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बिड़ला कैंटीनों में बटर-चिकन

Wed, 10 Sep 2014 05:24 PM IST
कुमार मंगलम बिड़ला/प्रसिद्घ उद्योगपति
कुमार मंगलम बिड़ला/प्रसिद्घ उद्योगपति Updated Wed, 10 Sep 2014 05:24 PM IST
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Butter chicken in birla canteens

महात्मा गांधी की हत्या मेरे परदादा के घर में हुई थी। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गांधी जी जब कभी दिल्ली आते, वह बिड़ला हाउस में ही ठहरते थे। जनवरी 1948 में जब गांधी जी यहां हरी घास भरे प्रांगण में अपनी दैनिक प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे, एक हत्यारे ने उन्हें बिल्कुल पास जाकर गोलियों से भून दिया। यह घर और उसका बगीचा अब गांधी संग्रहालय के रूप में जाना जाता है, जहां उनके हजारों प्रशंसक हर साल दर्शन के लिए आते हैं।

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बहरहाल, बड़ा होते हुए मुझे अपने मारवाड़ी परिवार के जीवन मूल्यों को याद रखने के लिए इस संग्रहालय में जाने की जरूरत नहीं पड़ी। हमारा छोटा-सा मारवाड़ी समुदाय जो मूल रूप से राजस्थान से जुड़ा है, कारोबार में आश्चर्यजनक सफलता के लिए जाना जाता है। इस सफलता का एक कारण यह है कि एक तो हम लोग अपने कुटुंब के साथ घने रूप से जुड़ाव रखते हैं और दूसरे पारंपरिक मूल्यों को, जिसमें से अनेक स्वयं गांधी जी द्वारा दिए गए है, अमल में लाते हैं। अपने पिता की अकस्मात मृत्यु के बाद 1996 में जब 29 साल की उम्र में मैंने अपनी कंपनी संभाली, तब हमारे बिड़ला कैफेटेरिया में न तो मीट आदि पकाया जाता था और न ही कंपनी के समारोहों में वाइन या व्हिस्की परोसी जाती थी। इसके सात साल बाद हमने ऑस्ट्रेलिया में तांबे की एक खदान खरीदी। यह सौदा तो कोई बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इसने मेरे सामने एक अजब चुनौती पेश कर दी।
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हमारे नए कर्मचारी इस बात को लेकर चिंतित थे कि पता नहीं, एक भारतीय की मिल्कियत में आई कंपनी में उन्हें अपनी खान-पान का परित्याग तो नहीं करना पड़ेगा। हमने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसा नहीं होगा। इसके बाद हमारे भारतीय मैंनेजरों ने पूछना शुरू किया कि अगर विदेशों में हमारे कर्मचारियों को मांस परोसा जा सकता है, तो हमें क्यों नहीं। शाकाहार हमारे परिवार और हमारी कंपनी के जीवन मूल्यों का एक अंग था। यों मैंने कई पारिवारिक परंपराएं तोड़ी थी, मगर यह तो मेरे लिए कई तरह से भयानक था। मगर जब मैंने अपने दादा-दादी के सामने यह समस्या रखी, तो वे हंसने लगे। वे मेरी तुलना में ज्यादा अच्छी तरह से इस बात को समझते थे कि वक्त के साथ हमारी कंपनी को भी बदलना होगा।
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आज आदित्य बिड़ला ग्रुप भारत का सर्वाधिक ग्लोबल व्यापारिक घराना है। पांच महाद्वीपों के 36 देशों में हमारे 1,36,000 कर्मचारी काम करते हैं। हमारे कुल राजस्व का 60 प्रतिशत विदेशों से आता है। चेयरमैन बनने के बाद मैंने विदेशों में कुल आठ अरब डॉलर से भी ज्यादा की 12 कंपनियों का अधिग्रहण किया है। इनमें खनन, लुगदी, एल्युमीनियम और बीमा कंपनियां शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ देशों में हमारी शाखाएं हैं। अभी हमारा उच्च प्रबंधन पूरी तरह मारवाड़ी न हो, तो भी भारतीय जरूर है। लेकिन मुझे लगता है कि एक दशक बाद हमारे आधे से ज्यादा वरिष्ठ अधिकारी दूसरे देशों के लोग होंगे। जब पहली बार अपनी बिड़ला कैंटीन में मैंने बटर-चिकन परोसे जाते देखा, तब मुझे एहसास हुआ कि जिस बारे में मैंने सबसे कम सोचा था, वही सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया। पर अपने कारोबार का अंतरराष्ट्रीय विस्तार करने की इस प्रक्रिया में मैंने एक चीज जरूर सीखी और वह यह कि अगर भारतीय कंपनियों को विश्व विजेता कंपनियों के रूप में अपना विस्तार करना है, तो उन्हें कुछ अप्रिय अनुभवों के लिए भी अपने को तैयार रखना चाहिए।

मैंने जब 2007 में अपनी अब तक की सबसे बड़ी खरीद छह अरब डॉलर की एल्युमीनियम की विशाल कंपनी नोवेलिस का अधिग्रहण किया, तो मैंने अपनी एक टीम को वहां भेजा और यह हिदायत दी कि पहले यह पता लगाओ कि अमेरिकी कर्मचारियों का रवैया कैसा है। एक भारतीय कंपनी-समूह में काम करने के बारे में वे क्या सोचते हैं। इस अधिग्रहण के बाद हम दुनिया में रोल्ड एल्युमीनियम के सबसे बड़े उत्पादक बनने जा रहे थे। मगर अपने अमेरिकी कर्मचारियों की इन छोटी-मोटी चिंताओं को समझना भी हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना संयंत्र की मशीनरी, लाभ और उत्पादकता से जुड़े आंकड़ों को समझना।


कुछ भारतीय कंपनियां अपने विदेशी अधिग्रहण के बाद उन्हें चलाने का जिम्मा उन्हीं लोगों पर छोड़ देती हैं। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि आपके नए कर्मचारी उन्हीं जीवन मूल्यों का अनुसरण करें, तो आपको एक ऐसा भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना पड़ता है, जैसा भारत में बिड़ला के नाम से लोग अनुभव करते हैं। इसके लिए आपको अपने सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। परंपराओं से जुड़ी हमारी जैसी कंपनियों के लिए यह भले सबसे मुश्किल काम हो, मगर यह मूल्यवान है कि हम नए अधिग्रहणों से सीखें और उसके मूल्यों को यहां भी लाएं। यह कैफेटेरिया में परोसे जाने वाले भोजन से आगे की चीज है। कुछ अनुभव तो और भी आश्चर्यजनक रहे। अंतरराष्ट्रीय विस्तार से पहले मैं उन लोगों से ज्यादा प्रभावित होता था, जो क्वीन्स इंग्लिश बोल पाते थे, लेकिन आज जब मैं ब्राजील या मिस्र या थाईलैंड जैसी जगहों में अपने कर्मचारियों को देखता हूं, तो पाता हूं कि बहुत सारे लोग हैं, जो अच्छी तरह अंग्रेजी नहीं बोल पाते, लेकिन वे अपना काम करने में माहिर हैं। आज मैं मानता हूं कि अगर आप अपनी बात समझा सकते हैं, सक्षम हैं और कंपनी के मूल्यों में कुछ जोड़ रहे हैं, तो काफी है और आपकी अंग्रेजी भाड़ में जाए।

(लेखक आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन हैं और यह मेकेंजी द्वारा प्रकाशित पुस्तक रिइमेजनिंग इंडिया में प्रकाशित उनके लेख का संपादित अंश है)

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