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तीन तलाक को खत्म करने की चुनौती

Mon, 24 Apr 2017 07:29 PM IST
यूसुफ अंसारी
यूसुफ अंसारी Updated Mon, 24 Apr 2017 07:29 PM IST
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Challenge to eliminate three divorce
यूसुफ अंसारी

साल भर से देश भर में एक साथ तीन तलाक पर चल रही बहस के बाद अब यह मुद्दा उस मुकाम तक आ पहुंचा है, जहां इस पर आर-पार का फैसला होना है। पिछले साल काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो ने खुद को दिए गए एक साथ तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए इस परंपरा के साथ ही हलाला, और बहु विवाह को भी खत्म करने की गुहार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका सुनवाई के लिए मंजूर की और केंद्र सरकार से इस पर राय मांगी। सरकार ने तीन तलाक को गलत और कुरान के खिलाफ बताते हुए इसे मुस्लिम महिलाओं के सांविधानिक अघिकारों पर हमला बताया। इसके लिए केंद्र की मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के दौरान गठित एक समिति का भी हवाला दिया। इस समिति की रिपोर्ट में तीन तलाक को संविधान में दिए गए बराबरी के अधिकारों का उल्लघंन बताया गया है। यों तो इस समिति की रिपोर्ट 2013 में ही आ गई थी, लेकिन यूपीए सरकार ने इसे सार्वजनिक नहीं किया। मोदी सरकार के लिए यही रिपोर्ट तीन तलाक के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का मजबूत आधार बनी।

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मोदी सरकार इस मुद्दे को धार्मिक नजरिये से देखने के बजाय मानवाधिकार और संविधान में महिलाओं को मिले बराबरी के अधिकार से जोड़कर देख रही है। इसी आधार पर वह मुस्लिम समाज के निजी कानून यानी शरीयत में सुधार को मुद्दा बना रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे को चुनावों में उठाकर अपनी और अपनी सरकार की मंशा साफ कर दी है। शायरा बानो से पहले भी कई महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक साथ तीन तलाक को चुनौती दी है। हर बार सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को कुरान की मूल भावना के खिलाफ करार दिया है। पहले की केंद्र सरकारों ने भी ऐसा ही माना है। लेकिन इस पर रोक लगाने से ये तर्क देकर पल्ला झाड़ती रहीं कि मुस्लिम समुदाय की तरफ से पहल होने पर ही वह कोई कदम उठा सकती हैं। मोदी सरकार पहली सरकार है, जो इस संवेदनशील मुद्दे में दिलचस्पी लेकर पाबंदी की पहल करने की हिम्मत दिखा रही है।
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मुस्लिम समुदाय की तरफ से एक साथ तीन तलाक जैसी बुराई को खत्म करने की कभी कोई पहल हुई ही नहीं। मजहबी रहनुमा इसे कोई मुद्दा ही नहीं मानते। तीन तलाक के खिलाफ कई साल से चल रहे भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के बावजूद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खामोश रहा। मुस्लिम संगठनों ने हमेशा इन महिलाओं की आवाज दबाने की कोशिश की। केंद्र सरकार की गंभीरता से लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वह इस बारे में कोई कदम उठा सकती है। लिहाजा मुस्लिम संगठनों में बेचैनी है।
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ऑल इंडिया महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर शायरा बानो के हक में खुलकर सामने आईं और सुप्रीम कोर्ट में वह भी इस मामले में पक्षकार बन गईं। इस तरह इस मामले में अब तक कुल 12 पक्ष जुड़ चुके हैं। इससे यह बहस दिलचस्प भी हो गई है और अहम भी। फैसला एक साथ तीन तलाक के खिलाफ आने की उम्मीद है, फिर भी इस पर सांविधानिक या कानूनी तौर पर रोक लगाना आसान नहीं होगा। इस पर रोक लगाना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए मुस्लिम समाज को खुलकर आगे आना होगा। महिलाएं तो खुलकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर आ गई हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि मुसलमान पुरुष इस लड़ाई में उनके साथ नहीं दिख रहे। किसी भी समाज में सुधार या बदलाव समाज के भीतर से हो तो बेहतर है।

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