चंद्रयान के दौर में जाति : चांद पर जाना आसान है, पर मर्जी से शादी करना मौत को निमंत्रण देना है
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जिस दिन हमारे देश में बना उपग्रह चंद्रयान चांद पर उतरेगा, उस दिन पता नहीं, कितने पटाखे फूटेंगे, आतिशबाजी होगी और हम सब फूले नहीं समाएंगे। टीवी चैनलों के लोग घूम-घूमकर पूछेंगे ‘बताइए, इस चमत्कार का श्रेय किसे दिया जाए? एकाध ही यह कहने वाला होगा कि इस बड़ी उपलब्धि के पीछे देश के वैज्ञानिकों की मेहनत और वैज्ञानिक सोच का प्रसार करने वाले आला दर्जे के वैज्ञानिक शैक्षणिक और शोध संस्थानों का योगदान है। ऐसा कहने वाले कम लोग इसलिए होंगे, क्योंकि वैज्ञानिक सोच वाले लोग अब कम हो गए हैं।
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जिस दिन हमारे देश में बना उपग्रह चंद्रयान चांद पर उतरेगा, उस दिन पता नहीं, कितने पटाखे फूटेंगे, आतिशबाजी होगी और हम सब फूले नहीं समाएंगे। टीवी चैनलों के लोग घूम-घूमकर पूछेंगे ‘बताइए, इस चमत्कार का श्रेय किसे दिया जाए? एकाध ही यह कहने वाला होगा कि इस बड़ी उपलब्धि के पीछे देश के वैज्ञानिकों की मेहनत और वैज्ञानिक सोच का प्रसार करने वाले आला दर्जे के वैज्ञानिक शैक्षणिक और शोध संस्थानों का योगदान है। ऐसा कहने वाले कम लोग इसलिए होंगे, क्योंकि वैज्ञानिक सोच वाले लोग अब कम हो गए हैं।
साक्षी मिश्रा और अजितेश की संकटग्रस्त प्रेम कहानी इसका ताजा उदाहरण है। साक्षी कुछ करना चाहती थी, पर उसे घर में घुटन महसूस होती थी। भाजपा विधायक उसके पिता ने उसकी पढ़ाई अपनी सोच के हिसाब से कराई। उसका विषय भी खुद चुना और उसे ऐसे कॉलेज मे भर्ती किया, जहां छात्राओं को बहुत नियंत्रण में रखा जाता है। अजितेश से साक्षी को काफी सहारा मिलने लगा और दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई। उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया।
साक्षी जानती थी कि परिवार के लोग अजितेश को दामाद के रूप में नहीं स्वीकार करेंगे, क्योंकि वह दलित जाति का था। दोनों ने भागकर मंदिर में शादी कर ली। उन्हें मालूम था कि इसका परिणाम खतरनाक होगा। साक्षी ने अपनी और ससुराल के लोगों की सुरक्षा के लिए अपने बयान का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। उसने अपने पिता से आग्रह किया कि वह उनका पीछा न करें, उसके पति और ससुराल को नुकसान न पहुंचाएं, अपने गुंडों को उनका पीछा करने से रोकें।
साक्षी के पिता राजेश मिश्रा के दल के ही मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री हैं, जो महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के प्रति निष्ठावान होने का दावा करते हैं, पर उन्होंने अपने विधायक को अपनी बेटी की सुरक्षा और अधिकारों के प्रति सावधान होने की कोई नसीहत नहीं दी। उन्हें इस बात की याद नहीं दिलाई गई कि जिस संविधान पर हाथ रखकर उन्होंने विधायक बनने की शपथ ली है, वह साक्षी जैसी तमाम बालिग लड़कियों को जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार देता है। उसी संविधान की शपथ लेने वाले अन्य भाजपा विधायकों ने उसकी धज्जियां उड़ाईं।
साक्षी के वीडियो और उसके साक्षात्कार को लेकर सोशल मीडिया में टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। साक्षी की मां का सदमे के कारण बीमार पड़ जाना चर्चा का विषय बना। साक्षी के मां-बाप ने उसके लिए इतना कुछ किया और उसने इस तरह से उनकी जिंदगी तबाह कर दी, यह भी बड़ा विषय बना। इस बात को लेकर साक्षी की आलोचना हुई कि घर से भागने के बाद भी उसके बाल ऐसे लग रहे थे, जैसे कि वह ब्यूटी पार्लर से निकली है।
जन्म आधारित जाति प्रणाली को इस हद तक मानना कि अपने ही बच्चों के दुश्मन बन जाएं, उनकी हत्या करने को तैयार हो जाएं, यह संविधान और कानून के विरुद्ध तो है ही, अवैज्ञानिक भी है।
शायद इसीलिए चंद्रयान भी कुछ शर्मा गया। चांद पर जाने से उसने इनकार कर दिया। कुछ समय बाद जाएगा। शायद देश के लोगों को सद्बुद्धि मिले! सोचिए। चांद पर जाना आसन है, पर अपनी मर्जी से शादी करना कठिन ही नहीं, मौत को निमंत्रण देना भी है।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।