ऐसी फायरिंग में हर्ष कम, भय ज्यादा : विवाह के अवसरों पर बंदूकबाजी का अपना ही इतिहास है
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रोज फॉर्म, दिल्ली में इसी साल नए वर्ष के अवसर पर रात का सन्नाटा अचानक हुई हवाई फायरिंग से टूटा और तभी विकास गुप्ता ने अपनी पत्नी अर्चना को गिरते हुए देखा। दो बच्चों की मां, घायल अर्चना को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। इससे कुछ दिन पहले गाजियाबाद में विवाह के अवसर पर दागी गई गोली से एक 20 वर्षीय युवा की मौत हो गई।
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रोज फॉर्म, दिल्ली में इसी साल नए वर्ष के अवसर पर रात का सन्नाटा अचानक हुई हवाई फायरिंग से टूटा और तभी विकास गुप्ता ने अपनी पत्नी अर्चना को गिरते हुए देखा। दो बच्चों की मां, घायल अर्चना को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। इससे कुछ दिन पहले गाजियाबाद में विवाह के अवसर पर दागी गई गोली से एक 20 वर्षीय युवा की मौत हो गई।
प्रत्येक वर्ष गोलियों से इस प्रकार मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। विवाह एवं अन्य इसी प्रकार के समारोहों में गोलियां दागकर लोग अपनी कथित मर्दानगी, ताकत और प्रभुसत्ता का घातक उन्मादपूर्ण प्रदर्शन करते हैं। अब ऐसी मानसिकता एवं प्रथा को समाप्त करने का समय आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को यह सलाह दी है कि विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों, जुलूसों एवं राजनीतिक रैलियों के दौरान बंदूकबाजी करने वालों के खिलाफ करवाई करें। राज्यों से यह भी कहा गया है कि इन आदेशों का उल्लंघन करने वालों के हथियारों के लाइसेंस रद्द किए जाएं। इसके बावजूद विभिन्न समारोहों में बंदूकबाजी के कारण लोगों का घायल होना जारी है।
विवाह के अवसरों पर बंदूकबाजी का अपना ही इतिहास है। बहुत वर्ष पहले, बरातों में बहुमूल्य सामानों के साथ, लंबी-लंबी यात्राएं करनी होती थीं। इन बारातों पर डाकुओं की नजर होती थी। बारातों को सुरक्षित रखने के लिए कुछ समुदायों में तलवार परंपरागत वेश-भूषा का एक अंग हुआ करती थी। समय के साथ-साथ तलवारों की जगह बंदूकों ने ले ली और डकैतों का भय समाप्त होने के बावजूद, समाज में बंदूकों का चलन बढ़ता ही चला गया है। वस्तुत: इस तरह का प्रदर्शन उन व्यक्तियों के व्यक्तित्व में किसी मानसिक विकार का सूचक है।
याचिकाकर्ता श्याम सुंदर कौशल एवं एक एनजीओ, फाइट फॉर ह्यूमन राइट्स ने गृह मंत्रालय से 'समारोहों के दौरान बंदूकबाजी की घृणित प्रथा की रोकथाम के लिए कड़ी नीति/ नियम/ दिशा-निर्देश बनाने का आग्रह किया था। याचिका में कहा गया है कि 'शस्त्र अधिनियम, 1959 एवं भारतीय दंड संहिता, 1860 के अनुसार, बरातों में हथियार लेकर चलना गैर-कानूनी है तथा लाइसेंस की शर्तों के अनुसार भी सार्वजनिक समारोहों में हथियार लेकर जाना एक निषिद्ध आचरण है।' परंतु रिकार्डों के अनुसार, भारत में बंदूकों से मारे गए व्यक्तियों में अधिकतर, गैर-लाइसेंसी हथियारों द्वारा मारे जाते हैं। गैर-कानूनी हथियार बाजारों में मिल जाते हैं, जिनके निर्माण के दौरान सुरक्षा निर्देशों की अनदेखी आम बात हुआ करती है।
प्राधिकरणों को हथियारों के गैर-कानूनी निर्माण एवं बिक्री पर कड़ाईपूर्वक कारवाई करनी होगी। लोगों को सत्ता के ऐसे मनमाने प्रदर्शन का विरोध करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि उनके मन में ऐसे कार्यों के प्रति विरोध की भावना उत्पन्न हो। आम आदमी को इस दिशा में प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे जब भी किसी को भी ऐसे हथियारों से लैस देखें, तुरंत पुलिस को सूचना दें या इसके बारे में 100 नंबर पर डायल करें।
- भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत अधिकारी एवं पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त