रुकी हुई संसद में अटके विधेयक
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संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन प्रारंभ से ही संसद नोटबंदी से जुड़े मसले पर बाधित है। इस बीच ढेरों ऐसे लंबित विधेयक हैं, जो पारित होकर कानून बनने की बाट जोह रहे हैं। मौजूदा सत्र की शुरुआती छह बैठकों में लोकसभा की उत्पादकता महज 11 फीसदी, जबकि राज्यसभा की 27 प्रतिशत रही। वहीं बीते मानसून सत्र में संसद की उत्पादकता तकरीबन 100 फीसदी थी। करीब डेढ़ दर्जन महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए थे, जिनमें वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी विधेयक सबसे चर्चित था। इसके कानून बनने से कारोबार आसान होने और जीडीपी में एक से दो फीसदी के इजाफे का दावा है। वर्ष 2000 से चर्चा में आए जीएसटी पर 16 साल बाद राज्यसभा में सर्वसम्मति से मुहर लगी थी। तब से लेकर अब तक जीएसटी के कानून बनने की प्रकिया का काफी हिस्सा पूरा हो चुका है। सांविधानिक संशोधन का राज्यों में पारित होना, राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद काउंसिल का गठन और अधिकांश मसलों पर सहमति उनमें प्रमुख हैं। इस सत्र में भी सबसे ज्यादा नजरें जीएसटी पर ही टिकी हैं। जीएसटी से जुड़े तीन विधेयक इस सत्र में प्रस्तावित हैं। बाकी विधेयकों को समझें, तो एक महत्वपूर्ण विधेयक देश के करोड़ों उपभोक्ताओं के हितों से जुड़ा है।
हमारे मुल्क में अक्सर उपभोक्ताओं के हितों की अनदेखी होती रही है। इसी के मद्देनजर 1986 के मौजूदा कानून की जगह लेने वाले इस प्रस्तावित विधेयक को बीते साल लोकसभा में पेश किया गया। यह विधेयक भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ भी सख्ती की बात करता है। एक अन्य विधेयक मातृत्व अवकाश से जुड़ा है, जो देश के संगठित क्षेत्र की तकरीबन 18 लाख कामकाजी महिलाओं की सुविधाओं से जुड़ा है। मौजूदा कानून में संशोधन करने वाला यह विधेयक कामकाजी महिला के मातृत्व अवकाश की अवधि को बढ़ाकर 26 हफ्ते तक करता है। इसमें क्रैच और घर से काम करने के विकल्प का भी प्रावधान है। हालांकि असंगठित क्षेत्र की करोड़ों कामकाजी महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल सकेगा। एक और लंबित विधेयक मुल्क के करीब 22 लाख मानसिक रोगियों की देखभाल से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन 2007 को ध्यान में रखकर लाए इस विधेयक में मानसिक रोगियों के गुणवत्तापूर्ण उपचार के साथ उनके साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार के खिलाफ सख्ती का भी प्रावधान है। इसमें आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से अलग करने पर अलग पक्ष सामने आए हैं। एक अन्य विधेयक नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई प्रवासियों को भारत की नागरिकता की पात्रता देता है। उधर राज्यसभा के लंबित विधेयकों को देखें, तो लंबित छह विधेयकों में से दो विधेयक श्रम और उद्योग क्षेत्र से जुड़े हैं, जबकि दो विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। इनमें एक व्हिस्लब्लोअर संशोधन विधेयक है, जो 2014 के कानून में संशोधन है। वहीं भ्रष्टाचार रोकथाम संबधी विधेयक में भी संशोधन प्रस्तावित है। ये 1988 के मौजूदा कानून में बदलाव करेगा।
कुल मिलाकर 22 बैठकों वाले इस सत्र में कई अहम विधेयक लंबित हैं। इनमें कई विधेयकों का इंतजार वर्षों से है। लेकिन व्यवधान के कारण अब सत्र में दिन कम बचे हैं, जबकि विधेयक जस के तस! उम्मीद है कि माननीयों को संसद के बुनियादी काम यानी कानून बनाने की जिम्मेदारी का जल्दी ही एहसास होगा और सदन के प्रति ईमानदारी दिखेगी।