चुनाव में बाजार का गुब्बारा
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महज सात महीने पहले तक हालात यह थे कि भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंताओं की वजह से निवेशकों ने यहां के बाजारों से दूरी बना ली थी। तब रुपये में रिकॉर्ड गिरावट आ चुकी थी, और शेयर बाजार बुरी तरह लुढ़का हुआ था। लेकिन अब निवेशक इस उम्मीद में वापसी कर रहे हैं कि अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में जीतकर आने वाली भारत की नई सरकार की सोच व्यापार की ओर झुकाव रखने वाली होगी। भारत के दो प्रमुख शेयर सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दूसरे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को चुनौती देते हुए नई ऊंचाइयां छू रहे हैं। पिछले साल की तुलना में रुपये में 14 फीसदी का उछाल आया है।
दरअसल विदेशी निवेशकों की इसमें बड़ी भूमिका है। लोकसभा चुनावों के नतीजों को लेकर जैसी आम धारणा बन रही है, उसे देखते हुए विदेशी निवेशकों ने फरवरी और मार्च महीने में भारतीय शेयर बाजार में दो अरब डॉलर से भी ज्यादा का निवेश किया है। जबकि 2014 की शुरुआती स्थिति ऐसी नहीं थी। हालांकि विश्लेषक इसे निवेशकों का अति आशावाद बता रहे हैं। उनका मानना है भारतीय अर्थव्यवस्था की गंभीर संस्थागत चुनौतियां अब भी बरकरार हैं, जिनसे निपटना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
दरअसल निवेशक यह मान कर चल रहे हैं कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार को प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के हाथों हार का सामना करना पड़ेगा और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे। मोदी ने गुजरात में विदेशी निवेश को हमेशा प्रोत्साहित किया है। इसी वजह से दूसरे राज्यों की तुलना में गुजरात में व्यापार करना कहीं ज्यादा आसान है।
लंदन में 'एफ ऐंड सी इमर्जिंग मार्केट इक्विटीज' के निदेशक सैम मथानी कहते हैं, 'मोदी को लेकर उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं कि वह भारत में नई सरकार का नेतृत्व करेंगे। गुजरात में मोदी के प्रदर्शन से प्रभावित निवेशक भारत में होने वाले इस बदलाव को मील का पत्थर मान रहे हैं। मोदी को सुधारवादी नेता माना जाता है, और इसी की उम्मीद बाजार उनसे करता है।' गौरतलब है कि लंदन की यह निवेश संस्था विकासशील देशों में जो तीन अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश करती है, उसका 10 फीसदी हिस्सा अकेले भारत में करती है।
मथानी के मुताबिक, इससे पहले निवेशकों ने गलत पार्टी और नेता पर भरोसा कर लिया था। मथानी कहते हैं, 'पिछले बीस वर्षों से मैं विकासशील देशों में होने वाले चुनावों को देख रहा हूं। इनको लेकर मेरा अनुभव कहता है कि ये बिल्कुल अप्रत्याशित होते हैं। बेशक कितने ही जनमत सर्वेक्षण क्यों न हो जाएं, इनमें अनिश्चितता बनी ही रहती है। '
2004 में ज्यादातर जनमत सर्वेक्षण की राय थी कि भाजपा जीतेगी। लेकिन जीत मिली कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन को। उसके बाद बाजार में 18 फीसदी की गिरावट देखी गई। मुंबई स्थिति एक ब्रोकरेज कंपनी निर्मल बैंग सिक्यूरिटीज के चीफ एक्जीक्यूटिव राहुल अरोड़ा कहते हैं, 'नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बेशक बन जाएं, लेकिन चीजें रातोंरात नहीं बदलने वाली। अर्थव्यवस्था में सुधार एक धीमी प्रक्रिया है।' अरोड़ा यह भी कहते हैं, 'अभी बदलाव की उम्मीद के आधार पर आकलन किया जा रहा है, लेकिन वर्ष के अंत में यह आकलन जमीनी हकीकत के आधार पर होंगे। और अगर अर्थव्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ, तो निवेशकों को अपने हाथ खींचने में देर नहीं लगेगी।'
दरअसल निवेशकों ने पिछले साल के अंत से ही भारत को लेकर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया था। उसके बाद चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहा। यही नहीं, शेयर बाजार में भी सुधार आया। बदलाव की उम्मीदों के रथ पर सवार विदेशी संस्थागत निवेशकों ने दिसंबर में खत्म होने वाली तिमाही में भारतीय बाजारों में तकरीबन छह अरब डॉलर का निवेश किया। जबकि इससे पिछली तिमाही में यह संस्थागत निवेश तकरीबन 70 करोड़ डॉलर तक सीमित था। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की ताजा रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है। इसके बाद भारत सरकार ने व्यापार घाटे में कमी लाने के लिए स्वर्ण आयात पर कर लगाए, ताकि महंगाई पर काबू पाया जा सके। केंद्रीय बैंक ने सितंबर के बाद से तीन बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की। इसके अलावा सरकार ने बुनियादी संरचना से जुड़ी कई परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई, जो अब तक नौकरशाही की उदासीनता की भेंट चढ़ी हुई थीं।
चीन जैसे दूसरे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार की वजह से निवेशकों में चिंता बनी हुई थी। इसका फायदा भारतीय बाजारों को मिला। यूक्रेन में तनाव का असर रूस के शेयर बाजार पर दिखा। एचएसबीसी में एशिया पैसिफिक इक्विटी स्ट्रैटजी के प्रमुख हेरॉल्ड वान डर लिंडे कहते हैं, 'विकासशील देशों में उपलब्ध विकल्प आम तौर पर आकर्षक नहीं ही होते हैं।'
लेकिन भारत के संदर्भ में बड़ा सवाल यह है कि निवेशकों का आशावाद कब तक चलेगा। मुंबई की एक ब्रोकरेज फर्म प्रभुदास लीलाधर में निवेश रणनीति और सलाहकार प्रमुख अजय बोकडे के मुताबिक, अगर एक बार निवेशकों को पता चल जाए कि वाकई में चुनाव जीत कौन रहा है, आशावाद के इस गुब्बारे की हवा निकलते देर नहीं लगेगी। उनका मानना है कि सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि दिल्ली में आखिर किस तरह की सरकार बनेगी।