तस्वीर बदल सकते हैं देश के कुबेर
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गगनचुंबी अंबानी टॉवर्स की तस्वीरों और माल्यालैंड व डीएलएफाबाद की तड़क-भड़क को देखकर झुग्गी में रहने वाले किसी गरीब बच्चे के जहन में आक्रोश नहीं पनपता, बल्कि वह इसे विस्मय से देखता है। भारतीयों ने ही डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट बॉर्नरिच डॉट कॉम शुरू किया और उसे चला रहे हैं। इस वेबसाइट से आप हर श्रेणी के चुनिंदा लग्जरी उत्पादों का प्रामाणिक लग्जरी अनुभव ले सकते हैं। इनमें ऑटोमोबाइल्स, गैजेट्स और ज्वेलरी से लेकर बहुत ऊंची कीमत वाले रियल इस्टेट, संग्रहणीय वस्तुओं और नीलामी बाजार के लग्जरी ट्रेंड का विश्लेषण शामिल है। इन दिनों ऐसा कहीं और नहीं होता।
कई देशों में तो धनाढ्य वर्ग आम लोगों के निशाने पर आ चुका है। असंतुष्ट होकर लोग सड़कों पर उतर आए। अमेरिका का अक्यूपाई वाल स्ट्रीट और इटली का द इनडिगनाडोस इसका उदाहरण है। वहीं फ्रांस, ब्रिटेन सहित तकरीबन पूरे यूरोप की सरकारें अमीरों पर ज्यादा कर और लेवी लगाकर अपने खजाने को भरने की कोशिशें कर रही हैं, क्योंकि वे वित्तीय संकट से जूझ रही हैं।
संपन्न लोगों की धरती अमेरिका में इस बात पर सहमति बढ़ती जा रही है कि अमीरों को लोकहित के कामों के लिए आगे आना चाहिए। वहां हालांकि यह काम उच्च कर के माध्यम से नहीं, बल्कि परोपकार के जरिये होने की उम्मीद की जा रही है। हाल के वर्षों के दौरान वहां लोकहित से जुड़े कामों के लिए धन देना, सामान्य बात होती जा रही है। ऐसा भी नहीं है कि करियर के आखिरी पड़ाव पर लोग इस तरफ रुचि दिखा रहे हों, युवा उद्यमी भी इस दिशा में सक्रिय हैं।
वहीं, भारत को लेकर ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सामाजिक कार्यों के लिए अमीरों की तरफ से दिये जा रहे दान की स्थिति बहुत सामान्य है। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार, भारत के 100 सबसे धनाढ्यों की कुल संपत्ति तकरीबन 250 अरब डॉलर है। इनमें दो-तिहाई अरबपति हैं। अब अगर हम भारत के शीर्ष 10 दानदाताओं की सूची देखें, तो पाएंगे कि अजीम प्रेमजी इसमें सबसे ऊपर हैं। केवल तीन धनाढ्यों ने अपनी कमाई का दस फीसदी या उससे अधिक का दान किया है। जबकि अमेरिका का धनाढ्य वर्ग अपनी कमाई का औसतन नौ फीसदी से अधिक सालाना तौर पर दान करता है।
भारत की सूची में मुकेश अंबानी 10वें स्थान पर हैं और उन्होंने अपनी कुल संपत्ति (21 अरब डॉलर) का केवल आधा फीसदी दान किया है। इस सूची में शामिल दस अमीरों ने करीब दो अरब डॉलर से कुछ अधिक रकम लोकहित के कार्यों के लिए दिया। यह भारत के उच्च धनाढ्य वर्ग की कुल संपत्ति का बहुत मामूली हिस्सा है।
सामाजिक कार्यों के लिए दान देने की प्रवृत्ति, विशेषकर बड़े स्तर पर, खुद-ब-खुद विकसित नहीं होती। निश्चित रूप से अमेरिका में निजी दानदाताओं का एक लंबा इतिहास रहा है। पर हालिया पुनरुत्थान 1990 के दशक के अंत से शुरू हुआ, जब सीएनएन के टेड टर्नर ने अचानक एक सार्वजनिक भाषण में बेहद शानदार तरीके से कहा कि सामाजिक कार्यों के लिए वह एक अरब डॉलर मुहैया करा रहे हैं।
उनके इस कदम से अमीरों, स्लेट जैसी मीडिया वेबसाइटों और निगरानी समूहों की ओर से धनाढ्यों की खोज, उनकी दान संबंधी दस्तावेज को लोगों के सामने लाने और टर्नर का अनुकरण करने के लिए अन्य लोगों को आगे बढ़ाने का दबाव बना। इसी क्रम में 2000 में बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने अपना फाउंडेशन शुरू किया। फिर 2006 में वारेन बफेट ने 31 अरब डॉलर की रकम गेट्स फाउंडेशन को दान कर दी और संक्रमित बीमारियों से लड़ने और शिक्षा में सुधार के लिए सहयोग का वायदा किया।
बफेट का दान केवल अपने आकार की वजह से ही परिवर्तनकारी नहीं था, बल्कि वह फैसला इसलिए भी अहम था, क्योंकि इसके तहत उन्होंने अपने नाम से नया फाउंडेशन न स्थापित करके एक ऐसी संस्था को समर्थन दिया, जो पहले से समाज की बेहतरी के लिए काम कर रहा था। समाजसेवी संगठनों की समृद्ध परंपरा की तरह ही लोकहित में निजी दान का इतिहास भारत में भी पुराना है।
पर मौजूदा वक्त में भारतीय पूंजीवादी दान प्रणाली का शायद ही कोई ऐसा चिह्न दिखाई पड़ता है, जो कई अहम समस्याओं- जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, सुरक्षा- को सुलझाने के लिए बड़े पैमाने पर निजी दान देकर सरकार का बोझ कम कर सके। वैसे इन समस्याओं से जूझने की ऐतिहासिक जवाबदेही सरकार की रही है, लेकिन वित्तीय तंगी के चलते वे इस दिशा में दृढ़ इच्छा नहीं दिखा पा रही हैं।
अजीम प्रेमजी के अलावा भारतीय दानदाताओं की सूची में शिव नादर, नंदन और रोहिणी नीलेकणि, रतन टाटा जैसे कुछ अन्य लोग भी हैं। साथ ही कुछ उत्साहजनक संकेत भी मिल रहे हैं। पिछले वर्ष की एक रिपोर्ट में बेन ऐंड कंपनी ने बताया है कि दानदाताओं के आधार में विस्तार हो रहा है और नए युवा दानदाताओं की रुचि इस तरफ बढ़ी है। यह जरूरी है, क्योंकि निजी दानदाताओं में बड़े पैमाने पर प्रभावकारी परिवर्तन पैदा करने की क्षमता मौजूद है। यह ज्यादा समावेशी है।
उदाहरण के लिए अमेरिका में सभी संस्थाओं की 38 अरब डॉलर की तुलना में 2009 में निजी दानदाताओं ने धर्मार्थ कार्यों के लिए 227 अरब डॉलर दान दिए। इसलिए अति अमीरों को उनके धन के इस्तेमाल के प्रति ज्यादा जवाबदेह होने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ-साथ हमें मध्यम अमीरों को भी दान की प्रवृत्ति आत्मसात करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।