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पैट्रिक मोदियानो की किताबें
ओम गुप्ता
Updated Sat, 11 Oct 2014 07:57 PM IST
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कि फ्रेंच उपन्यासकार पैट्रिक मोदियानो को अपने देश से बाहर कोई नहीं
जानता। जबकि उनके उपन्यास अन्य भाषाओं में भी अनूदित हुए हैं। नोबेल
पुरस्कार देने वाली संस्था के सचिव पीटर इंग्लुड ने इस सम्मान की घोषणा
करते हुए उन्हें आज के युग का मार्सेल प्राउस्ट बताया।
प्राउस्ट विश्व के महानतम कथाकार हैं। उनके सात खंडों वाले विशाल ग्रंथ ‘रिमेबरिंग्स थिंग्स पास्ट’ (भूली बिसरी बातों को याद करते हुए) की वजह से उन्हें प्रेम और निषिद्ध संबंधों का सबसे बड़ा रचयिता कहा जाता है।
पैट्रिक मोदियानो ने 40 से अधिक किताबें लिखी हैं। इससे पूर्व उनकी रचना 'ला प्रेस द एतयोल' ने उन्हें बेहद शोहरत दिलाई थी। यह हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहार के बाद का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।
पैट्रिक को स्मृतियों को कुरेदने का उस्ताद माना जाता है। इस लेखक को यादों, पहचान और अपराधबोध का प्रस्तोता माना जाता है। खासकर तब जबकि जर्मनी ने पूरी दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध की आग में झोंक दिया था।
मोदियानो की अन्य रचनाओं में ‘रिंग ऑफ रोड्स’ (सड़कों की घेराबंदी), विला जिस्टे, ए ट्रेस ऑफ मेलिस और हनीमून शामिल हैं। इस रचनाकार का एक अन्य उपन्यास है ‘मिसिंग पर्सन’ (गुमशुदा आदमी)। यह एक भुलक्कड़ आदमी की कहानी है। इस पुस्तक को 1978 में ‘प्रिक्स गोनकोर्ट’ पुरस्कार दिया गया था।
कम लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें नोबेल मिलेगा। इस लेखक ने बच्चों के लिए भी अनेक किताबें लिखी हैं। उन्होंने लुई माल के साथ मिलकर एक विवादास्पद पटकथा भी लिखी थी।
पैट्रिक का अपने बारे में कहना है कि ‘मैं एक सपना बार-बार देखता था और सपने का मूल स्वर था कि अब मेरे पास लिखने के लिए कुछ नहीं बचा है। और अब मैं मुक्त हो गया हूं। लेकिन, मुझे अहसास है कि मैं मुक्त नहीं था। विडंबना है कि आज भी मैं उसी मनःस्थिति से गुजर रहा हूं। और मुझे विश्वास है कि कभी मुक्त नहीं हो पाऊंगा।’
फ्रांस में ऐसा कोई पुरस्कार नहीं है, जो पैटि्रक मोदियानो ने न जीता हो। मोदियानो अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां की सहेली रेमो क्यूना को देते हैं। उन्होंने ही लेखक को गिलीमार्द प्रकाशन से परिचित कराया था। तब जब वह केवल 20 वर्ष के थे। मोदियानो अखबार वालों से कतराते हैं। पेरिस में रहते हैं। और इंटरव्यू नहीं देते।
पैट्रिक की बचपन की यादें उन्हें बार-बार सताती हैं। उनके अपने प्यारे देश पर जर्मन कब्जे के दौरान जो यातनाएं भोगनी पड़ी थीं, वह उनके लेखन मैं साफ झलकती हैं। वे ईसाई यहूदी माता-पिता के कारण अपनी पहचान को लेकर सदा भ्रमित रहे हैं। यह उस युग की त्रासदी थी। इसे लाखों यहूदियों ने भोगा। उसके कारण जो कत्ले-आम हुआ, वह आज तक सिहरन पैदा करता है।
उनकी कृति ‘मिसिंग पर्सन’ को डेनियल किस्बोर्ट ने अंग्रेजी में अनूदित भी किया था। इसका नायक उनका अपना किरदार है। इस उपन्यास में ‘गार्ड रोलेंड’ नामक पात्र घर-बार छोड़कर अपनी पहचान तलाशने के लिए निकल पड़ता है। पर वह उसे हासिल नहीं हो पाती। पैट्रिक को अपने जीवन में घटी हास्यास्पद स्थितियां आज भी याद हैं। मसलन उनकी शादी के दिन मूसलाधार बारिश होती रही। उनके विवाह की तसवीर खींचने वाले का कैमरा खो गया। उस अवसर की केवल एक तसवीर उनके पास है।
उनके उपन्यासों में युद्ध की विभीषिका कण-कण में व्याप्त है। उनके पिता को उनका लेखन कतई पसंद नहीं था। वे उनके यहूदी चित्रण को हिकारत की निगाह से देखते थे। एक बार तो उनका उपन्यास पढ़कर उन्होंने पुलिस बुलवा ली। फिर भी उन्होंने पेरिस के जीवन उसकी गलियों और कॉफी होम्स को बड़ी खूबसूरती से चित्रित किया है। नोबेल पुरस्कार ने उन्हें सम्मानित कर अपना मान बढ़ाया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)
प्राउस्ट विश्व के महानतम कथाकार हैं। उनके सात खंडों वाले विशाल ग्रंथ ‘रिमेबरिंग्स थिंग्स पास्ट’ (भूली बिसरी बातों को याद करते हुए) की वजह से उन्हें प्रेम और निषिद्ध संबंधों का सबसे बड़ा रचयिता कहा जाता है।
पैट्रिक मोदियानो ने 40 से अधिक किताबें लिखी हैं। इससे पूर्व उनकी रचना 'ला प्रेस द एतयोल' ने उन्हें बेहद शोहरत दिलाई थी। यह हिटलर द्वारा यहूदियों के नरसंहार के बाद का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।
पैट्रिक को स्मृतियों को कुरेदने का उस्ताद माना जाता है। इस लेखक को यादों, पहचान और अपराधबोध का प्रस्तोता माना जाता है। खासकर तब जबकि जर्मनी ने पूरी दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध की आग में झोंक दिया था।
मोदियानो की अन्य रचनाओं में ‘रिंग ऑफ रोड्स’ (सड़कों की घेराबंदी), विला जिस्टे, ए ट्रेस ऑफ मेलिस और हनीमून शामिल हैं। इस रचनाकार का एक अन्य उपन्यास है ‘मिसिंग पर्सन’ (गुमशुदा आदमी)। यह एक भुलक्कड़ आदमी की कहानी है। इस पुस्तक को 1978 में ‘प्रिक्स गोनकोर्ट’ पुरस्कार दिया गया था।
कम लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें नोबेल मिलेगा। इस लेखक ने बच्चों के लिए भी अनेक किताबें लिखी हैं। उन्होंने लुई माल के साथ मिलकर एक विवादास्पद पटकथा भी लिखी थी।
पैट्रिक का अपने बारे में कहना है कि ‘मैं एक सपना बार-बार देखता था और सपने का मूल स्वर था कि अब मेरे पास लिखने के लिए कुछ नहीं बचा है। और अब मैं मुक्त हो गया हूं। लेकिन, मुझे अहसास है कि मैं मुक्त नहीं था। विडंबना है कि आज भी मैं उसी मनःस्थिति से गुजर रहा हूं। और मुझे विश्वास है कि कभी मुक्त नहीं हो पाऊंगा।’
फ्रांस में ऐसा कोई पुरस्कार नहीं है, जो पैटि्रक मोदियानो ने न जीता हो। मोदियानो अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां की सहेली रेमो क्यूना को देते हैं। उन्होंने ही लेखक को गिलीमार्द प्रकाशन से परिचित कराया था। तब जब वह केवल 20 वर्ष के थे। मोदियानो अखबार वालों से कतराते हैं। पेरिस में रहते हैं। और इंटरव्यू नहीं देते।
पैट्रिक की बचपन की यादें उन्हें बार-बार सताती हैं। उनके अपने प्यारे देश पर जर्मन कब्जे के दौरान जो यातनाएं भोगनी पड़ी थीं, वह उनके लेखन मैं साफ झलकती हैं। वे ईसाई यहूदी माता-पिता के कारण अपनी पहचान को लेकर सदा भ्रमित रहे हैं। यह उस युग की त्रासदी थी। इसे लाखों यहूदियों ने भोगा। उसके कारण जो कत्ले-आम हुआ, वह आज तक सिहरन पैदा करता है।
उनकी कृति ‘मिसिंग पर्सन’ को डेनियल किस्बोर्ट ने अंग्रेजी में अनूदित भी किया था। इसका नायक उनका अपना किरदार है। इस उपन्यास में ‘गार्ड रोलेंड’ नामक पात्र घर-बार छोड़कर अपनी पहचान तलाशने के लिए निकल पड़ता है। पर वह उसे हासिल नहीं हो पाती। पैट्रिक को अपने जीवन में घटी हास्यास्पद स्थितियां आज भी याद हैं। मसलन उनकी शादी के दिन मूसलाधार बारिश होती रही। उनके विवाह की तसवीर खींचने वाले का कैमरा खो गया। उस अवसर की केवल एक तसवीर उनके पास है।
उनके उपन्यासों में युद्ध की विभीषिका कण-कण में व्याप्त है। उनके पिता को उनका लेखन कतई पसंद नहीं था। वे उनके यहूदी चित्रण को हिकारत की निगाह से देखते थे। एक बार तो उनका उपन्यास पढ़कर उन्होंने पुलिस बुलवा ली। फिर भी उन्होंने पेरिस के जीवन उसकी गलियों और कॉफी होम्स को बड़ी खूबसूरती से चित्रित किया है। नोबेल पुरस्कार ने उन्हें सम्मानित कर अपना मान बढ़ाया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)