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टाइम मशीन: समुद्र के भीतर वे सौ दिन… पनडुब्बी से अलग अनुभव; सेहत पर भी असर
Sun, 14 Jul 2024 05:45 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
ब्रेडले इलियट, प्रोफेसर, वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटीUS Army, Sea, Dr. Deep Sea, Dituri, Bradley Elliot
ब्रेडले इलियट, प्रोफेसर, वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटीUS Army, Sea, Dr. Deep Sea, Dituri, Bradley Elliot
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Sun, 14 Jul 2024 05:45 AM IST
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समुद्र के भीतर की दुनिया और कांच के बक्से में डॉ डीप सी
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अमर उजाला
विस्तार
जब हम समुद्र में दस से तीस मीटर की गहराई पर होते हैं, तब हल्का उत्साह और एक सकारात्मकता महसूस होती है। लेकिन तीस मीटर या उससे नीचे जाने पर हल्का नशा भी महसूस हो सकता है, जिसे ‘नार्कोसिस’ नाम दिया गया है। ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब तो फिलहाल वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है।
बुरे सपने कभी न कभी सबको आते हैं। लेकिन आपको मालूम है कि दुनिया भर में लोगों द्वारा देखे गए बुरे सपनों की सूची में सबसे ज्यादा बार देखा गया सपना कौन-सा है? वह सपना है खुद को कांच के ऐसे बॉक्स में बंद देखना, जिसके बाहर पानी ही पानी हो। जो दितूरी जैसा कोई विरला ही होगा, जिसने इस बुरे सपने को हकीकत में बदल कर पाया कि यह उतना बुरा भी नहीं था। दितूरी अमेरिकी नौसेना के सेवानिवृत्त गोताखोर हैं और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। उन्हें डॉ. डीप सी भी कहा जाता है। वह पहले भी कुछ दिनों के लिए कांच के एक खास केबिन में समुद्र के नीचे रहे हैं। लेकिन इस बार 55 वर्ग मीटर के कांच के घर में फ्लोरिडा के पास के समुद्र में सौ दिन रहकर उन्होंने वाकई रिकॉर्ड कायम किया है। दितूरी बताते हैं कि समुद्र के भीतर वे सौ दिन वाकई जादुई थे।
पनडुब्बी से अलग अनुभव
जब पनडुब्बी पानी के भीतर होती है, तो वह पूरी तरह से बंद होती है और उसमें समुद्र की सतह वाले दबाव को ही बनाए रखा जाता है। समुद्र की गहराइयों में भी हवा के दबाव में खास फर्क मालूम नहीं पड़ता। लेकिन दितूरी सौ दिन तक समुद्र के भीतर जिस कांच के घर में रहे, उसमें पानी और रहने की जगह के बीच कोई एयरलॉक नहीं था, जैसा पनडुब्बी में होता है। दितूरी का कांच का घर ऐसे ही था, मानो पानी से भरे बड़े बर्तन में गिलास उलटा करके रख दिया गया हो। ऐसा करने पर चारों ओर पानी होने के बावजूद गिलास में हवा बनी रहती है। ऐसे ही दितूरी के कांच के घर में हवा बनी रही, हालांकि इस घर में समु्द्र के रास्ते नीचे से प्रवेश करने की व्यवस्था थी। इसे यों समझें कि कांच के घर के अंदर की हवा का दाब समुद्र के दबाव से कम था, फिर भी, गहराई मेें कांच के घर के अंदर हवा का दबाव जमीन पर रहने वाले दबाव से करीब दोगुना ज्यादा तो था ही।
समुद्र के अंदर की दुनिया
पेशेवर गोताखोर जानते हैं कि समुद्र के अंदर की दुनिया आसान नहीं होती। गहराइयों में समुद्र के पानी का हाइपरबेरिक दबाव मनुष्य के लिए खतरा भी बन सकता है। विकास की कई अवस्थाओं को पार कर इन्सान का शरीर जमीन पर रहने का अभ्यस्त हुआ है। जमीन पर सांस लेने के लिए हम दो गैसों यानी ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड का इस्तेमाल करते हैं, जो हमारे फेफड़ों व रक्त के बीच आसानी से आर-पार होती रहती हैं। लेकिन समुद्र के नीचे जब दबाव बढ़ता है, तब हवा में मौजूद नाइट्रोजन हमारे फेफड़ों की नाजुक दीवारों को पार कर रक्त में घुलने लगती है। इसका गंभीर असर हो सकता है। जब हम समुद्र में दस से तीस मीटर की गहराई पर होते हैं, तब हल्का उत्साह और सकारात्मकता महसूस होती है। पर तीस मीटर या उससे नीचे जाने पर हल्का नशा भी महसूस हो सकता है, जिसे ‘नार्कोसिस’ नाम दिया गया है। ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब तो फिलहाल वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है। पर मेरे विचार से यह हमारे मस्तिष्क में न्यूरॉन्स और न्यूरोट्रांसमीटर के संकेत देने के तरीके में बदलाव के कारण हो सकता है। हालांकि दितूरी को इससे कोई खतरा नहीं था, क्योंकि वह केवल दस मीटर की गहराई पर थे।
जादुई अनुभव
गहरे समुद्र में कांच के घर में अकेले दितूरी। चारों ओर नीले पानी का साम्राज्य। न कोई मोबाइल फोन, न टेलीविजन। चूंकि पानी पूरे कांच के घर को काट रहा था, इसलिए उन्हें ऐसा महसूस होता था कि हर चीज उनकी ओर ही बढ़ रही है। समुद्र के भीतर का अजीबोगरीब जीवन। वनस्पतियां, छोटी और बड़ी मछलियां। सब उनके चारों ओर टकरा रही थीं। कई मछलियों को तो उन्होंने अपनी तरफ से नाम भी दिए हुए थे।
दिक्कतें भी हुईं
दितूरी के कांच के घर में उन्हें सब कुछ दिख रहा था। फिर भी जमीन की तुलना में उन्हें सूरज की आधी रोशनी ही मिल रही थी। जाहिर है कि इससे उनकी आंतरिक घड़ी प्रभावित हो रही थी। विटामिन ‘डी’ भी कम मिल पा रहा था। ऐसे में अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को दुरुस्त बनाए रखने के लिए वह अन्य स्रोतों का सहारा ले रहे थे और उन्हें स्वास्थ्य का भी खास ध्यान रखना पड़ रहा था, क्योंकि शरीर में कई ऐसे विषाणु होते हैं, जो प्रतिरक्षा प्रणाली के कमजोर होने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। हड्डियों को नुकसान से बचाने के लिए दितूरी हफ्ते में पांच दिन एक घंटे व्यायाम जरूर करते थे। उन्होंने सिर्फ एक्सरसाइज बैंड का इस्तेमाल किया। इससे वह कांच के चैंबर में विकसित हुई अपनी मांसपेशियों को संतुलित रखने में सक्षम थे। दितूरी खुद मानते हैं कि यह सब कहना जितना आसान लग रहा है, उतना था नहीं। गहरे समुद्र में उनकी सतर्कता का आलम यह था कि वह सांस भी सोच-समझ कर लेते थे। वह अपने चारों ओर के हर बदलाव को नोट कर रहे थे। आखिर यह उनकी जिंदगी थी, और वहां गहराइयों में उसका ख्याल उन्हें खुद ही रखना था।
उम्र हुई दस साल कम
समुद्र से बाहर आने के बाद दितूरी की नींद पहले से छियासठ फीसदी बेहतर हुई है। कोलेस्ट्रॉल का स्तर 72 पॉइंट घट गया है। अनावश्यक वसा हटने से वह छरहरे हो गए हैं। प्रारंभिक निष्कर्षों में उनकी नींद और कोलेस्ट्रॉल के स्तर में भारी सुधार हुआ। डीएनए परीक्षणों सहित व्यापक चिकित्सा जांचों से पता चला कि दितूरी बाहर आने के बाद जैविक रूप से युवा हो गए हैं। दितूरी के टेलोमेरेस-गुणसूत्रों के सिरों पर डीएनए कैप, जो आमतौर पर उम्र के साथ सिकुड़ते हैं और समय के साथ छोटे होते जाते हैं-तीन महीने यानी करीब 100 दिन पहले की तुलना में 20 प्रतिशत लंबे हो गए थे। यानी विज्ञान की भाषा में कहें, तो दितूरी की वास्तविक उम्र दस साल कम हो गई है।
हाइपरबेरिक चिकित्सा
समुद्र की गहराइयों में हवा का दबाव ज्यादा होता है। ऐसे में, दितूरी अपने इस प्रयोग से यह जानना चाहते थे कि ऐसे दबाव का उनके स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है। इसे डाइविंग चिकित्सा या अंडर सी चिकित्सा भी कहते हैं, जिसमें व्यक्ति को ऑक्सीजन से भरे उच्च वायुदाब वाले चैंबर में रखा जाता है।