फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Challenges of india in G 20 summit

ब्रिसबेन में भारत की चुनौतियां

Tue, 11 Nov 2014 11:20 PM IST
उदय अभ्यंकर
उदय अभ्यंकर Updated Tue, 11 Nov 2014 11:20 PM IST
विज्ञापन
Challenges of india in G 20 summit

जी-20 आर्थिक सहयोग का प्रमुख मंच है और इसके सदस्य देश वैश्विक जीडीपी में 85 फीसदी और वैश्विक व्यापार में 80 फीसदी का योगदान करते हैं। भारत शुरू से ही इसका सदस्य है। प्रधानमंत्री मोदी ऑस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में पहली बार भाग ले रहे हैं। लेकिन इस बार भारत को जी-20 में कुछ असामान्य चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

विज्ञापन


मेजबान देश होने के नाते ऑस्ट्रेलिया द्वारा रेखांकित प्रमुख मुद्दों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अक्तूबर, 2013 के अनुमान के मुताबिक, पांच वर्षों में विकास दर में पांच फीसदी की वृद्धि, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ), बाली समझौता तथा दोहा वार्ता, अंतरराष्ट्रीय कराधान नीतियां एवं भ्रष्टाचार विरोध शामिल हैं। जबकि औपचारिक एजेंडे पर नहीं होने के बावजूद, हाल ही में जारी आईपीसीसी रिपोर्ट और आगामी लीमा बैठक के मद्देनजर जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग पर भी चर्चा होने की संभावना है।
विज्ञापन


इनमें से कुछ मुद्दे भारत को बैकफुट पर डाल सकते हैं। डब्ल्यूटीओ के मुद्दे पर भारत ने जुलाई में व्यापार सुगमता समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। इस मसले पर बाली सम्मेलन में ही सहमति बन चुकी थी, जो डब्ल्यूटीओ के इतिहास में उसकी एकमात्र सफलता है। लेकिन भारत सरकार ने इसके साथ सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम सुनिश्चित करने पर बल दिया। जहां तक कराधान का मामला है, तो हाल ही में अदालत ने गोपनीयता शर्त के खिलाफ निर्णय दिया है। यह निर्णय अपतटीय कर चोरी से संबंधित महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर करने से भारत को रोकता है। यह भारत को अमेरिका के साथ समझौते से रोक सकता है और मौजूदा दोहरे कराधान समझौते के माध्यम से जानकारियां हासिल करने से भी वंचित कर सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत का रुख है कि कार्बन डाई-ऑक्साइड उत्सर्जन पर रोक लगाना केवल विकसित देशों के लिए बाध्यकारी दायित्व होना चाहिए, जबकि चीन एवं भारत जैसे विकासशील देशों के लिए नहीं। यह इस समस्या का ऐतिहासिक कारण है। विकसित देशों का कहना है कि चीन सबसे बड़ा और भारत तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। वे इसे नए जलवायु परिवर्तन समझौते के लिए सबसे बड़ी बाधा मानते हैं।

इन मुद्दों पर भारत के पक्ष की वकालत करने में प्रधानमंत्री का काफी समय खर्च होगा और विश्व के शीर्ष आर्थिक मंच पर उनकी पहली उपस्थिति के लिहाज से यह कोई आदर्श स्थिति नहीं होगी। तो फिर क्या करना चाहिए? जी-20 की स्थापना साझा हितों के लिए बेहतर आर्थिक शासन को बढ़ावा देने के लिए एक रणनीतिक मंच के रूप में की गई थी। हमारे प्रधानमंत्री को जी-20 से अपील करनी चाहिए कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रबंधन को मजबूत बनाने के अपने मूल काम पर लौटे। अन्य किसी भी बहुपक्षीय निकाय में ऐसी क्षमता नहीं है। जी-20 ने 2008-09 की आर्थिक मंदी के दौर में वाशिंगटन, लंदन और पिट्सबर्ग के अपने सम्मेलनों में ऐसी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया है। आज फिर उसकी जरूरत है।

आज वैश्विक अर्थव्यवस्था किन बड़ी चुनौतियों से जूझ रही है? निश्चित रूप से इस समस्या से नहीं, कि अगले पांच वर्षों में विकास दर क्या होगी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मात्रात्मक विस्तार की नीति से वहां की अर्थव्यवस्था को ठीक करने में मदद मिली है। मगर यूरो जोन के प्रमुख देश ठहराव का सामना कर रहे हैं। यूरोपीय संघ और यूरोप के केंद्रीय बैंक इससे निपटने के लिए क्या कर रहे हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। पिछली तिमाही में सात फीसदी आर्थिक संकुचन से जूझने वाले जापान ने खुद ही मौद्रिक प्रोत्साहन शुरू कर दिया है।

अब अमेरिका शीघ्र ही अपनी ब्याज दरों में महत्वपूर्ण वृद्धि की संभावनाओं के साथ ही मात्रात्मक विस्तार की नीति को खत्म कर रहा है। यह वैश्विक पूंजी प्रवाह, विनिमय दर, वस्तुओं की कीमतों, भुगतान संतुलन और दुनिया भर में विकास दृष्टिकोण को प्रभावित करेगा, विशेष रूप से विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को, जो बाहरी झटके को सहने की दृष्टि से कमजोर हैं।

मौजूदा स्थिति में जी-20 का प्रमुख काम अपने और दूसरे, खासकर विकासशील देशों के लिए अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ की व्यापक आर्थिक नीतियों के प्रभाव पर एक साझा समझ विकसित करना होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) को उसके प्रत्यक्ष एवं माध्यमिक प्रभावों का आकलन करने के लिए कहा जाना चाहिए, साथ ही जी-20 को उन्हें अपनी नीतियों के अनुकूल और पारस्परिक रूप से सहयोगी बनाना चाहिए।

अगर जी-20 सहयोगी अंतरराष्ट्रीय माहौल को प्रोत्साहित करता है, तो दो फीसदी विकास का लक्ष्य हासिल करना बहुत आसान होगा। इससे व्यापार में प्रगति, अंतरराष्ट्रीय कराधान एवं भ्रष्टाचार निरोधी माहौल बनेगा। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ और देशों को स्वयं ही अनिश्चित बाहरी आर्थिक माहौल का सामना करने के लिए मजबूर किया गया, तो उसके गंभीर खतरे होंगे। लिहाजा जी-20 सम्मेलन को व्यापक लक्ष्यों पर केंद्रित करने और बड़े आर्थिक समूहों को यूक्रेन, व्यापार या जलवायु के मुद्दे पर एक-दूसरे पर उंगली उठाने के बजाय सहयोगी भूमिका में लाने की जरूरत है।


भारत को रक्षात्मक मुद्रा अपनाने के बजाय जी-20 को उसके मुख्य लक्ष्य-वैश्विक आर्थिक शासन को बेहतर बनाने की दिशा में ले जाने की पहल करनी चाहिए। एक उठती लहर सभी नावों को उठाने में मदद करेगी, जबकि एक गिरती हुई लहर कई नावों को डुबो सकती है।

(लेखक सेवानिवृत्त राजनयिक हैं)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed