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चंद्रशेखर, चंद्रास्वामी और सीआईए

रवींद्र दुबे Updated Mon, 03 Sep 2018 05:56 PM IST
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भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग) के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब द अनएंडिंग गेम में एक चौंका देने वाला खुलासा किया है। उनका कहना है कि विवादास्पद तांत्रिक और राजनीतिक चालबाज चंद्रास्वामी, जिनकी मोरारजी देसाई की सरकार गिराने और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की छवि को फर्जी दस्तावेजों की मदद से धूमिल करने के प्रयास में महती भूमिका रही है, सीआईए के एजेंट भी थे। चंद्रास्वामी की पिछले वर्ष 23 मई को मौत हो गई।
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किताब के अनुसार, दशकों से भारत अमेरिकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ और रूसी खुफिया एजेंसी ‘केजीबी’ के बीच जासूसी दांव-पेचों का कार्यक्षेत्र रहा है। चंद्रास्वामी और उनके साथी कैलाशनाथ अग्रवाल उर्फ मामाजी के हथियारों के सौदागर अरबपति अदनान खशोगी से दोस्ताना रिश्ते थे। बोफोर्स तोप घोटाले के सामने के आने के बाद हुए चुनाव में जीतने के लिए खशोगी की मदद ली गई थी। खशोगी ने स्वामी को अपने दामाद लैरी कोल्ब से मिलवाया था, जो कि सीआईए का एजेंट था। कोल्ब को सीआईए के प्रसिद्ध एजेंट माइल्स कोपलैंड ने लंदन के मेफेयर में प्रशिक्षण दिया था। उन दिनों कोपलैंड और कोल्ब, दोनों ब्राउन्स होटल में रहते थे।

सीआईए के पास पैसे की कोई कमी थी नहीं और एक पूर्व सीआईए एजेंट का बेटा कोल्ब बहुमुखी प्रतिभासंपन्न था। एक तरह से वह असली जिंदगी का जेम्स बांड था और स्त्रियों के मामले में भी उसकी छवि बांड की ही तरह थी। भारत और पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया में फर्स्ट क्लास में उड़ने वाला कोल्ब खुद को बिजनेस प्रोमोटर और फाइनेंशियल कंसल्टेंट बताता था। हालांकि सूद के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि किसने किसे पहचाना। क्या वह खशोगी था, जिसकी वित्तीय अवसरों को सूंघने की जबर्दस्त क्षमता ने चंद्रास्वामी को भारत की खरबों की संपदा में दाखिले के रूप में देखा या फिर इसका उलटा हुआ?

सूद लिखते हैं कि खशोगी ने स्वामी को न्यूयॉर्क के फिफ्थ एवेन्यू स्थित अपने अपार्टमेंट में ठहराया, जबकि कोल्ब ने सैंट किट्स कथा को कुवैती अखबार अरब टाइम्स में छपवाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत की। चंद्रास्वामी के भगीरथ प्रयत्नों के वावजूद वीपी सिंह भारत के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब रहे।
 
सूद आगे लिखते हैं कि तब चंद्रास्वामी ने चंद्रशेखर का दामन थामा। दरअसल यह वह दौर था, जब देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार चौतरफा चुनौतियों से जूझ रही थी। उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं और उसी समय भाजपा मंदिर आंदोलन को धार दे रही थी। उसी दौरान चंद्रशेखर ने देवीलाल के साथ मिलकर जनता दल में फूट डाली और 64 सांसदों के साथ मिलकर अलग पार्टी बना ली। भाजपा के सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद वीपी सिंह ने बहुमत खो दिया और उनकी सरकार गिर गई। सूद के मुताबिक, चंद्रशेखर ने खुद प्रधानमंत्री बनने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिराई। चंद्रास्वामी की पकड़ प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव पर भी जबर्दस्त थी। पूर्व रॉ प्रमुख का यह भी दावा है कि केजीबी के पास दस अखबार और एक समाचार एजेंसी भी थे, जिनमें हजारों लेख छपवाए गए। इसके अलावा रूसियों ने अनेक पत्रिकाओं को पैसा दिया और किताबें छपवाईं।
 
खुफियागीरी पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में सीआईए की गतिविधियां काफी पुरानी हैं। समय-समय पर इनका खुलासा किताबों और एजेंसी के गैरवर्गीकृत दस्तावेजों के जरिये होता रहता है। भारत हमेशा से ही सीआईए के लिए दिलचस्पी का केंद्र रहा है। सीआईए की सक्रियता भारत में 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। उस साल कुछ इस आशय की खबरें छपी थीं कि भारत में बेरोजगार रूसी तकनीशियनों और इंजीनियरों को रोजगार दिया जा रहा है। सीआईए की नींदें हराम करने के लिए इतना काफी था!

लेकिन चंद्रास्वामी की जिन लोगों से निकटता थी, उनमें राजनेता और अफसरशाह सहित हर वर्ग के लोग थे। यह सोचकर आज भी सिहरन होती है कि नरसिंह राव के कार्यकाल में कौन-सा रहस्य अमेरिकियों से बचा होगा? 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को शिकस्त मिलने के साल भर के भीतर घरेलू खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के एडिशनल डायरेक्टर रतन सहगल को अमेरिकियों से संबंधों के चलते इस्तीफा देना पड़ा था। कहा जाता है कि अमेरिकी दूतावास में पदस्थ एक महिला से उनकी खासी निकटता थी। खुफिया क्षेत्रों में उस महिला को सीआईए की स्टेशन डिप्टी हेड के रूप में जाना जाता था। सहगल के इस्तीफे के तुरंत बाद उक्त महिला और उसका साथी वाशिंगटन उड़ गए थे।
 
रतन सहगल कोई मामूली अधिकारी नहीं थे। वह इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते 11 वर्षों तक वीवीआईपी सुरक्षा के प्रभारी रहे थे।
 
रॉ के ही एक अन्य जॉइंट सेक्रेटरी रविंदर सिंह भी अमेरिकी भेदिये साबित हुए। उन्हें कुछ दस्तावेजों की फोटोकॉपी निकालते हुए पाया गया था। वे दस्तावेज उनकी जिम्मेदारी से संबंधित नहीं थे। उन पर निगरानी रखी जाने लगी और उनके फोन टेप होने लगे। एकाएक वह 2004 में सपरिवार गायब हो गए। बताया जाता है कि वह बरास्ते नेपाल फर्जी दस्तावेजों और पहचान के बल पर अमेरिका चले गए। इसके लिए सीआईए ने बाकायदा उन्हें अमेरिकी पोसपोर्ट मुहैया करवाया था।

बहरहाल इस तरह के मामले तो अनेक हैं, लेकिन आज भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कल को कोई बड़ा नाम सीआईए एजेंट के रूप में नहीं उभरेगा। यह हमारी काउंटर इंटेलिजेंस क्षमताओं पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है। इसका तुरंत प्रतिकार बहुत जरूरी है, वरना हमारी कौन-कौन सी महत्वपूर्ण जानकारियां लीक हो जाएंगी, इसका केवल अंदाज ही लगाया जा सकता है। और यह भी अनुमान मुश्किल नहीं है कि इस लीकेज से भारत को क्या-क्या नुकसान पहुंच सकते हैं!

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