{"_id":"a9eb50f0f6744d8c5eeddb8471663faa","slug":"bitter-truth-of-modern-slavery","type":"story","status":"publish","title_hn":"आधुनिक दासता का कड़वा सच","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
आधुनिक दासता का कड़वा सच
सरोज कुमारी
Updated Sun, 03 Aug 2014 11:24 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आधुनिक दासता शब्द दिन-ब-दिन चिर-परिचित होता जा रहा है। हाल में वॉक फ्री फाउंडेशन द्वारा जारी की गई ग्लोबल इंडेक्स 2013 रिपोर्ट में भारत 162 देशों की सूची में उन 10 देशों में है, जहां पर जनसंख्या का एक बड़ा भाग आधुनिक दासता का हिस्सा है। यद्यपि 'मॉडर्न स्लेवरी' एक वैश्विक विषय है, क्योंकि वितरण की चेन भी वैश्विक हो गई है। दासता चाहे आधुनिक हो या ऐतिहासिक उसका मूल स्वरूप कभी नहीं बदलता, क्योंकि यह मूलत: व्यक्ति की अस्मिता व मनुष्य होने के अस्तित्व को नकारती है।
भारत के इतिहास में वह संदर्भ मिल जाएंगे, जिससे दासता पल्लिवित व पुष्पित होती रही है- जैसे लैंगिक असमानता, जातिगत विषमताएं, धर्म का सामाजिक स्वरूप, विषमता की नैरन्तर्य को पोषित करती परंपराएं व प्रथाएं आदि। यही कारण है कि भारत विकासशील देशों में अग्रणी होने या विकसित राष्ट्रों की आर्थिक मजबूरी होने के बावजूद आधुनिक दासता सूचकांक में उन अविकसित, छोटे तथा सदियों तक सभ्यता से दूर रहने वाले देशों के साथ खड़ा है।
वह मैरीटुआना, हैती, गैबन, गैम्बिया, बैनिन, मॉल्दोआ तथा आइवरी डी कोस्ट जैसे देशों के साथ चौथे स्थान पर है।
आधुनिक दासता मालिक-दास के संबधों को नए तरीके से परिभाषित करती है। आधुनिक दासता में दासता जैसी प्रवृत्तियां जैसे ऋण, जबरन श्रम, जबरन कराए गए विवाह तथा मानव तस्करी आदि को शामिल किया जाता है।
विज्ञापन
मीडिया में जितनी तवज्जो इस विषय को मिलनी चाहिए उतनी नहीं मिलती है। सनसनी, एक्सक्लूजिव, सबसे पहले तथा सबसे बड़ी खबर आदि सूचना की विभिन्न कैटेगरी में यह खबरें स्थान नहीं ले पाती हैं। अगर आती भी हैं, तो बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करके। समाजशास्त्री तथा अर्थशास्त्री केविन बॉल्स का मानना है कि संवाददाता व पत्रकार अक्सर समकालीन मुद्दों को न तो उभारते हैं और न ही तह तक जाने का प्रयास करते हैं।
मानव तस्करी को समझने के लिए तीन तथ्यों का होना जरूरी है। प्रथम, कार्य जैसे रिक्रूटमेंट, ट्रांसपोर्ट, स्थानांतरण, हार्बरिंग या किसी व्यक्ति की प्राप्ति। दूसरा है इस कार्य को करने के लिए धमकी, अपहरण, जबरन बल प्रयोग, धोखा, सत्ता का दुरूपयोग, किसी की कमजोर परिस्थितियों का अनुचित लाभ उठाना आदि प्रवृत्तियों का प्रयोग किया जाता है।
तीसरा, इसका उद्देश्य वेश्यावृत्ति, शारीरिक शोषण, देह व्यापार,जबरन श्रम, शारीरिक अंगों की तस्करी आदि शामिल है। अगर पीड़ित या पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो सहमति का प्रश्न भी आप्रासंगिक हो जाता है। आज भी वेश्यालय से मुक्त कराई गई लड़कियां समाज द्वारा स्वीकार नहीं की जाती हैं। इन्हीं परिस्थितियों से तंग आकर वापस उन्हीं अंधेरों में लौटना मुनासिब समझती हैं।
बंधुआ श्रम रोकथाम कानून, बाल श्रम रोकथाम कानून, किशोर अपचारी न्याय अधिनियम तथा अनैतिक व्यापार निरोधक कानून आदि इस बात का प्रमाण हैं कि हमने आधुनिक दासता को पहचाना है और उसको कानूनी दायरे में लाने का प्रयास भी किया है। लेकिन इतना प्रयास इस दलदल में फंसे लोगों को बाहर निकालने, उनका पुनर्वास करने या उसको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए काफी नहीं है।
कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता, वकीलों की भारी भरकम फीस, न्यायालय में अलग-अलग कारणों से आगे खिसकने वाले ट्रायल तथा पुलिस के चक्कर आदि के चलते कितने पीड़ित हैं, जो न्याय प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन हम कहां इन सब मुद्दों के बारे में सोच रहे हैं। अमेरिका की एक छोटी-सी रिपोर्ट, जिसमें भारत का भी जिक्र है, पर किसी का ध्यान नहीं गया है।
पर्सन इन ट्रैफिकिंग 2014 के शीर्षक से जारी हुई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए। यद्यपि इस रिपोर्ट में भारत द्वारा पीड़ित की सुरक्षा और देखभाल, पुनर्वास तथा क्षतिपूर्ति के लिए किए गए प्रयासों की तारीफ भी की गई है। लेकिन फिर भी भारत को इस समस्या की सबसे उर्वर भूमि बताया गया है।
नेपाल व बांग्लादेश से लड़के-लड़कियों को भारत में लाकर जबरन श्रम तथा देह व्यापार जैसी शोषणकारी व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाता है या कम लिंगानुपात वाले इलाकों में बेच दिया जाता है। भारत की महिलाओं को मध्य एशियाई देशों में भेजकर देह व्यापार में धकेल दिया जाता है या किसी दूसरे काम के बहाने से ले जाकर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी कर दी जाती हैं कि खुद उस व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं।
वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक रिट का निस्तारण करते हुए आदेश दिया था कि 14 वर्ष तक की आयु के लापता बच्चों के मामले में अपहरण का मामला दाखिल किया जाएगा। 14-18 वर्ष आयु के लापता बच्चों के मामले में अगर अभिभावको को नहीं पता की बच्चा कहां है, तो ऐसे मामलों में भी अपहरण का मामला दाखिल होगा।
इन मामलों की जांच पुलिस सब इंस्पेक्टर या उससे ऊपर का अधिकारी ही करेगा। सभी राज्यों को अधिसूचना जारी करके इसको लागू करना था, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी इस तरह की तस्करी के शिकार बच्चों व महिलाओं के नाम थाने की लापता सूची में ही दाखिल होते है। लापता बच्चों के मामले में अगर अपहरण का केस दाखिल होगा, तो कम से कम मामला सामने आने पर अभियुक्त पर अपहरण का केस चलेगा। यह छोटा-सा प्रयास है, लेकिन सही ढंग से पालन होने पर असली गुनहगारों को कानून के दायरे में लाने के लिए यह महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
विज्ञापन
भारत के इतिहास में वह संदर्भ मिल जाएंगे, जिससे दासता पल्लिवित व पुष्पित होती रही है- जैसे लैंगिक असमानता, जातिगत विषमताएं, धर्म का सामाजिक स्वरूप, विषमता की नैरन्तर्य को पोषित करती परंपराएं व प्रथाएं आदि। यही कारण है कि भारत विकासशील देशों में अग्रणी होने या विकसित राष्ट्रों की आर्थिक मजबूरी होने के बावजूद आधुनिक दासता सूचकांक में उन अविकसित, छोटे तथा सदियों तक सभ्यता से दूर रहने वाले देशों के साथ खड़ा है।
विज्ञापन
वह मैरीटुआना, हैती, गैबन, गैम्बिया, बैनिन, मॉल्दोआ तथा आइवरी डी कोस्ट जैसे देशों के साथ चौथे स्थान पर है।
आधुनिक दासता मालिक-दास के संबधों को नए तरीके से परिभाषित करती है। आधुनिक दासता में दासता जैसी प्रवृत्तियां जैसे ऋण, जबरन श्रम, जबरन कराए गए विवाह तथा मानव तस्करी आदि को शामिल किया जाता है।
विज्ञापन
मीडिया में जितनी तवज्जो इस विषय को मिलनी चाहिए उतनी नहीं मिलती है। सनसनी, एक्सक्लूजिव, सबसे पहले तथा सबसे बड़ी खबर आदि सूचना की विभिन्न कैटेगरी में यह खबरें स्थान नहीं ले पाती हैं। अगर आती भी हैं, तो बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करके। समाजशास्त्री तथा अर्थशास्त्री केविन बॉल्स का मानना है कि संवाददाता व पत्रकार अक्सर समकालीन मुद्दों को न तो उभारते हैं और न ही तह तक जाने का प्रयास करते हैं।
मानव तस्करी को समझने के लिए तीन तथ्यों का होना जरूरी है। प्रथम, कार्य जैसे रिक्रूटमेंट, ट्रांसपोर्ट, स्थानांतरण, हार्बरिंग या किसी व्यक्ति की प्राप्ति। दूसरा है इस कार्य को करने के लिए धमकी, अपहरण, जबरन बल प्रयोग, धोखा, सत्ता का दुरूपयोग, किसी की कमजोर परिस्थितियों का अनुचित लाभ उठाना आदि प्रवृत्तियों का प्रयोग किया जाता है।
तीसरा, इसका उद्देश्य वेश्यावृत्ति, शारीरिक शोषण, देह व्यापार,जबरन श्रम, शारीरिक अंगों की तस्करी आदि शामिल है। अगर पीड़ित या पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो सहमति का प्रश्न भी आप्रासंगिक हो जाता है। आज भी वेश्यालय से मुक्त कराई गई लड़कियां समाज द्वारा स्वीकार नहीं की जाती हैं। इन्हीं परिस्थितियों से तंग आकर वापस उन्हीं अंधेरों में लौटना मुनासिब समझती हैं।
बंधुआ श्रम रोकथाम कानून, बाल श्रम रोकथाम कानून, किशोर अपचारी न्याय अधिनियम तथा अनैतिक व्यापार निरोधक कानून आदि इस बात का प्रमाण हैं कि हमने आधुनिक दासता को पहचाना है और उसको कानूनी दायरे में लाने का प्रयास भी किया है। लेकिन इतना प्रयास इस दलदल में फंसे लोगों को बाहर निकालने, उनका पुनर्वास करने या उसको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए काफी नहीं है।
कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता, वकीलों की भारी भरकम फीस, न्यायालय में अलग-अलग कारणों से आगे खिसकने वाले ट्रायल तथा पुलिस के चक्कर आदि के चलते कितने पीड़ित हैं, जो न्याय प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन हम कहां इन सब मुद्दों के बारे में सोच रहे हैं। अमेरिका की एक छोटी-सी रिपोर्ट, जिसमें भारत का भी जिक्र है, पर किसी का ध्यान नहीं गया है।
पर्सन इन ट्रैफिकिंग 2014 के शीर्षक से जारी हुई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए। यद्यपि इस रिपोर्ट में भारत द्वारा पीड़ित की सुरक्षा और देखभाल, पुनर्वास तथा क्षतिपूर्ति के लिए किए गए प्रयासों की तारीफ भी की गई है। लेकिन फिर भी भारत को इस समस्या की सबसे उर्वर भूमि बताया गया है।
नेपाल व बांग्लादेश से लड़के-लड़कियों को भारत में लाकर जबरन श्रम तथा देह व्यापार जैसी शोषणकारी व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाता है या कम लिंगानुपात वाले इलाकों में बेच दिया जाता है। भारत की महिलाओं को मध्य एशियाई देशों में भेजकर देह व्यापार में धकेल दिया जाता है या किसी दूसरे काम के बहाने से ले जाकर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी कर दी जाती हैं कि खुद उस व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं।
वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक रिट का निस्तारण करते हुए आदेश दिया था कि 14 वर्ष तक की आयु के लापता बच्चों के मामले में अपहरण का मामला दाखिल किया जाएगा। 14-18 वर्ष आयु के लापता बच्चों के मामले में अगर अभिभावको को नहीं पता की बच्चा कहां है, तो ऐसे मामलों में भी अपहरण का मामला दाखिल होगा।
इन मामलों की जांच पुलिस सब इंस्पेक्टर या उससे ऊपर का अधिकारी ही करेगा। सभी राज्यों को अधिसूचना जारी करके इसको लागू करना था, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी इस तरह की तस्करी के शिकार बच्चों व महिलाओं के नाम थाने की लापता सूची में ही दाखिल होते है। लापता बच्चों के मामले में अगर अपहरण का केस दाखिल होगा, तो कम से कम मामला सामने आने पर अभियुक्त पर अपहरण का केस चलेगा। यह छोटा-सा प्रयास है, लेकिन सही ढंग से पालन होने पर असली गुनहगारों को कानून के दायरे में लाने के लिए यह महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।