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अफगानिस्तान में टूटती उम्मीदें
Wed, 18 Mar 2020 07:00 PM IST
Raman Singh
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 18 Mar 2020 07:00 PM IST
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कुलदीप तलवार
- फोटो : a
अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते के बाद उम्मीद पैदा हुई थी कि हालात सुधर जाएंगे, लेकिन जो चीजें सामने आई हैं, उनसे पता चलता है कि अभी न तो देश में हिंसा रुकेगी और न अमन कायम हो सकेगा। तालिबान द्वारा अफगान सरकार से कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर बातचीत करने से इन्कार और उनकी बढ़ती हिंसा ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
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अफगान सरकार तालिबान के 5,000 कैदियों को रिहा करने के लिए तैयार है, पर एक साथ नहीं, क्योंकि उनके हथियार उठाने से हिंसा की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि रिहाई के बदले में तालिबान को भी हमले बंद करने होंगे और 1,000 अफगान कैदियों को रिहा करना होगा। पर तालिबान ने राष्ट्रपति अशरफ गनी की यह पेशकश ठुकरा दी है। तालिबान का यह भी मानना है कि अफगान सरकार केवल उन कैदियों को छोड़ने की योजना बना रही है, जो बूढ़े या बीमार हैं या जिनकी सजा खत्म हो चुकी है। ऐसे ही, समझौते के मुताबिक, तालिबान को अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में अल कायदा और दूसरे आतंकी संगठनों को आतंकी हिंसा से रोकना है, पर इस शर्त का पालन करना काफी कठिन है, क्योंकि वहां अल कायदा और आईएस पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गए हैं।
अफगानिस्तान की घरेलू राजनीति की भी अपनी उलझनें हैं। वहां शांति वार्ता की प्रक्रिया और राष्ट्रपति चुनाव, दोनों एक दूसरे के प्रतिकूल दिखते हैं। निर्वाचित राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने दो अलग-अलग समझौते में राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली है। अब्दुल्ला अब्दुल्ला देश में समानांतर सरकार बनाना चाहते हैं। इससे भी शांति समझौते पर संकट पैदा हो गया है। तालिबान कह चुके हैं कि विदेशी फौज के निकलने के बाद वे देश में इस्लामी हुकूमत कायम करेंगे। पाकिस्तान भी यही चाहता है। पाकिस्तान वहां फिर तालिबान की सरकार चाहता है, जो उसके इशारों पर नाचे। अफगानिस्तान के बारे में पाकिस्तान की सोच में जब तक तब्दीली नहीं आती, तब तक वहां हिंसा जारी रहेगी। पाकिस्तान के अखबार दुनिया ने अपनी ही सरकार को राय देते हुए कहा है, 'काबुल में किस किस्म की सरकार हो, यह अफगानिस्तान का मसला है। हकूमत कैसी हो, यह उसका अंदरूनी मामला है। भारत का अफगानिस्तान में कितना असर है, इससे ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। अगर दूसरे भी दखल दे रहे हैं, तो इससे सिर पर बोझ नहीं लेना चाहिए।'
भारत ने हालांकि अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते पर खुशी जाहिर की है, पर सरकार की चिंता है कि पाकिस्तान अपने आतंकी शिविरों को अफगानिस्तान भेजकर दुनिया को दिखा सकता है कि वह आतंकियों का पोषण नहीं कर रहा। इसके अलावा तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा जमाने के बाद जम्मू-कश्मीर का रुख सकते हैं। चूंकि समझौते में अफगान महिलाओं की आजादी का कोई जिक्र नहीं है, ऐसे में, उनके अधिकारों पर पाबंदी लगा दिए जाने का डर भी सता रहा है।
अफगानिस्तान में मौजूदा हालात इस बात की इजाजत नहीं देते कि अफगानियों को तालिबान या दूसरे आतंकी संगठनों के रहम-ओ-करम पर छोड़ दिया जाए। ऐसे में, उम्मीद करनी चाहिए कि अमेरिका अपनी फौज को देश से निकालने में जल्दी नहीं करेगा। वर्ना यह समझा जाएगा कि अमेरिका अपने हितों की पूर्ति के लिए अफगानिस्तान से निकलना चाहता है। काबुल में अमेरिका का भी बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। देखना यह है कि अगले कुछ दिनों में वहां के हालात क्या करवट लेते हैं।