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रिवायतें तोड़ने का उत्सव

उदयन वाजपेयी Updated Wed, 27 Mar 2013 12:03 AM IST
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breaking tradition festival
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यह मुझे याद नहीं कि होली का त्योहार बचपन में भी मैंने कभी बड़े उत्साह से मनाया हो। इसका मतलब यह नहीं कि मुझे रंग पसंद नहीं थे।
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ऐसा भी नहीं कि मुझे अपने मित्रों का उद्दंड साथ पसंद नहीं था, पर पता नहीं क्यों, बचपन में मुझे होली के दिन घर से बाहर निकलने में एक अज्ञात किस्म का डर-सा लगने लगता था।

ऐसा महसूस होता था, मानो घर से बाहर निकलने पर मैं किसी विचित्र स्थिति में जा पहुंचने वाला हूं, इसलिए उससे बचने के लिए मैं घर पर ही रह जाता था। हमारे पिताजी शहर के एक रौबदार व्यक्ति थे।

आम दिनों में किसी की कभी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उन्हें कुछ कह भी सके। स्थिति यह थी कि जब वह घर के बाहर पटरियों पर टहल रहे होते थे, तब सामने की सड़क से मोटर-कारें आदि तक निकलनी बंद हो जाती थीं।

उस समय लोग उनके सामने आने में भी डरते-हिचकते थे। यह उनके रौब का प्रताप था या उनके प्रति शहर के लोगों का सम्मान भाव, यह रेखांकित करना कठिन है।

लेकिन होली के दिन आश्चर्यजनक ढंग से यह सारा कुछ बदल जाता था। उस दिन खुली गाड़ियों में शहर के तरह-तरह के लोग घर के सामने की सड़क से नारे लगाते हुए निकलते थे। उन नारों में हमारे पिताजी का खूब मजाक बनाया जाता था। जहां तक मुझे याद है, पिताजी इस सब का बुरा नहीं मानते थे, उलटे उसे सुनकर मुस्करा देते थे।

किसी से कुछ कहते नहीं थे। ऐसा लगभग हर साल होता था। हम यह सोचते थे कि होली के दिन उन्हें इतनी तरह की बातें सुनाई जाती हैं, उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है, मगर उनकी त्योरियां कभी क्यों नहीं चढ़तीं।

उनका गुस्सा सड़क के लोगों पर न सही, घर वालों पर ही बरसता क्यों नहीं? क्रोधित होने के बजाय वह हंसने-मुस्कराने क्यों लगते थे? ऐसा लगता था कि वह किसी परिपाटी का, किसी रिवायत का सम्मान कर रहे थे। तभी तो अपना मजाक सुनकर भी वह चुप रह जाते थे।

हम यह सोचते रहते थे कि होली के दिन आखिर ऐसी कौन-सी रिवायत लागू हो जाती है कि लोग सभी शर्म-लिहाज छोड़कर एक-दूसरे को कुछ भी कह देते हैं। इस दिन रौब-दाब वाले आदमी का भी ऐसा मजाक बनाया जाता है कि लोग हंसने-खिलखिलाने लगते हैं।

इस दिन लोग रंग डालने के बहाने एक-दूसरे को छूते हैं, एक-दूसरे पर बिना पूछे ही रंग डालते हैं, एक-दूसरे को बिना पूछे रंग में डालते हैं। तब यह सब कुछ हमारी समझ में नहीं आता था। लेकिन धीरे-धीरे ये सब बातें मेरी समझ में आने लगीं। मैंने जो समझा, उसे ही यहां रख रहा हूं।

वस्तुतः दुनिया में ऐसा कोई मानव समाज नहीं है, जो बिना किन्हीं नियम-कानूनों के चलता हो। दरअसल सभी समाजों को सुचारु रूप से चलाने के लिए तरह-तरह के नियम-धर्मों का पालन करना पड़ता है। सभी यह जानते हैं कि ये नियम अलग-अलग कालों में अलग-अलग हुआ करते हैं।

ये नियम-कायदे समय और आवश्यकता के अनुसार बदलते अवश्य हैं, पर ऐसा कोई समाज नहीं है, जिसमें ये सब न हों। यह भी सच है कि हर व्यक्ति यह जानता है कि ये नियम मनुष्यों के ही बनाए हुए हैं, पर तब भी इनको इस तरह लागू किया जाता रहता है, मानो इन्हें ईश्वर या प्रकृति ने बनाया हो।

मानो, इन नियम-कानूनों को तोड़ दिया गया या इनका उल्लंघन किया गया, तो प्रकृति और ईश्वर का कोप हम पर बरसने लगेगा। इसलिए लोग इन्हें चुनौती देने में डरते हैं। वे मान बैठे हैं कि ये नियम-कानून हमारी बेहतरी के लिए बनाए गए हैं। आम दिनों में तो यह रेखांकित करना ही मुश्किल होता है कि जिन नियमों से समाज चल रहा है, वे मनुष्य के ही बनाए हुए हैं।

अगर ऐसा होने लगे, तो समाज को बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। पर साथ ही, ऐसा अगर बिल्कुल भी न हो यानी उन्हें चुनौती न दी जाए, तो नियमों को समयानुसार बदलना भी मुश्किल हो जाएगा।

ऐसा कुछ समाजों में होता भी है, जहां सारे नियम-कानूनों को दैवीय मानकर उनमें सभी तरह की जीवन पद्धतियों को जबरन ठूंस दिया जाता है। इस तरह के समाजों में समय के मुताबिक बदलाव की संभावनाएं न के बराबर रह जाती हैं।

भारत वस्तुतः एक ऐसा समाज रहा है, जहां मनुष्य और दैवीय शक्तियों को बराबरी पर रखा जाता है, इसलिए यहां समाज को संचालित करने वाले नियम- कायदों को मानवीय मानने का रिवाज ही ज्यादा है। ऐसी ही हमारे यहां समझ है। मैं समझता हूं कि यह अनोखी बात है। होली के त्योहार का यही सबसे बड़ा महत्व है।

इस दिन लगभग सारे सामाजिक नियम-कायदे ताक पर रख दिए जाते हैं (मोटे तौर पर)। बल्कि यह कहना चाहिए कि इस दिन तमाम सामाजिक रिवायतें ताक पर रख दी जाती हैं और लोग पूरे दिन बिना किसी ऊपरी रिवायत के दबाव के रहते हैं। इससे वे यह रेखांकित कर पाते हैं कि सारी रिवायतें असल में मनुष्यकृत हैं और मनुष्य का जीवन इन रिवायतों-नियमों से कहीं ज्यादा बड़ा है।

होली का दिन दरअसल बिना रिवायतों के, बिना दबाव के जीवन के अस्तित्व को रेखांकित भी करता है और उसका उत्सव भी मनाता है। इसी दिन हम यह भीतर तक समझ पाते हैं कि शिष्टाचार आदि रिवायतें हमने ऊपर अपनी इच्छा-अनिच्छा से आरोपित की हुई हैं और हमारा जीवन इन सबसे बड़ा है। इस अर्थ में होली का त्योहार रंगों का त्योहार तो है ही, हमारे जीवन के व्यापक होने का भी उत्सव है।
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