अमानवीय ताकतों से पार पाने और उनको हराने के पराक्रम और संयम का उत्सव है विजयादशमी
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विजयादशमी सदियों से विनाशकारी शक्तियों के विनाश की सूचक रही हैं, और आज भी उसका मूल रूप वही है। उसी रूप में मनाई जाती है विजयादशमी-रावण का पुतला जलाकर। पर इस प्रतीक रूप से आगे, उसके कुछ और गहरे अर्थ हैं।
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विजयादशमी सदियों से विनाशकारी शक्तियों के विनाश की सूचक रही हैं, और आज भी उसका मूल रूप वही है। उसी रूप में मनाई जाती है विजयादशमी-रावण का पुतला जलाकर। पर इस प्रतीक रूप से आगे, उसके कुछ और गहरे अर्थ हैं।
वह मुक्ति का संदेश भी देती है-ऐसी ताकतों से मुक्ति का संदेश, जो मानवीय मूल्यों की धज्जियां उड़ाने से नहीं हिचकिचातीं। तो एक ओर विजयादशमी जहां बुराई की ताकतों के दमन का उत्सव मनाती है, वहीं यह आग्रह भी रखती है कि उन्हें पनपने न दिया जाए। यह मानो एक संकल्प दिवस भी है-अमानवीय ताकतों से पार पाने का, उनसे संघर्ष करने का, आतंकी शक्तियों को हराने का। हम जानते हैं कि विजयादशमी का त्योहार अपने साथ और भी बहुत कुछ लेकर आता है।
दुर्गा पूजा की ऋतु भी यही है। रामलीलाएं होती ही हैं। और इन सबसे एक ऐसा सामाजिक-सांस्कृतिक फलक बनता है, जो जीवन में उजास भरने का यत्न करता है। और इसमें भला क्या संदेह कि इससे जुड़े मेले-ठेले हमारे यहां एक भाईचारे के रूप में संपन्न होते रहे हैं। उत्सव अपने-आप में सद्भाव के प्रेरक हो जाते हैं। आज जब हम विजयादशमी का त्योहार मना रहे हैं, तो यह बात सहज ही ध्यान में आती है कि मानवीय मूल्यों की रक्षा जिस रूप में होनी चाहिए, वह हो नहीं पाई है।
उस दिशा में करने को बहुत कुछ शेष है। स्त्रियों की सुरक्षा के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। हम अब भी मिलावटी चीजों से जूझ रहे हैं, मिलावटी मिठाइयों से लेकर मिलावटी सीमेंट तक की खबरें आती हैं। 'रोड रेज' की घटनाएं होती ही हैं। रिश्वतखोरी बिल्कुल समाप्त हो चुकी है-ऐसा दावा नहीं किया जा सकता है। कई तरह की सामाजिक विषमताएं अब भी मौजूद हैं। और ऐसी हृदय विदारक घटनाएं हो रही हैं, जहां किसी मामूली शक-शुबहे में लोगों को तरह-तरह से दंडित-प्रताड़ित किया जाता है।
विजयादशमी एक लोकोत्सव के रूप में मनती रही है। किसान हों, खेतिहर मजदूर हों, फल-फूलों का व्यापार करने वाले हों, सामान्य दुकानदार हों, शिल्पी हों, हस्तशिल्पी हों, सबकी भागीदारी इस लोकोत्सव में रहती है। रामलीला की जो तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है, उसमें मानो कुल समाज की भागीदारी रहती है। रामनगर की रामलीला, भले वाराणसी और रामनगर की हो, शहरी क्षेत्रों की, लेकिन उसमें भी समूचा लोक शामिल रहता है।
बचपन में भला किसकी इच्छा नहीं होती होगी 'रामलीला' देखने और रावण का पुतला दहन देखने की! हम बच्चे कितने उत्साह से शामिल होते थे अपने गांव की रामलीला देखने वालों की भीड़ में। देर रात तक देखते थे। आंखों की नींद गायब हो जाती थी। 'भरत मिलाप' का दृश्य हो या लक्ष्मण के मूर्च्छित हो जाने का, या हनुमान के लंका पहुंचकर की जाने वाली चेष्टाओं और मुद्राओं का-कभी हमारी आंखें भर आती थीं, तो कभी हम खिलखिला उठते थे। यह कथा ही ऐसी है, जो मन में विभिन्न भावों और रसों का संचार करती है। और आज भी जब नोएडा के अपने रिहायशी परिसर में रावण का पुतला जलाया जाता हुआ देखता हूं, तो छोटे बच्चों की आंखों में वैसा ही कौतुहल, वैसी ही उत्सुकता देखता हूं-जैसी बचपन में हमारी आंखों में हुआ करती थी। यह रामकथा हमेशा नई बनी रहती है, इसलिए तो हर काल के लिए यह प्रासंगिक है, प्रेरक है।
इस वर्ष जब हम बापू की 150वीं जयंती मना रहे हैं, तो इस वर्ष का दशहरा भी विशेष हो उठा है। कुछ तो इसलिए भी कि बापू की जन्मतिथि के आसपास ही उसका आगमन हुआ है। बापू यानी मोहनदास करमचंद गांधी, जो महात्मा कहलाए, उनके विचार भी पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सोशल मीडिया में, सार्वजनिक मंचों पर काफी जगह घेरे हुए हैं। और अच्छा है कि बापू के विचार हमारे आसपास की जगह घेरे हुए हैं, जो याद दिला रहे हैं कि आत्म-बोध और आत्म-शोधन संभव है। भूलें सुधार ली जा सकती हैं। हाथ के बने हुए कामों को, शिल्पों-हस्तशिल्पों को जी भर सराहा जा सकता है। नैतिक बल एकत्र करके उन ताकतों से संघर्ष किया जा सकता है, जो सुकार्यों में अवरोध बन जाती हैं। अहिंसा का औजार आज भी कारगर हो सकता है।
तो विजयादशमी में रावण का पुतला तो जले ही, संकल्पनाओं के द्वार भी खुलें-उजास और उजाले की, हर तरह के उजाले की नई आहट हो। स्वच्छता अभियान जड़ पकड़े और हम नदियों के प्रदूषित जल और हवा के प्रदूषित कणों को निर्मल कर सकें। किसान विजयादशमी के लोकोत्सव को उत्साह से मना सकें। सबके सुख और शांति के लिए कल्पनाएं और संकल्पनाएं और भी हो सकती हैं, उन्हें मन में लाने, और कार्यरूप में परिणत करने का उत्साह भी जगाया जा सकता है। तो जगाएं वह उत्साह और उछाह, जो विजयादशमी के अनुरूप हो, उसकी मूल प्रकृति से मेल खाता हो।
ऋतु-चक्र बदल रहा है। प्राकृतिक विपदाएं भी चेतावनी दे रही हैं कि उनसे निपटने के लिए एक नए पराक्रम की जरूरत होगी। पटना की विपदा यही बता रही है। और इस बार की विजयादशमी उन सबके साथ खड़े होने का समय भी है, जो किसी न किसी संकट में हैं। विजयादशमी का पौराणिक प्रसंग तो ध्यान में रखने लायक है ही। नई पीढ़ियों को सिर्फ राम-रावण और सीता हरण, और लंका दहन की घटनाएं भर न बताकर, यह बताने की भी जरूरत है कि 'रावण रथी, विरथ रघुवीरा' की वास्तविक ध्वनि क्या है। क्या वही नहीं, जो महात्मा गांधी के भी जीवन और विचार का मर्म था। राम की 'मर्यादा' सदियों से एक प्रेरक शक्ति का काम करती रही है और करती ही रहेगी।