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उंगलियां उम्र की कट गईं
प्रदीप मिश्र
Updated Tue, 27 Nov 2012 11:56 AM IST
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हिंदी गीत की विकास यात्रा में नवगीत की परंपरा ने गीत को एक नया स्वरूप दिया है, जो ज्यादा जनोन्मुख है। नवगीत की इस परंपरा को और सम़ृद्ध करने वाले प्रमोद उपाध्याय का गीत संग्रह `खिड़कियां झांक रहीं कमरे के पार’ हमारे सामने है।
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शीर्षक गीत कवि की संवेदनात्मक वरीयता में आम आदमी का चित्र खींचता है, `खिड़कियां झांक रहीं कमरे के पार/छत के मुंह उखड़े से, आंगन बीमार/उंगलियां उम्र की कट गई हिसाबों में/परिचय की केंचुली बंद है किताबों में।’
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इन गीतों को पढ़ते हुए हमारे समय का दृश्य कुछ और साफ दिखाई देने लगता है। एक कवि जब अपनी संवेदना को शब्दरूप दे रहा होता है, तो उसकी राजनीतिक चेतना कविता में दृष्टि की तरह से समाहित होती है। जिसकी व्यंजना अर्थ ध्वनियों के रूप में पाठक के मन में अंकित होती है। यह अंकन ही कवि की सार्थकता है।
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ऐसी सार्थकता इस संग्रह में संग्रहित अधिकतर गीतों की परिणति में मिलती है, जैसे `उन्माद का अनुवाद करती ये हवाएं/लिख रहीं भूगोल की काली कथाएं।’ कवि कार्बन होते दिन, सुनामी और लातूर का प्रयोग करके जहां समसामयिक प्रंसगों को कविता में शामिल करता है, वहीं पर स्पाइल, फाइल, वाइन बार और सेनेटरी पेड जैसे शब्दों का प्रयोग करके वर्तमान भाषा संस्कार को भी रेखांकित करता है।`
कुछ खदबद सा बेसन रोटी ज्वार की/बिन बघारी भाषा प्यार की’ जैसी पंक्तियों से कवि यह एहसास दिला देता है कि काव्य कौशल में भी उसे महारत हासिल है। फ्लैप पर कथाकार प्रकाशकांत ने ठीक ही लिखा है, `प्रमोद बुनियादी तौर पर कस्बाई मन के रचनाकार रहे हैं।
साथ ही उनका रचनाकार किसी हद तक ग्रामीण संवेदना का रचनाकार भी है। उसके यहां आदिम ग्रमीण संवेदना, कस्बाई मन की सहजता और नागर जीवन की संश्लिष्टता एक साथ देखने को मिलती हैं।’ इन विचारों के पक्ष में बहुत सारे उदाहरण संग्रह में मौजूद हैं, यहां पर निम्न पंक्तियों को देखा जा सकता है, `शहरी से देहाती मानुस, अब भी अच्छा है/अनुभव से है प्रौढ़ मगर मन से बच्चा है।’
प्रमोद जी इस दुनिया में अब नहीं हैं। उनकी पत्नी रेखा ने इस संग्रह को प्रकाशित करवाया है। पुस्तक में अपनी बात शीर्षक से उन्होंने जो लिखा है वह भी एक कविता ही है। वस्तुतः प्रगतिशील-जनवादी मूल्यों का सर्जक कवि पूरी तरह से इन गीतों में व्याप्त है। जिसके सपने में हमारा-समाज, हमारा-समय अपने वैज्ञानिक स्वरूप में विकसित होने को आतुर है। अपने इस स्वप्न को पाठकों में संचित करने में कवि सफल है।