दक्षिण में भाजपा का विजयद्वार

तरुण विजय Updated Wed, 16 May 2018 06:15 PM IST
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कर्नाटक में भाजपा की विजय ने पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु पार्टी में जीत का आत्मविश्वास ही नहीं दिया है, बल्कि सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने से 2019 में बहुमत के लिए जरूरी ऊर्जा भी मन और काया में भर दी है। प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने राजनीति को नई भाषा, नया कलेवर ही नहीं दिया, बल्कि शब्दकोश ही बदल दिया। अनथक, अविरत, बूथ स्तर से पंचायत, तालुका, नगर, अंचल तक के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को झकझोर कर काम में लगाने की क्षमता आज भारत के किसी राजनीतिक दल में नहीं है, सिवाय भाजपा के। 
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जिस समय कर्नाटक के चुनाव परिणाम आ रहे थे, काठमांडू से एक मित्र ने फोन कर बधाई दी और कहा कि मोदी जी को माता सीता और पशुपतिनाथ का आशीर्वाद मिल गया। बात जंच गई। मोदी और शाह ने हिंदू मन का हर जगह सम्मान किया, जबकि कर्नाटक सरकार और मोदी विरोधियों ने राज्य में हिंदू विभाजन का सरकारी स्तर पर प्रयास किया। लिंगायत वीर शैव भगवान बसवेश्वर राजनीति की शतरंज पर अहिंदू-हिंदू में बांटे गए।
 
कांग्रेस तथा अन्य भाजपा विरोधी दल अपनी धर्मनिरपेक्षता को चमकाने के लिए हिंदू-विरोधी रंग में रंगने से भी परहेज नहीं कर रहे थे, वही मोदी और अमित शाह विनम्रता से प्रतिष्ठित संतों, मठों में दर्शन के लिए जाते दिखे। बाद में राहुल और सिद्धारमैया भी मंदिर दर्शन कर रहे थे, पर उनकी नीयत और प्रत्यक्ष कार्य में भेद के कारण जनता प्रभावित नहीं हुई। बीच रास्ते में दिशा बदलने वाले गंतव्य खो देते हैं। कांग्रेस समझ नहीं पाई कि उसे कांग्रेस बने रहना है या भाजपा-दो बनना है। एक ओर राहुल संतों-मंदिरों के दर्शन कर रहे थे। दूसरी ओर उनके मुख्यमंत्री सिद्धारमैया संतों-वीर शैव लिंगायत हिंदू-अहिंदू में बांटने का खेल खेल रह थे। दोनों कैसे निभते? 

कानून, व्यवस्था, सड़कें, भ्रष्टाचार और अहंकार ने कांग्रेस में विश्वास को तोड़ा है। कन्नड़ समाज प्रगतिशील और नवीन ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। बंगलूरू सरकार की सहायता के बिना सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की वैश्विक राजधानी बना, लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार के कारण बंगलूरू में रहना निरंतर दूभर होता गया। 

कर्नाटक ने केवल दक्षिण नहीं, 2019 की तैयारी को भी बल दे दिया है। 2019 के चुनाव जब भी घोषित हों, तैयारी और रणनीति निर्माण का काम चालू हो गया है। कर्नाटक ने भाजपा के विजय रथ के तीन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता भी स्पष्ट कर दिए हैं, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ। 2019 का चुनावी युद्ध कठिन, कठोर और कर्नाटक से भी ज्यादा कर्कश स्वरों से भरा होगा। जब तक सामान्य जनता के विकास की अभीप्सा पूरी करने के साथ-साथ हिंदू मन की बात को जोड़े हुए सर्व पंथ समभाव का व्यवहार जमीनी स्तर तक नहीं उतरेगा, तब तक जन गण मन के उतार चढ़ाव की थाह पाना कठिन होगा। 

कर्नाटक में जीती तो भाजपा है। पिछले दरवाजे से हारे हुओं का जमघट सरकार बनाने का प्रयास करे, तो यह कांग्रेस की दुरावस्था का ही प्रतीक है। भाजपा भी समझ ले, आने वाला समय केवल पार्टी के लिए नहीं, उन तमाम कार्यकर्ताओं और देहदानी प्रचारकों की कीर्ति को संजोये रखने की परीक्षा का है, जिनके पार्टी इस मुकाम तक पहुंची है।

-लेखक भाजपा के पूर्व सांसद हैं।

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