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उम्मीदों के बोझ से दबे

अवधेश कुमार

Updated Wed, 21 Nov 2012 12:25 AM IST
burden of expectations
कांग्रेस में 10 जनपथ के समर्थकों की बांछें खिल गई हैं, क्योंकि राहुल गांधी को नेतृत्व थमाने की उनकी कवायद रंग लाई है। राहुल ने अगले लोकसभा चुनाव के लिए बनी समन्वय समिति के प्रमुख की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है। संसदीय लोकतंत्र के भारतीय संस्करण में दलों का मूल्यांकन मुख्य रूप से चुनावी प्रदर्शन पर ही निर्भर होता है। इसे हम राहुल के शीर्षतम नेता की ओर प्रयाण मानें, तो आने वाले समय में संगठन के फेरबदल में भी उनका प्रभाव दिखेगा। इस तरह सोनिया गांधी के बाद वह संगठन में दूसरे क्रमांक के नेता होंगे। कहने की आवश्यकता नहीं कि अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी ही करेंगे।
लगता है कि कांग्रेस अपने को ज्यादा व्यवस्थित, चुस्त और पूर्णतः सक्रिय बनाने की ओर अग्रसर है। पहले संगठन और सरकार के बीच मतभेद की बातें सामने आती थीं। अब यह संदेश दिया जा रहा है कि सरकार एवं संगठन, दोनों में पूर्ण समन्वय और एकता है।

रामलीला मैदान में महारैली करके सरकार की नीतियों का समर्थन तथा पार्टी नेताओं से उसके पक्ष में एवं विपक्ष के विरुद्ध माहौल बनाने का आह्वान, फिर सूरजकुंड में संवाद और उसमें सोनिया गांधी द्वारा एक समन्वय समिति तथा उसके अंदर तीन उपसमितियां बनाने की घोषणा एवं फिर उसका क्रियान्वयन और आगे चिंतन शिविर की योजना... इन सबमें सुनियोजित क्रमबद्धता दिखती है।

उधर प्रधानमंत्री ने पहले सारे सहयोगियों को भोजन पर बुलाया, फिर विपक्ष को, पर बाला साहब ठाकरे के निधन के कारण भाजपा के साथ यह कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। साफ है कि संसद के अंदर भी सरकार खुद को चुस्त एवं विपक्ष के साथ आर्थिक कदमों पर संवाद स्थापित करके रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है।

इस तरह बदलाव की कोशिश के साथ राहुल को शीर्ष पर लाने का काम ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। जो तीन समितियां बनी हैं, उनमें कुल 27 नेता हैं, जिनमें 11 केंद्र में मंत्री है। इनमें केवल छह नेता ऐसे हैं, जिनकी उम्र 50 वर्ष से कम है। यानी यह अपेक्षाकृत युवाओं की टीम नहीं है। अगर राहुल को पूरी पार्टी का संगठन एवं सरकार के स्तर पर नेतृत्व करना है, तो उन्हें बुजुर्ग एवं युवा, दोनों के बीच समन्वय बनाना होगा।

समन्वय समिति के सदस्य जयराम रमेश की मानें, तो समन्वय समिति पार्टी की नीति निर्धारक टीम की तरह काम करेगी। चुनाव से पहले आम आदमी से सीधे जुड़ी कई योजनाओं को अमली जामा पहनाया जाएगा। गठबंधन तथा घोषणापत्र समिति के अध्यक्ष एंटनी के मुताबिक, चुनाव पूर्व गठबंधन ही अगली राजनीति की दिशा तय करेगा। समिति का ध्यान मौजूदा साथियों को भरोसे में रखने के साथ नए साथी तलाशने पर होगा। नीतियों और कार्यक्रमों के अलावा चुनाव घोषणापत्र के लिए काम करना भी चुनौतीपूर्ण होगा। जाहिर है, गठबंधन, रणनीति, घोषणा, प्रचार, विपक्ष की काट आदि सारे जरूरी विषयों पर अलग-अलग टीमों ने काम शुरू कर दिया है, जिनका संयोजन राहुल के नेतृत्व में होगा।

इस तरह कांग्रेस ने भविष्य के अपने नेता की ताजपोशी की आधारभूमि बना दी है और यदि पार्टी लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर सरकार बनाने की स्थिति में आती है, तो राहुल गांधी मनमोहन सिंह का स्थान लेंगे। किंतु यह आसान नहीं है। अभी कई राज्यों के चुनाव होने हैं, उसमें राहुल को पार्टी का बेहतर प्रदर्शन करके दिखाना होगा। ऐसा नहीं होने से जनमानस पर नकारात्मक असर पड़ेगा। भ्रष्टाचार और महंगाई के चलते कांग्रेस को लगातार विपक्ष का वार झेलना पड़ रहा है।

इसकी काट केवल बयान नहीं है, सरकार को स्थिति में बदलाव लाना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो राहुल को प्रधानमंत्री बनाने का सपना धरा रह जाएगा। साथ ही जिन राज्यों में संगठन कमजोर है, वहां उसे मजबूत बनाने के लिए भी काम करना होगा। उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पंजाब में राहुल का जादू नहीं चला। यह बात उनके समर्थक एवं रणनीतिकार भी जानते हैं कि केवल नेहरू-इंदिरा परिवार का नाम चुनावी बेड़ा पार नहीं लगा सकता। सरकार के काम और संगठन की शक्ति, दोनों के संतुलन से ही ऐसा संभव है।

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