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सामूहिकता और समरसता का उत्सव
मैत्रेयी पुष्पा
Updated Thu, 01 Mar 2018 07:05 PM IST
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मैत्रेयी पुष्पा
होली खुशियों का उत्सव है, नवता का उत्सव है, आपसी भाईचारे का उत्सव है और सामूहिकता व समरसता का उत्सव है। इस मौसम में प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम पर होता है। आम के बगीचे में नए मंजरों की महक होती है और पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं। गांवों में खेतों में सरसों, अलसी, अरहर आदि के फूल मन को मोह लेते हैं। असल में हमारे ज्यादातर भारतीय त्योहार मूलतः कृषि संस्कृति से जुड़े हुए हैं। जिस तरह जब खेतों में खरीफ फसल तैयार होती है, तो दिवाली का त्योहार मनाया जाता है, उसी तरफ रबी की फसल पकने पर हम होली मनाते हैं। इस मौसम में फसल पककर तैयार होती है और उसी की खुशी मनाने के लिए होली का त्योहार मनाया जाता है।
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भले ही आज के बाजारवादी दौर में इस पर्व के साथ विकृतियां जुड़ गई हों और मिलावट का असर त्योहार की खुशी को फीका कर रहा हो, लेकिन इस त्योहार में जो रंग हमारे बचपन में उपयोग किए जाते थे, वे भी पत्तियों, फूलों, और अन्य प्राकृतिक उपादानों से बनाए जाते थे। गांवों में जो होली जलाई जाती है, उसमें नई फसलों (गेहूं की बालें और चने की छिम्मियां) को पकाया जाता है और उसमें से दाने निकालकर आपस में एक-दूसरे को बांटते हैं। उसके बाद ही होली का उत्सव शुरू होता है।
मैंने गांवों में ही होली खेली है और ग्रामीण समाज की जो सामूहिकता और समरसता है, उसका अभाव शहरों में दिखता है। होली के मौके पर गांवों में हमने यह भी देखा है कि अगर किसी के घर में गेहूं नहीं है या किसी के दरवाजे पर दुधारू पशु नहीं है, तो दूसरे लोग स्वयं ही उसके घर जाकर जरूरत की चीजें दे आते हैं, ताकि उत्सव मनाने से वे वंचित न रहें। तो यह सामूहिकता और आत्मीयता भी मुझे होली के अवसर पर अब भी गांवों में देखने को मिलती है। लोग जब रंग खेलने निकलते हैं, तो रिश्तों की मर्यादा और गरिमा का ख्याल रखते हुए एक-दूसरे को आत्मीय प्रेम और गुलाल में रंगते हुए चलते हैं। लोग रिश्ते की मर्यादा का ख्याल रखते हैं। गांवों में तो लोग एक-दूसरे पर होली के हुड़दंग में कीचड़ भी डाल देते हैं, पर इस त्योहार की खासियत है कि कोई इसका बुरा नहीं मानता।
होली की खुशी में घर में तरह-तरह के पकवान बनते हैं। लोग एक-दूसरे का मुंह मीठा करते हैं। दोपहर में गांवों में होरी गाने वालों की मंडली घर-घर जाकर होली गीत गाती है और उनके साथ महिलाएं भी होती हैं। पुरुष जहां जगत में जिसका जगत पिता रखवारा/उसे मारने वाला हमने कोई नही निहारा रे और जोगीरा गाते हैं, वहीं उनके पीछे-पीछे रंग भरे लोटे लिए चलने वाली महिलाएं गाती हैं-समहे (समय) की लाज रखो गोरी। यह गीत पुरुषों की ओर महिलाएं ही गाती हैं और इसके जवाब में महिलाएं ही कहती हैं-नाक नथुनियां मोपे हत नाईं/ क्या तो पहिर के खेलूं होरी। फिर पुरुषों की ओर से महिलाएं गाती हैं-अबके तो गोरी तू यों ही हंस खेलो/फिर के गढ़ा दूं दो जोड़ी। जिन घरों में कोई शोक होता है, उनके घर जाकर ये महिलाएं उन घरों की स्त्रियों पर रंग के छींटे डालती हैं और होली की खुशी में शामिल कर लेती हैं।
इस त्योहार के साथ हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका की कहानी जुड़ी हुई है। बेशक यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, पर इस मिथक में स्त्री को ही बुरा दिखाया गया है, इसलिए यह मुझे ठीक नहीं लगता। खैर, यह त्योहार नई फसलों की उमंग, नई ऋतु के उत्साह और लोकजीवन की सामूहिकता और समरसता का उत्सव है, जो आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है।