फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Challenge of capital investment in West Bengal who will invest amid uncertainties

पश्चिम बंगाल: ममता राज में पूंजी निवेश की चुनौती, अनिश्चितताओं के बीच कौन लगाएगा पैसा

Mon, 11 Dec 2023 07:14 AM IST
Bimal Rai बिमल राय
Updated Mon, 11 Dec 2023 07:14 AM IST
विज्ञापन
सार
'वर्ग शत्रु' को 'वर्ग मित्र' बनाने की इतनी हड़बड़ी हुई कि लाठी के जोर से कुछ जमीन हथियानी पड़ी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वाम सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति को गलत ठहराया। इसी बहाने उन्होंने अपने ऐतिहासिक आंदोलन को एक बार फिर सही ठहराया और सिंगुर के अनिच्छुक किसानों को उनकी जमीन सौंप दी गई।
loader
Challenge of capital investment in West Bengal who will invest amid uncertainties
निवेश। - फोटो : Pixabay

विस्तार

उद्योगों के खंडहर में तब्दील हो चुके पश्चिम बंगाल में बड़े स्तर पर पूंजी निवेश की कवायदें अब तक छलावा ही साबित हुई हैं। हाल ही में सातवें बंगाल बिजनेस समिट में करीब चार लाख करोड़ रुपये के सहमति व आशय पत्रों पर दस्तखत हुए, पर पिछले छह औद्योगिक मेलों के सहमति पत्रों के वास्तविक आंकड़े निराशा की तस्वीर पेश करते हैं। चौंतीस साल की वाम सरकार में उसके मुखिया ज्योति बसु तो पूंजीपतियों को 'वर्ग शत्रु' मानते थे। उसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जब नीतियों में बदलाव लाकर सिंगुर में टाटा को बुलाया, तो लखटकिया नैनो को दशकों से विपक्ष में बैठीं ममता बनर्जी की जैसे नजर लग गई।



'वर्ग शत्रु' को 'वर्ग मित्र' बनाने की इतनी हड़बड़ी हुई कि लाठी के जोर से कुछ जमीन हथियानी पड़ी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वाम सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति को गलत ठहराया। इसी बहाने उन्होंने अपने ऐतिहासिक आंदोलन को एक बार फिर सही ठहराया और सिंगुर के अनिच्छुक किसानों को उनकी जमीन सौंप दी गई। ममता मानें या न मानें, उन्होंने एक ऐतिहासिक भूल कर दी, जिसका खामियाजा बंगाल की कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। बीते 31 अक्तूबर को तीन-सदस्यीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने फैसला सुनाया कि प. बंगाल औद्योगिक विकास निगम 765.78 करोड़ रुपये की राशि टाटा मोटर्स को चुकाए। वर्ष 2008 में टाटा मोटर्स नैनो मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट सिंगूर से गुजरात के साणंद ले गई थी। सरकार ने इसके खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की है, पर जाहिर है, देर-सवेर और कमोबेश मुआवजा तो देना ही पड़ेगा। बंगाल का विपक्ष मांग कर रहा है कि यह राशि तृणमूल पार्टी के कोष से वसूली जाए, क्योंकि ममता के आंदोलन के कारण पैदा हुई खराब कानून-व्यवस्था के कारण ही टाटा को फैक्टरी हटानी पड़ी थी।


23 और 24 नवंबर को हुए सातवें बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट के 3.76 लाख करोड़ रुपये के 188 एमओयू और आशय पत्रों पर दस्तखत हुए। ममता के सत्ता में आने के बाद ऐसे छह मेले लग चुके हैं। उनके निवेश प्रस्तावों पर गौर करें, तो 2015 के निवेश मेले में 2.43 लाख करोड़, 2016 में 2.50 लाख करोड़, 2017 में 2.35 लाख करोड़, 2018 में 2.19 लाख करोड़ और 2019 में 2.85 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले थे। वहीं कोरोना काल के बाद 2022 में 3.42 लाख करोड़ रुपये के 137 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए थे। विपक्ष लगातार इन सम्मेलनों के बाद वास्तविक निवेश पर श्वेत-पत्र की मांग करता रहा है, पर सरकार चुप्पी साधे हुए है। अदाणी पोर्ट्स और एसईजेड लिमिटेड के ताजपुर में गहरे समुद्री बंदरगाह में 25,000 करोड़ रुपये का निवेश भी अधर में लटक गया है।

पश्चिम बंगाल के श्रममंत्री मलय घटक ने एक बार विधानसभा में खुद स्वीकार किया था कि राज्य में पिछले कुछ वर्षों में करीब 177 कारखाने बंद हुए हैं और 29,084 श्रमिकों ने रोजगार खोया है। हालांकि देश के कुल एमएसएमई इकाइयों में बंगाल का हिस्सा 14 प्रतिशत है और यह उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है। पिछले एक दशक में बंगाल को कुछ बड़ी परियोजनाएं भी मिली हैं। प्रस्तावित आईटी हब-बंगाल सिलिकॉन वैली में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, रिलायंस जियो, जेएसडब्ल्यू सीमेंट जैसी कई कंपनियों ने जगह ले ली है। दीदी इसी साल स्पेन और दुबई भी गई थीं, जहां से फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र और मॉल खोलने जैसा प्रस्ताव ही हाथ लगा। मगर यह सब इतना नहीं है कि बंगाल की युवा पीढ़ी में उम्मीद जग सके।

जग जाहिर है कि बंगाल के औद्योगिकीकरण के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हिंसा और उग्र ट्रेड यूनियनवाद रहा है, जो कम्युनिस्टों की देन थी। उसी उग्रता की छवि हम आज तक देखते आ रहे हैं। बिधान चंद्र राय के समय में बंगाल उद्योगों के मामले में शीर्ष पर था। 
1965 में उनके निधन के बाद प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री बने, और इसी के साथ बंगाल में राजनीतिक अस्थिरताका दौर शुरू हो गया। कम्युनिस्टों ने इस अराजकता और अस्थिरता का फायदा उठाया। हड़ताल, बंद, जुलूस और हिंसा के नए मानदंड कायम हुए। ऐसे में, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, खराब कानून व व्यवस्था और सिंडिकेट राज के आरोप झेल रही ममता सरकार के लिए राज्य को औद्योगिकीकरण की पटरी पर लाना चुनौतीपूर्ण है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed