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बाम लगा, बजट से मुक्ति पा
अशोक गौतम
Updated Tue, 05 Mar 2013 09:44 PM IST
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पत्नी का मायके से आने का मैंने मन से कभी इंतजार नहीं किया, पर अब बजट के इंतजार से भी पीछा छूटा! कम्बख्त ने चैन न होने के बाद भी बड़ा बेचैन करके रखा था। 'बड़ा बजट-बड़ा बजट' चीखे जा रहे थे चिंतक!
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इस देश की जनता के लिए वसंत उतना महत्व नहीं रखता, जितना बजट रखता है। इस बजट का इंतजार करते-करते वह अपने बजट को भूल जाता है। वह जागना भूल जाता है, सोना भूल जाता है, हंसना और रोना भी भूल जाता है। सो मैंने वसंत के सपनों को दरकिनार कर बजट के सपने लेने शुरू कर दिए। वसंत मुझे देता भी क्या? मंद-मंद चलने वाली बयार मेरे किस काम की? मुझे तो अपने जैसों के पढ़े बच्चों के लिए रोजगार चाहिए।
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बजट को लेकर जितने अखबार, उतने तोहफों के सपने! जितने चैनल, उतने तोहफों के सपने। मर गया बजट के तोहफों के सपने अपनी आंखों में रेत की तरह भरता-भरता! कोई कहता अबके बजट आम जनता द्वारा पांच साल से देखे जा रहे हर सपने को पूरा कर देगा, चुटकी में! तो कोई कहता कि अबके बजट में आम आदमी ही आम आदमी होगा। सरकार ने मन बना लिया है कि अपने आम आदमी को खुश करने में अबके वह कोई कोर-कसर न छोड़ेगी।
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चुनाव सिर पर जो हैं, दोपहर के जेठ महीने के सूरज की तरह। लाख छाता ले लो भैया। लू लगने का खतरा तो बरोबर बना ही रहता है। और मैं, कभी अखबार न पढ़ने वाला, बीड़ी लानी छोड़कर रोज घर में चार-चार अखबार लाकर अखबार वालों के बजट के तोहफों के सपनों के साथ अपनी फूटती आंखों का तालमेल बिठाने लगा। पड़ोसन ने डांटा भी, इस उम्र में सपने देखना अच्छा नहीं। तुम्हारा दिल वैसे ही पहले कमजोर है, पर मैंने पड़ोसन की बातों पर अबके भी कोई ध्यान दिया।
और लो भैया! बजट भी चला गया। एक बार फिर अपने सारे सपने धरे रह गए। उन्होंने अबके भी मुझ जैसों को भगवान भरोसे छोड़ दिया! बजट के बाद देख रहा हूं कि महंगाई के गिद्ध घरों पर बेरोकटोक मंडरा रहे हैं। चलो, ठीक है भैया! बजट के तोहफों के सपने लेते-लते तो पीठ में दर्द हो गया री सरकार।
पर बजट में तेरे लिए बाम का प्रावधान तो है रे आम आदमी। ब्रांडेड न सही, देसी ही सही! चल, बजट के तोहफों के सपने लेते-लेते कहराती पीठ में बाम लगा। देख, द्वार पर मुन्नी बाई तेरे दर्द निवारण के लिए पीड़ाहारी बाम लिए कबसे खड़ी हैं।