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असम के चाणक्य: हिमंत ने दिलाया विश्वास, बांग्लादेशी अवैध प्रवासन की जटिल समस्या का समाधान सिर्फ भाजपा
Tue, 05 May 2026 08:33 AM IST
Devesh Tripathi
शेखर अय्यर
शेखर अय्यर
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 05 May 2026 08:33 AM IST
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हिमंत बिस्व सरमा
- फोटो :
ANI
विस्तार
असम विधानसभा चुनाव के नतीजों का सीधा श्रेय कांग्रेस के पूर्व नेता और दो बार के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को जाता है। अपने नेतृत्व के खास अंदाज और राजनीतिक सूझबूझ के दम पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लगातार तीसरी बार जीत दिलाई। इस जीत के साथ सरमा अब एक राष्ट्रीय स्तर के नेता और प्रभावशाली चुनावी रणनीतिकार के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं।सरमा की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता यह रही कि उन्होंने असम के बहुसंख्यक समाज को यह विश्वास दिलाया कि बांग्लादेश से होने वाले अवैध प्रवासन जैसी पुरानी और जटिल समस्या का समाधान केवल भाजपा ही कर सकती है। वहीं, कांग्रेस ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। इसी कारण भाजपा ने 2021 के अपने 75 सीटों के आंकड़े को पार करते हुए लगभग 44.51 प्रतिशत वोट हासिल किए। सरमा ने यह सुनिश्चित किया कि जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचे। उन्होंने खुद को एक सख्त और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया। साथ ही, वह मोदी सरकार के वादों को जमीन पर उतारने में सक्षम रहे। हालांकि, उनके विरोधी उन पर असम में बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए प्रयुक्त शब्द ‘मियां’ के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का आरोप लगाते रहे। पर, कांग्रेस यह समझने में नाकाम रही कि असम की बहुसंख्यक आबादी लगातार हो रहे प्रवासन को लेकर चिंतित थी। सरमा ने 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में हिंदू वोटों को मजबूती से अपने पक्ष में संगठित किया। इसके साथ ही, 2023 के परिसीमन ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। एक कुशल रणनीतिकार के रूप में सरमा ने समय-समय पर अपने राजनीतिक समीकरण बदले। इसके अलावा, बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ), जो 2021 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘महाजोत’ का हिस्सा था, एनडीए के साथ आ गया।
कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद का चेहरा गौरव गोगोई, जो खुद अपनी सीट नहीं बचा सके और 23,000 मतों से हार गए, पर राहुल गांधी ने अधिक भरोसा जताया। नतीजतन, पार्टी के कई वरिष्ठ नेता खुद को नजरअंदाज महसूस करने लगे और पार्टी में नाराजगी बढ़ने लगी। कई जगहों पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला, जिसने गठबंधन की रणनीति पर सवाल खड़े किए।
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आठ दलों के गठबंधन ‘महाजोत’ का नेतृत्व किया था, जिसने 43.68 प्रतिशत वोट हासिल कर 50 सीटें जीती थीं। इनमें से कांग्रेस ने 29.67 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 29 सीटें अपने नाम की थीं। 2021 में विपक्षी गठबंधन की ताकत दो अहम पार्टियों-बीपीएफ और बदरूद्दीन अजमल की अगुवाई वाली ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ)-से भी बढ़ी थी। पर इस बार तस्वीर बदल गई। बीपीएफ अब एनडीए के साथ है, जबकि एआईयूडीएफ अकेले मैदान में उतरी, क्योंकि कांग्रेस ने उसके साथ गठबंधन करने से साफ इन्कार कर दिया। नतीजों में भी यह असर साफ दिखा।