अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कोई सीधा आरोप नहीं है, लेकिन राजनीतिक जिम्मेदारी, राजनीति के मानक और नीतिगत व्यवहार जैसे सवालों के बहाने उन्हें पिछले दिनों घेरा जरूर गया। हालांकि यह भी सच है कि खासकर ललित मोदी के प्रसंग में सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे को घेरने की विपक्षी कोशिश बहुत दमदार नहीं थी। भले ही इससे राजनेताओं के कारोबारियों से संबंध और नैतिकता के मुद्दों पर बहस छिड़ी हो।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के मामले में यह कहा गया कि उनकी बेटी और उनके पति ललित मोदी के वकील रह चुके हैं। इस तरह के आरोप लगाने वाले भूलते हैं कि एक राजनेता का भी निजी जीवन होता है। इसीलिए सुषमा स्वराज के पति और बेटी द्वारा ललित मोदी की कानूनी मदद करने को 'हितों का टकराव' साबित करने का विपक्ष का आरोप टिक नहीं पाया। इसके बावजूद यह जरूर कहा जाना चाहिए कि अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते समय सुषमा स्वराज ने यदि अपने अधिकारियों की राय ली होती, तो वह ऐसे किसी आरोप की छाया से बहुत दूर नजर आतीं। उनके पास राजनीति का लंबा अनुभव है। यही नहीं, पिछली लोकसभा में वह विपक्ष की नेता रही हैं, और तब यूपीए के विरोध की कमान उन्होंने बखूबी संभाली थी। वह लोगों के बीच एक कद्दावर नेता के रूप में भी देखी जाती हैं। जिस मंत्रालय की जिम्मेदारी आज उन्होंने संभाली है, वह एक लंबे राजनीतिक परिश्रम के बाद उन्होंने हासिल की है। लिहाजा उन अटकलों को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि उन पर लगा लांछन भाजपा के अंतर्विरोधों का नतीजा हो सकता है। वैसे यह जानना शायद ही संभव होगा कि ऐसा भाजपा के अंतर्विरोधों के कारण हुआ, या मीडिया द्वारा लंदन के अखबारों में छपी खबरों की तरफ आकृष्ट होने के कारण। लेकिन तब भी इस मामले ने देश में राजनेताओं की नैतिकता पर बहस जरूर छेड़ दी है।
दूसरा मामला वसुंधरा राजे से जुड़ा है। वसुंधरा राजे के इस अनुरोध की तीखी आलोचना की गई कि ललित मोदी के इंग्लैंड प्रवास के आवेदन के अनुमोदन संबंधी जानकारियों को भारतीय अधिकारियों से परे रखा जाए, जो सही भी है। सांच को भला आंच क्या! अगर उन्होंने दस्तख्त किए, तो इस बात को छिपाने की गुजारिश क्यों? उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए था कि हस्ताक्षर उनके हैं, और यह फैसला उन्होंने सोच-समझकर किया है। एक राजनेता को कुर्सी पर पहुंचने के बहुत पहले से ही अपने आचरण की तरफ ध्यान रखना चाहिए। यह आचरण न सिर्फ मर्यादापूर्ण होना चाहिए, बल्कि यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उससे कानून और लोगों की भावना को ठेस न लगे। यह समझना होगा कि न्यायालय ही अंतिम मानदंड नहीं है, जो यह तय करे कि राजनेताओं को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। नेताओं को खुद भी नैतिकता का मानक तय करना चाहिए।
भाजपा को घेरे जाने की इस पूरी प्रक्रिया में यह बार-बार कहा गया कि जैन हवाला डायरी कांड में नाम आने के बाद आडवाणी ने जिस तरह इस्तीफा दिया और खुद के बरी होने तक राजनीतिक जीवन से अलग रहे, वैसा ही उदाहरण आज भी दिया जाना चाहिए। यानी राजनेताओं की यदि तीव्र आलोचना हो और उन पर कोई लांछन लगे, तो वे तब तक राजनीतिक जीवन से अलग हो जाएं, जब तक वे बरी होकर सामने न आएं। इसी दरम्यान यह बात भी दोहराई गई कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे गुण भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं में होने चाहिए।
इस मामले में नरेंद्र मोदी इसलिए सवालों के घेरे में आए, क्योंकि उन्होंने चुप्पी साधे रखी। इतना ही नहीं, जब आलोचना तेज हुई, तो वह विदेश यात्राओं पर निकल गए। यह कहा गया कि उन्हें बयान देना चाहिए, पर हो सकता है कि अलग नजरिये से चीजों को देखने वाले प्रधानमंत्री ने यह दायित्व पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं को सौंप रखा हो। बहरहाल, इस पूरे मामले से कई भ्रम टूटे हैं। जैसे, नरेंद्र मोदी की आलोचना नहीं हो सकती, या वह अपनी आलोचना नहीं होने देंगे या मोदी सरकार की आलोचना नहीं की जा सकती जैसी धारणा अब बीती बातें लग रही हैं। लेकिन इसमें कोई बुराई भी नहीं है। जीवंत लोकतंत्र वही है, जहां सरकार के कामकाज की आलोचना की गुंजाइश बनी रहे। इसके बावजूद इतनी जल्दी मोदी के कद पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की जा सकती।
-लेखिका गार्गी कॉलेज में प्राध्यापक और राजनीतिक विश्लेषक हैं