दिल्ली में मोदी का सहारा
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दिल्ली में चुनाव के लिए राजी होने के भारतीय जनता पार्टी के फैसले के बाद उस अबूझ राजनीतिक पहेली का अंत हो गया, जो यह पार्टी पिछले कई महीने से खेल रही थी। दरअसल, इस मुद्दे पर भाजपा के स्थानीय और केंद्रीय नेताओं ने जिस घबराहट और असमंजस का परिचय दिया है, वह उस पर बिल्कुल नहीं जंचता, खासकर तब, जबकि यह वही पार्टी है, जिसने इस वर्ष अपने आक्रामक तेवरों के साथ भारतीय राजनीति में एक प्रभावी ताकत के तौर पर उभरने का शायद ही कोई मौका अपने हाथ से जाने दिया हो। इतना ही नहीं, मामले में देरी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद चुनावों के पक्ष में निर्णय लेने पर मजबूर होने के बावजूद राजग सरकार चुनाव को टालने की हर मुमकिन कोशिश करती रही है। फिर सत्ताधारी दल की यह दलील गले से नहीं उतरती कि चुनाव में हो रहे विलंब से उसका कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि सरकार बनाने के सभी विकल्पों को खंगालने के लिए उपराज्यपाल नजीब जंग के संदेश का इंतजार करना उसकी मजबूरी थी। सभी को मालूम है कि उपराज्यपाल महोदय केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों पर चल रहे हैं। ऐसे में यह उम्मीद पालना बेमानी होगा कि वह केंद्र की मर्जी के खिलाफ अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे। गौरतलब है कि नजीब जंग पिछली यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त उन चुनींदा राज्यपालों में से हैं, जिन्हें वर्तमान सरकार ने न तो हटाया है और न ही उनका तबादला किया है।
भाजपा के कुछ प्रवक्ता दिल्ली में अल्पमत सरकार की वैधता साबित करने पर जिस तरह से तुले हुए थे, और वे इसकी तुलना महाराष्ट्र में अपनी सरकार से कर रहे थे, वह एकदम बेतुका है। सच तो यह है कि पिछले वर्ष दिल्ली में हुए चुनाव के बाद खुद भाजपा ने ऐसे किसी विकल्प को खारिज कर दिया था, जिसके बाद उपजे हालात में कांग्रेस के समर्थन से आम आदमी पार्टी को अल्पमत सरकार बनाने का मौका मिला था। दो महीने के भीतर ही आप सरकार के इस्तीफे के बाद सिर्फ एक ही चारा बचा था, कि लोकसभा चुनाव के साथ ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव संपन्न कराए जाते। मगर तब केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बेहद निरंकुश ढंग से इस मांग को खारिज कर दिया था, क्योंकि उसे राजधानी में अपने सफाए का डर था।
लोकसभा चुनावों में तूफानी ढंग से भाजपा के सत्ता में आने के बाद उम्मीद की जा रही थी, कि दिल्ली में चुनाव कराने की घोषणा की जाएगी, क्योंकि स्थगित चल रही दिल्ली की त्रिशंकु विधानसभा में पार्टी की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया था, साथ ही दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर भाजपा ने काफी अंतर से कब्जा किया था। ऐसे में, राजनीति और नैतिकता, दोनों नजरिये से यह उचित था कि वह दिल्ली में जल्द चुनाव करवाने में सहयोग देती। मगर पिछले छह महीने से उसका रवैया बेहद रहस्यात्मक ढंग से विलंब करने का रहा है। वह पिछले दरवाजे से सरकार बनाने की कोशिश भी करती रही और चुनाव कराने की संभावनाओं को भी हवा देती रही। अब जबकि भाजपा ने चुनावी मैदान में उतरने का फैसला कर लिया है, सवाल उठता है कि आखिर किस आधार पर वह अब तक यह कदम उठाने से हिचक रही थी। इसके अलावा इसकी क्या वजह हो सकती है कि दिल्ली में चुनाव कराने का उस पर दबाव पड़ने के बाद एकाएक शहर के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगा।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में हालिया उपचुनावों से ठीक पहले लव जेहाद जैसे भड़काऊ अभियानों के जरिये सांप्रदायिक माहौल बनाने की ऐसी ही कोशिशें की गई थीं। वहां भी लोकसभा चुनाव में तो भाजपा ने बाजी मारी हुई थी, मगर स्थानीय स्तर पर नरेंद्र मोदी जैसा करिश्माई नेता न होने और संगठनात्मक कमजोरी के चलते उसे अपनी संभावनाएं नगण्य दिख रही थीं। हालांकि तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा को उत्तर प्रदेश में मुंह की खानी पड़ी थी।
दरअसल, लोकसभा और कई राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को ध्वस्त करने के बाद भाजपा को उससे बेशक डर न रह गया हो, पर यही बात क्षेत्रीय दलों को लेकर नहीं कही जा सकती, जिनके पास सशक्त नेताओं और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। यह सच है कि अरविंद केजरीवाल मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से और मीडिया का समर्थन खो चुके हैं। इसकी वजह है, बतौर मुख्यमंत्री, उनका छोटा और विवादास्पद कार्यकाल और लोकसभा चुनाव में हड़बड़ी में उतरने का उनका फैसला। इसके बावजूद भाजपा को लगता है कि जिस तरह से दिल्ली में सत्ता में आने के बाद आप की सरकार ने बिजली और पानी के मूल्यों में कमी की थी, उससे गरीब मतदाताओं के बीच आप की लोकप्रियता आज भी कायम है।
गुपचुप तौर पर भाजपा के नेता भी स्वीकारते हैं कि दिल्ली में मतदाताओं के एक बड़े तबके का समर्थन उन्हें हासिल नहीं है। दरअसल, भाजपा दिल्ली की गरीब बस्तियों में लोकप्रिय नहीं है और मोदी सरकार के कड़े नियम-कायदों की वजह से सरकारी कर्मचारियों का बड़ा वर्ग उससे खुश नहीं है। इसके अलावा मुस्लिमों के बीच तो इसका कोई आधार बिल्कुल नहीं है। दिलचस्प बात है कि दिल्ली के सिख समुदाय के बीच भी आप की पैठ की खबरें आ रही हैं, जिसका समर्थन यहां के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णायक साबित हो सकता है। भाजपा को यह भी डर है कि अगर दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह ढह जाती है, तो गरीबों और अल्पसंख्यकों का उसका परंपरागत वोट आप के खाते में गिरेगा। ऐसे में, भाजपा को केवल अपने ट्रंप कार्ड का ही सहारा है, और वह हैं, नरेंद्र मोदी, और क्रांतिकारी बदलाव का उनका वायदा।
वरिष्ठ पत्रकार और बहनजी- ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक